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आदि पर्व
अध्याय ४७
सूत उवाच
निर्माय़ चापि विधिवद्यज्ञाय़तनमीप्सितम् |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११२
नारद उवाच
निर्मितं वह्निना भूमौ वाय़ुना वैधितं तथा |
१ ख
वन पर्व
अध्याय ९४
लोमश उवाच
निर्मितामात्मनोऽर्थाय़ मुनिः प्रादान्महातपाः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३७
व्यास उवाच
निर्मुक्तः सर्वपापेभ्यो निरमित्रस्य किं भय़म् ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय ११०
पाण्डुरु उवाच
निर्मुक्तः सर्वपापेभ्यो व्यतीतः सर्ववागुराः |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४६
व्रह्मो उवाच
निर्मुक्तः सर्वसङ्गेभ्यो वाय़ुराकाशगो यथा |
५५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
निर्मुक्तसर्पप्रतिमैश्च तीक्ष्णै; स्तैलप्रधौतैः खगपत्रवाजैः |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
निर्मुक्तस्य रजोरूपान्नापराधो भवेन्मम ||
५० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
धृतराष्ट्र उवाच
निर्मुक्ताः सर्वसङ्गेभ्यो कृतात्मानो यतव्रताः |
५२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८२
भीष्म उवाच
निर्मुक्तानां पन्नगानां सरूपा; दृष्ट्वा शक्तीर्हेमचित्रा निकृत्ताः |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
निर्मुक्ताशीविषाकारां पृक्तां गजमदैरपि ||
४६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
निर्मुक्ताशीविषाभानां सम्पातोऽभूत्सुदारुणः ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १
सर्प उवाच
निर्मोक्षस्त्वस्य दोषस्य मय़ा कार्यो यथा तथा |
५३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
निर्मोक्षाय़ेह दुःखस्य लिङ्गमात्रं निरर्थकम् ||
४८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२८
वैशम्पाय़न उवाच
निर्मोचने षट्सहस्राः पाशैर्वद्ध्वा महासुराः |
४३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
निर्मोचने षट्सहस्राणि हत्वा; सञ्छिद्य पाशान्सहसा क्षुरान्तान् |
७७ क
वन पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
निर्ययुः पाण्डवान्हन्तुं सङ्घशः कृतनिश्चय़ाः ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
निर्ययुः सिंहनादेन नादय़न्तो दिशो दश ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
निर्ययुः स्वान्यनीकानि शोभय़न्तो रथोत्तमैः ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३१
राजो उवाच
निर्ययुर्नगराकारै रथैः पररथारुजैः ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
निर्ययुर्भरतश्रेष्ठाः शस्त्राण्यादाय़ सर्वशः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय २६८
मार्कण्डेय़ उवाच
निर्ययुर्विकृताकाराः सहस्रशतसङ्घशः ||
३२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
निर्ययुस्तावका युद्धे मृत्युं कृत्वा निवर्तनम् ||
३२ ग
शल्य पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
निर्ययौ नगराच्चापि चतुरङ्गवलान्वितः ||
१७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
निर्ययौ नगराद्दीनस्तूर्णमाय़ोधनं प्रति ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
निर्ययौ परय़ा प्रीत्या वनं मृगजिघांसय़ा ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
निर्ययौ पुरुषव्याघ्रः पाण्डवाभ्यां सहाच्युतः ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय २२८
वैशम्पाय़न उवाच
निर्ययौ भरतश्रेष्ठो वलेन महता वृतः ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय २७४
मार्कण्डेय़ उवाच
निर्ययौ रथमास्थाय़ हेमरत्नविभूषितम् ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७८
वैशम्पाय़न उवाच
निर्ययौ विनय़ेनार्यो व्राह्मणार्घ्यपुरःसरः ||
१ ख
सभा पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
निर्ययौ सजनामात्यः पुरस्कृत्य पुरोहितम् ||
३९ ख
सभा पर्व
अध्याय ३४
शिशुपाल उवाच
निर्ययौ सदसस्तस्मात्सहितो राजभिस्तदा ||
२३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४७
वैशम्पाय़न उवाच
निर्ययौ सह सोदर्यैः सदारो भरतर्षभ ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय ९२
लोमश उवाच
निर्यशस्यास्ततो दैत्याः कृत्स्नशो विलय़ं गताः ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५५
कुशिक उवाच
निर्याणं च रथेनाशु सहसा यत्कृतं त्वय़ा ||
५ ग
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
निर्याणं धृतराष्ट्रस्य शोकः समभवन्महान् ||
३९ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
निर्याणं पर्व च ततः कुरुपाण्डवसेनय़ोः ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८
अश्मो उवाच
निर्याणं यस्य यद्दिष्टं तेन गच्छति हेतुना |
२६ क
वन पर्व
अध्याय २७३
मार्कण्डेय़ उवाच
निर्याणे स मतिं कृत्वा निधाय़ासिं क्षपाचरः |
३३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४८
वासुदेव उवाच
निर्याताश्च विनाशाय़ कुरुक्षेत्रं नराधिपाः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय १२०
सात्यकिरु उवाच
निर्यातु साध्वद्य दशार्हसेना; प्रभूतनानाय़ुधचित्रवर्मा |
५ क
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
निर्याते तु जने तस्मिन्सागरो मकरालय़ः |
४० क
उद्योग पर्व
अध्याय ११७
नारद उवाच
निर्यात्य कन्यां शिष्याय़ कौशिकोऽपि वनं यय़ौ ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय १७३
वैशम्पाय़न उवाच
निर्यात्य वैरं सफलं सपुष्पं; तस्मै नरेन्द्राधमपूरुषाय़ ||
१० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
निर्यातय़त मे सेनां प्रभूतरथकुञ्जराम् |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११५
नारद उवाच
निर्यातय़तु मे कन्यां भवांस्तिष्ठन्तु वाजिनः |
१७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
निर्यान्तु कोशपालाश्च कुरुक्षेत्राश्रमं प्रति ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
शुक्र उवाच
निर्यासः सरलश्चैव कृत्रिमश्चैव ते त्रय़ः |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
शुक्र उवाच
निर्यासाः सल्लकीवर्ज्या देवानां दय़ितास्तु ते |
३९ क
विराट पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
निर्याहि मध्यादिति मत्स्यपुत्र; मुवाच यावत्कुरवो विसञ्ज्ञाः ||
१२ ख