chevron_left  वाल्येarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
वाल्ये मोहं च विज्ञाय़ क्षय़ं देहस्य चाशुभम् |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
व्राह्मण उवाच
वाल्ये यदि स्यादज्ञानान्मय़ा हस्तः प्रसारितः |
७८ क
वन पर्व
अध्याय २८२
मार्कण्डेय़ उवाच
वाल्ये वृत्तानि पुत्रस्य स्मरन्तौ भृशदुःखितौ ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
वाल्ये वृत्तानि सर्वाणि प्रीय़माणौ विचिन्त्य तौ |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
वाल्येऽपि तेन युध्यन्तो वारणेनेव मर्दिताः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
वाल्येऽप्यवालकर्माणं प्रिय़वाक्यममत्सरम् ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
वाल्वजीत्येव वैश्यस्य धर्म एष युधिष्ठिर ||
४० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
सुरभ्यु उवाच
वाल्वजेन निदानेन कांस्यं भवतु दोहनम् |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
वावाश्यमानास्तिष्ठन्ति न चैनानभिनन्दसे ||
६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २३
गान्धार्यु उवाच
वाशिता गृष्टय़ः पङ्के परिमग्नमिवर्षभम् ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय ९६
वैशम्पाय़न उवाच
वाशितामनुसम्प्राप्तो यूथपो वलिनां वरः ||
२६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
वाशितार्थमभिक्रुद्धा हुङ्कृत्वा चाभिदुद्रुवुः |
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
वाशितार्थे युय़ुत्सन्तो वृषभा वृषभं यथा |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
वाशितासङ्गमे दृप्तौ शरदीव मदोत्कटौ ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
वाशितासङ्गमे यत्तौ सिंहाविव महावने ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
वाशितासङ्गमे यद्वदजय़्यं प्रतिय़ूथपैः ||
८ ग
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
वाष्कलो नाम यस्तेषामासीदसुरसत्तमः |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
वाष्पगद्गदपूर्णेन मुखेन परिशुष्यता ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय ४३
सूत उवाच
वाष्पगद्गदय़ा वाचा मुखेन परिशुष्यता |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
वाष्पगद्गदय़ा वाचा मुह्यमानो मुहुर्मुहुः |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
भीष्म उवाच
वाष्पपूर्णमुखी दीना दृष्ट्वा सा तु हतं सुतम् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
वाष्पपूर्णेन कण्ठेन क्रुद्धा वचनमव्रवीत् ||
१११ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
वाष्पमाहारय़द्देवी वस्त्रेणावृत्य वै मुखम् ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
वाष्पविह्वलय़ा वाचा राजानमिदमव्रवीत् ||
३२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
वाष्पसन्दिग्धमत्यर्थमिदमाह वचो भृशम् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय ७२
वृहदश्व उवाच
वाष्पसन्दिग्धय़ा वाचा पुनरेवेदमव्रवीत् ||
२४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
वाष्पसन्दिग्धय़ा वाचा रुरुदुर्भरतर्षभ ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय ६७
वृहदश्व उवाच
वाष्पेण पिहिता राजन्नोत्तरं किञ्चिदव्रवीत् ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
वाष्पेण पिहितो दृष्ट्वा द्रोणपुत्रं रथे स्थितम् ||
९५ ख
वन पर्व
अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच
वाष्पेणापिहितां सीतां ददर्शेक्ष्वाकुनन्दनः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
वाष्पेणापूर्यत द्रौणी रोषेण च नरर्षभ ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३७
द्रोण उवाच
वास एव यथा हि त्वं प्रावृण्वानोऽद्य मन्यसे |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
वासं कुलेषु जन्तूनां दुःखं विज्ञाय़ भारत ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८४
पराशर उवाच
वासः प्रासादपृष्ठे च तत्सर्वं तपसः फलम् ||
२१ ख
सभा पर्व
अध्याय ६
वैशम्पाय़न उवाच
वासवं देवराजं च यमं वैवस्वतं च के |
१६ क
वन पर्व
अध्याय ९०
युधिष्ठिर उवाच
वासवः स्मरते यस्य को नामाभ्यधिकस्ततः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१६
भीष्म उवाच
वासवस्य च संवादं वलेर्वैरोचनस्य च ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
वासवाः पञ्च राजानः पृथग्वंशाश्च शाश्वताः ||
३० ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ८२
भीष्म उवाच
वासवाकूटवाहिन्यः कर्मणा सुकृतेन च |
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
वासवाशनितुल्यस्य महौघस्येव मारिष ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
वासवाशनिनिर्घोषं दृढज्यमभिविक्षिपन् |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
वासविं नवभिर्वाणैर्वाह्वोरुरसि चार्पय़त् ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
वासविः सुसहाय़ो वै मम ह्येको भविष्यति ||
९० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
वासविर्वासवसमः सव्यसाच्यव्रवीद्वचः ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
वासवीं कारणं कृत्वा कालेनापहतो ह्यसौ |
५८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
वासवीं समरे शक्तिं ध्रुवं मुञ्चेद्युधिष्ठिर ||
५६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५५
वासुदेव उवाच
वासवेन महावाहो प्राप्ता यासौ घटोत्कचे ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५५
वासुदेव उवाच
वासवो वा कुवेरो वा वरुणो वा जलेश्वरः |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५
व्यास उवाच
वासवोऽपि मरुत्तेन स्पर्धते पाण्डुनन्दन ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५
व्यास उवाच
वासवोऽप्यसुरान्सर्वान्निर्जित्य च निहत्य च |
७ क