वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
द्रुमैः पुष्पफलोपेतैर्दिव्यरत्नमय़ैर्वृतम् ||
३ ग
वन पर्व
अध्याय
२७४
मार्कण्डेय़ उवाच
द्रुमैर्विध्वंसय़ां चक्रुर्दशग्रीवस्य पश्यतः ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
द्रुह्युं चानुं च पूरुं च त्रीन्कुमारानजीजनत् ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
द्रुह्युं चानुं च पूरुं च शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
८०
यय़ातिरु उवाच
द्रुह्युना चानुना चैव मय़्यवज्ञा कृता भृशम् ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
द्रुह्युश्चानुश्च पूरुश्च शर्मिष्ठाय़ां प्रजज्ञिरे ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२६
सञ्जय़ उवाच
द्रुह्येत्को नु नरो लोके मदन्यो व्राह्मणव्रुवः ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
७९
वैशम्पाय़न उवाच
द्रुह्यो त्वं प्रतिपद्यस्व वर्णरूपविनाशिनीम् |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
द्रुह्योरपि सुता भोजा अनोस्तु म्लेच्छजातय़ः ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
द्रोग्धव्यं न च मित्रेषु न विश्वस्तेषु कर्हिचित् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४७
जनमेजय़ उवाच
द्रोग्धास्मि व्राह्मणान्विप्र चरणावेव ते स्पृशे ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३८
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं कर्णं कृपं शल्यं द्रौणिं भोजं वृहद्वलम् |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं कृपं च कर्णं च महाराजं च वाह्लिकम् ||
४ ख
सभा पर्व
अध्याय
६९
युधिष्ठिर उवाच
द्रोणं कृपं नृपांश्चान्यानश्वत्थामानमेव च |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६३
धृतराष्ट्र उवाच
द्रोणं कृपं विकर्णं च महाराजं च वाह्लिकम् ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं कृपं विकर्णं च महेष्वासान्महावलान् |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं च द्रोणपुत्रं च कृपं चाथ सुय़ोधनम् |
५५ क
आदि पर्व
अध्याय
१९९
वैशम्पाय़न उवाच
द्रोणं च परमेष्वासं गौतमं कृपमेव च ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३०
दुर्योधन उवाच
द्रोणं च भागिनेय़ं च न स त्यक्ष्यति कर्हिचित् ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
श्रीभगवानु उवाच
द्रोणं च भीष्मं च जय़द्रथं च; कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
१२०
सात्यकिरु उवाच
द्रोणं च भीष्मं च महारथौ तौ; सुतैर्वृतं चाप्यथ सोमदत्तम् |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९४
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं च युधि संरव्धं मां च निर्जित्य संय़ुगे |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं च युध्यतां श्रेष्ठं शचीपतिसमं युधि |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
द्रोणं च रथशार्दूलं कृपं च सुमहारथम् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३१
वैशम्पाय़न उवाच
द्रोणं च वाह्लिकं चैव सोमदत्तं च कौरवम् ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
द्रोणं च सञ्जय़ं चैव विदुरं च महामतिम् |
२ क
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
द्रोणं च ससुतं वीरं सहदेवो महारथः ||
४२ ख
विराट पर्व
अध्याय
३४
उत्तर उवाच
द्रोणं च सह पुत्रेण महेष्वासान्समागतान् ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४७
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं च सूतपुत्रं च प्रय़तावः प्रवाधितुम् ||
२५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१
जनमेजय़ उवाच
द्रोणं च सोमदत्तं च भूरिश्रवसमेव च ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं जिघांसुः पाञ्चाल्यो महाज्वालमिवानलम् ||
११४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं ज्ञात्वा धर्मराजं गोविन्दो व्यथितोऽव्रवीत् ||
९७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं तथागतं दृष्ट्वा धृष्टद्युम्नवशं गतम् ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं तव सुतो राजन्पुनरेवेदमव्रवीत् ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं तव सुतो राजन्विधिदृष्टेन कर्मणा ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं ते नाभ्यवर्तन्त वेलामिव जलाशय़ाः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं त्रातारमाकाङ्क्षञ्शकटव्यूहमभ्यगात् ||
३२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं त्रिभिः प्रविव्याध चतुर्भिश्चास्य वाजिनः |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं दुर्योधनं शल्यमश्वत्थामानमेव च |
४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं दृष्ट्वारय़स्त्रेसुश्चेलुर्मम्लुश्च मारिष ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं द्रुपदपुत्रस्तु प्रतिविव्याध संय़ुगे |
३१ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२३
गान्धार्यु उवाच
द्रोणं द्रुपदपुत्रेण निहतं मधुसूदन |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं द्रोणमिति क्रूराः पाञ्चालाः समचोदय़न् |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं द्रोणमिति ह्येके मा द्रोणमिति चापरे |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं द्रौणिं च कर्णं च विव्याध तव चात्मजम् ||
१८ ग
सभा पर्व
अध्याय
४१
शिशुपाल उवाच
द्रोणं द्रौणिं च साधु त्वं पितापुत्रौ महारथौ |
१० क
सभा पर्व
अध्याय
७१
विदुर उवाच
द्रोणं द्वीपममन्यन्त राज्यं चास्मै न्यवेदय़न् ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं निवारितं दृष्ट्वा कुमारेण द्विजर्षभम् |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं पञ्चाशता विद्ध्वा विंशत्या च वृहद्वलम् |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
द्रोणं पञ्चाशताविध्यन्नाराचैरग्निसंनिभैः ||
७ ख