उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
शैक्याय़समय़ीं घोरां गदां काञ्चनभूषिताम् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९९
इन्द्र उवाच
शैक्याय़समय़ैस्तीक्ष्णैरभिघातो भवेद्वसु ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
शैक्याय़सानि वर्माणि कांस्यानि च समन्ततः |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
शैक्षं स्वरं समास्थाय़ ओमिति प्रासृजत्स्वरम् ||
५० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
शैखण्डिनं क्षत्रदेवं के तं द्रोणादवारय़न् ||
५९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
शैखावत्यस्तपोवृद्धः शास्त्रे चारण्यके गुरुः ||
११ ख
सभा पर्व
अध्याय
६८
अर्जुन उवाच
शैत्यं सोमात्प्रणश्येत मत्सत्यं विचलेद्यदि ||
३५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
शैत्यमग्निरिय़ान्न त्वा कर्णो हन्याद्धनञ्जय़म् ||
७६ ख
वन पर्व
अध्याय
२६२
मार्कण्डेय़ उवाच
शैत्यमग्निरिय़ान्नाहं त्यजेय़ं रघुनन्दनम् ||
३६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१७
सिद्ध उवाच
शैत्यात्प्रकुपितः काय़े तीव्रवाय़ुसमीरितः ||
२० ग
भीष्म पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
शैनेय़ं तु रणे क्रुद्धो भारद्वाजः प्रतापवान् |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
शैनेय़ं दशभिर्वाणैः प्रत्यविध्यदमर्षितः ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३७
सञ्जय़ उवाच
शैनेय़ं पञ्चविंशत्या साय़कानां समाचिनोत् ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
शैनेय़ं योधय़ामासुर्भीष्मस्य प्रमुखे तदा ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४०
सञ्जय़ उवाच
शैनेय़ं शरवर्षाणि विकिरन्तं समन्ततः |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३९
सञ्जय़ उवाच
शैनेय़ं शरवर्षेण छादय़ामास भारत ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
शैनेय़ं स तु निर्भिद्य प्राविशद्धरणीतलम् |
४७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७८
सञ्जय़ उवाच
शैनेय़ः प्राणदज्जित्वा योधानां तव पश्यताम् ||
४२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
शैनेय़ः शरसङ्घं तु प्रेषय़ामास संय़ुगे |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
शैनेय़ः श्येनवत्सङ्ख्ये व्यचरल्लघुविक्रमः ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५२
धृतराष्ट्र उवाच
शैनेय़ः समरे स्थाता वीजवत्प्रवपञ्शरान् ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५७
धृतराष्ट्र उवाच
शैनेय़ः समरे स्थाता वीजवत्प्रवपञ्शरान् ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
शैनेय़ः सात्यकिः सत्यो मित्राणामभय़ङ्करः ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
धृतराष्ट्र उवाच
शैनेय़चरितं दृष्ट्वा सदृशं सव्यसाचिनः ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४७
सञ्जय़ उवाच
शैनेय़प्रमुखान्पार्थानभिदुद्रुवतू रणे ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
शैनेय़भीमार्जुनवाहिनीपा; ञ्शैव्याभिमन्यू सह काशिराज्ञा |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
शैनेय़वेलामासाद्य स्थितः सैन्यमहार्णवः ||
२५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
शैनेय़शरनुन्नं तु ततः सैन्यं विशां पते |
४७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
शैनेय़शरसङ्कृत्तैः शोणितौघपरिप्लुतैः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
शैनेय़सहितो धीमान्रथमेवान्वपद्यत ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
शैनेय़स्तव पुत्रं तु विद्ध्वा पञ्चभिराशुगैः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
शैनेय़स्तु रणे क्रुद्धस्तव पुत्रं महारथम् |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
शैनेय़स्त्वरितो राजन्कृतवर्माणमभ्ययात् ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
शैनेय़स्य धनुश्छित्त्वा स खड्गो न्यपतन्महीम् |
४१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
शैनेय़स्य रथं तूर्णं छादय़ामासतुः शरैः ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२८
युधिष्ठिर उवाच
शैनेय़ा हि चैत्रकाश्चान्धकाश्च; वार्ष्णेय़भोजाः कौकुराः सृञ्जय़ाश्च |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
सञ्जय़ उवाच
शैनेय़ाभ्यवपत्तिं ते जानाम्याचार्यघातिनः |
४८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
शैनेय़े नाकरोद्यत्नं व्यूहस्यैवाभिरक्षणे ||
३४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
शैनेय़ेन ध्रुवमात्ताय़ुधेन; धृष्टद्युम्नेनाथ शिखण्डिना च |
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८९
धृतराष्ट्र उवाच
शैनेय़ेन परामृष्टाः किमन्यद्भागधेय़तः ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
शैनेय़ेऽधिष्ठिते राजन्विरथे कृतवर्मणि |
३० क
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
शैनेय़ो दक्षिणं चक्रं धृष्टद्युम्नस्तथोत्तरम् |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
शैनेय़ो वा नरव्याघ्रश्चतुर्थो नोपलभ्यते ||
७३ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१७१
सञ्जय़ उवाच
शैनेय़ोऽचोदय़त्तूर्णं रणं द्रौणिरथं प्रति ||
४५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
शैनेय़ोऽपि गुरोः पुत्रं सर्वमर्मसु भारत |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
शैनेय़ोऽपि ततः क्रुद्धो भृशं विद्धो महारथः |
४० क
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
शैनेय़ोऽप्यन्यदादाय़ धनुरिन्द्राय़ुधद्युति |
६५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
धृतराष्ट्र उवाच
शैनेय़ोऽभिय़यौ युद्धे तन्ममाचक्ष्व तत्त्वतः ||
४ ख
सभा पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
शैरीषकं महेच्छं च वशे चक्रे महाद्युतिः |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११८
नारद उवाच
शैलद्रुमवनौकानामासीत्तत्र समागमः ||
३ ख