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द्रोण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
दर्शनीय़ास्तु काम्वोजाः शुकपत्रपरिच्छदाः |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५२
धृतराष्ट्र उवाच
दर्शनीय़ो मनस्वी च लक्ष्मीवान्व्रह्मवर्चसी |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
दर्शनीय़ो युवा चैव शौर्ये च कृतलक्षणः |
८१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१७
वलिरु उवाच
दर्शनीय़ो विरूपश्च सुभगो दुर्भगश्च यः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय २८७
वैशम्पाय़न उवाच
दर्शनीय़ोऽनवद्याङ्गस्तेजसा प्रज्वलन्निव |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५०
युधिष्ठिर उवाच
दर्शने कीदृशः स्नेहः संवासे च पितामह |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
दर्शने जातसङ्कल्पा जनकस्य वभूव ह ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
दर्शने दर्शने नित्यं सुखप्रश्नमुदाहरेत् |
१८ क
विराट पर्व
अध्याय २०
द्रौपद्यु उवाच
दर्शने दर्शने हन्यात्तथा जह्यां च जीवितम् ||
२५ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ५१
भीष्म उवाच
दर्शने यादृशः स्नेहः संवासे च युधिष्ठिर ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
दर्शने स्पर्शने चापि घ्राणे चामितविक्रम ||
३९ ख
आदि पर्व
अध्याय १२४
वैशम्पाय़न उवाच
दर्शनेप्सु समभ्यागात्कुमाराणां कृतास्त्रताम् ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय ११
नारद उवाच
दर्शनेप्सुस्तथा राजन्नादित्यमहमव्रुवम् ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय ७
सूत उवाच
दर्शश्च पौर्णमासश्च देवानां पितृभिः सह ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १३
धृतराष्ट्र उवाच
दर्शितं द्वीपसंस्थानमुत्तरं व्रूहि सञ्जय़ ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय २११
मार्कण्डेय़ उवाच
दर्शे च पौर्णमासे च यस्येह हविरुच्यते |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
दर्शेन पौर्णमासेन चातुर्मास्यैः पुनः पुनः |
१०७ क
कर्ण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
दर्शय़ँल्लाघवं युद्धे तार्क्ष्यवीर्यसमद्युतिः ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
दर्शय़त्यन्तरात्मानं दिवा रूपमिवांशुमान् ||
४५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
नारद उवाच
दर्शय़त्यन्तरात्मानं दिवा रूपमिवांशुमान् ||
३२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
दर्शय़न्घोरमात्मानं महाभ्रमिव नादय़न् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
दर्शय़न्घोरमात्मानममित्रान्सहसाभ्ययात् ||
६४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २११
भीष्म उवाच
दर्शय़न्तः पृथग्धर्मान्नानापाषण्डवादिनः ||
४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
दर्शय़न्तीव ता ह स्म युगान्ते लोकसङ्क्षय़म् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
दर्शय़न्तो भय़ं तीव्रं प्रादुर्भूताः समन्ततः ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय १०१
वैशम्पाय़न उवाच
दर्शय़न्तो यथाशक्ति तमपृच्छन्द्विजोत्तमम् |
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय ३३
सूत उवाच
दर्शय़न्तो वहून्दोषान्प्रेत्य चेह च दारुणान् |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
दर्शय़न्तोऽऽत्मनो वीर्यं प्रमथिष्यन्ति पाण्डवान् ||
३८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
दर्शय़न्निव कौन्तेय़ं धर्मराजं युधिष्ठिरम् ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
दर्शय़न्नैन्द्रिरात्मानमुग्रमुग्रपराक्रमः |
२ क
विराट पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
दर्शय़न्नैन्द्रिरात्मानमुग्रमुग्रपराक्रमः |
४४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
दर्शय़न्रौद्रमात्मानं पाशहस्त इवान्तकः |
९५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२१
सञ्जय़ उवाच
दर्शय़न्रौद्रमात्मानमुग्रे कर्मणि धिष्ठितः ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३९
सञ्जय़ उवाच
दर्शय़न्विविधान्मार्गाञ्शिक्षार्थं लघुहस्तवत् ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय ११२
वैशम्पाय़न उवाच
दर्शय़स्व नरव्याघ्र साधु मामसुखान्विताम् |
२८ क
वन पर्व
अध्याय १०८
लोमश उवाच
दर्शय़स्व महाराज मार्गं केन व्रजाम्यहम् |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय ३२
दुर्योधन उवाच
दर्शय़स्व वलं युद्धे यावत्तत्तेऽद्य विद्यते ||
४९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३९
वाय़ुरु उवाच
दर्शय़स्व स्थलं भद्रे षट्सहस्रशतह्रदम् ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
दर्शय़ां नैत्यकं चक्रुर्नैशं त्रैय़म्वकं वलिम् ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७९
सञ्जय़ उवाच
दर्शय़ानाः परं शक्त्या पौरुषं पुरुषर्षभ ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
भीष्म उवाच
दर्शय़ामास कुशिकं सभार्यं भृगुनन्दनः ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
देवा ऊचुः
दर्शय़ामास चाग्निस्तां तदा गङ्गां भृगूद्वह |
६६ ख
वन पर्व
अध्याय १०७
लोमश उवाच
दर्शय़ामास तं गङ्गा तदा मूर्तिमती स्वय़म् ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
दर्शय़ामास तं गङ्गा विभ्रती रूपमुत्तमम् |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०५
नारद उवाच
दर्शय़ामास तं प्राह संहृष्टः प्रिय़काम्यया ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४५
भीष्म उवाच
दर्शय़ामास तं विप्रं नागपत्नी पतिव्रता ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६४
भीष्म उवाच
दर्शय़ामास तं विष्णू रूपमास्थाय़ वासवम् |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
दर्शय़ामास तां यक्षः स्थूणो मध्वक्षसंय़ुतः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय ११७
वैशम्पाय़न उवाच
दर्शय़ामास तान्विप्रान्धर्मराजं च सानुजम् ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२३
सञ्जय़ उवाच
दर्शय़ामास पार्थाय़ क्रूरमाय़ोधनं महत् ||
३० ख