सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
दह्यमाना हुताशेन वध्यमानाश्च तेन ते |
१२४ क
वन पर्व
अध्याय
२१६
मार्कण्डेय़ उवाच
दह्यमानाः प्रपन्नास्ते शरणं पावकात्मजम् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
भीष्म उवाच
दह्यमानाः सुतस्नेहात्प्रय़युर्वान्धवा गृहान् ||
७९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
गृध्र उवाच
दह्यमानाः स्म शोकेन गृहं गच्छन्ति नित्यदा ||
५३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७०
सञ्जय़ उवाच
दह्यमानानलेनेव सर्वतोऽभ्यर्दिता रणे ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
६५
सुदेव उवाच
दह्यमानामिवोष्णेन मृणालीमचिरोद्धृताम् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
१७२
वैशम्पाय़न उवाच
दह्यमानास्तदास्त्रैस्तैर्याचन्ति स्म धनञ्जय़म् ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४०
भीष्म उवाच
दह्यमानास्तु ते दैत्यास्तस्यागस्त्यस्य तेजसा |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
युधिष्ठिर उवाच
दह्यमानाय़ विप्राय़ यः प्रय़च्छत्युपानहौ |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
दह्यमानाय़ विप्राय़ यः प्रय़च्छत्युपानहौ |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
२१८
वैशम्पाय़न उवाच
दह्यमाने वने तस्मिन्कुरुक्षेत्रेऽभवत्तदा ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
दह्यमाने वने तस्मिन्सशालसरलद्रुमे |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
२६३
मार्कण्डेय़ उवाच
दह्यमानेन तु हृदा रामोऽभ्यपतदाश्रमम् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
दह्यमानेन तु हृदा शरणार्थी महावने |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४२
भीष्म उवाच
दह्यमानेन मनसा शापं श्रुत्वा तथाविधम् ||
२९ ख
विराट पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
दह्यमानेव रौद्रेण चक्षुषा द्रुपदात्मजा ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३९
सञ्जय़ उवाच
दह्यमानेव लोकानामभावे वै वसुन्धरा ||
४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
दह्यमानो मनस्तापं भजते न स पण्डितः ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३
युधिष्ठिर उवाच
दह्याम्यनिशमद्याहं चिन्तय़ानः पुनः पुनः |
५ क
सभा पर्व
अध्याय
४९
दुर्योधन उवाच
दाक्षिणात्यः संनहनं स्रगुष्णीषे च मागधः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
दाक्षिणात्यपतेः पुत्रो दिक्षु रुक्मीति विश्रुतः ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
दाक्षिणात्यांश्च भोजांश्च क्रूरान्सङ्ग्रामकर्कशान् |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९६
वैशम्पाय़न उवाच
दाक्षिणात्याः प्रतीच्याश्च पार्वतीय़ाश्च ये रथाः ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
दाक्षिणात्याश्च वहवः सूतपुत्रपुरोगमाः ||
३४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
दाक्ष्यं वैश्ये च शूद्रे च सर्ववर्णानुकूलताम् ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
दाक्ष्यं ह्यमर्षः शौर्यं च शीघ्रत्वमिति तेजसः |
२० क
वन पर्व
अध्याय
२९७
युधिष्ठिर उवाच
दाक्ष्यमेकपदं धर्म्यं दानमेकपदं यशः |
४९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
विदुर उवाच
दाक्ष्यात्तु कुरुते मूलं संय़मात्प्रतितिष्ठति ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
दाक्ष्येण कुरुते कर्म संय़मात्प्रतितिष्ठति ||
८४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८४
पराशर उवाच
दाक्ष्येण हव्यकव्यार्थं स्वधर्मं विचरेन्नृप ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८१
पराशर उवाच
दाक्ष्येणाहीनो धर्मय़ुक्तो नदान्तो; लोकेऽस्मिन्वै पूज्यते सद्भिरार्यः ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
९४
शन्तनुरु उवाच
दातव्यं चेत्प्रदास्यामि न त्वदेय़ं कथञ्चन ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८९
भीष्म उवाच
दातव्यं धर्मतस्तेभ्यस्त्वनुक्रोशाद्दय़ार्थिना ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६२
नारद उवाच
दातव्यं भिक्षवे चान्नमात्मनो भूतिमिच्छता ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
७७
यय़ातिरु उवाच
दातव्यं याचमानेभ्य इति मे व्रतमाहितम् |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
दातव्यमसकृच्छक्त्या यष्टव्यमसकृत्तथा |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३९
श्रीभगवानु उवाच
दातव्यमिति यद्दानं दीय़तेऽनुपकारिणे |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५१
भीष्म उवाच
दातव्यमित्ययं धर्म उक्तो भूतहिते रतैः |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६७
यम उवाच
दातव्याः सततं दीपास्तस्माद्भरतसत्तम |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७४
भीष्म उवाच
दाता कुप्यति नो दान्तस्तस्माद्दानात्परो दमः ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५६
उत्तङ्क उवाच
दाता त्वं च नरव्याघ्र पात्रभूतः क्षिताविह |
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
दाता दशानुगृह्णाति दश हन्ति तथा क्षिपन् |
७१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७१
भीष्म उवाच
दाता नापात्रवर्षी स्यात्प्रगल्भः स्यादनिष्ठुरः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
दाता भवति लोके स प्राणानां नात्र संशय़ः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११८
भीष्म उवाच
दाता भृत्यजनावेक्षी न क्रोधी सुमहामनाः ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३३
महेश्वर उवाच
दाता व्राह्मणसत्कर्ता दीनान्धकृपणादिषु |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
दाता व्राह्मणसत्कर्ता सुसंमृष्टनिवेशनः ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
१४२
युधिष्ठिर उवाच
दाताभय़स्य वीभत्सुरमितात्मा महावलः ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
दातारं चैव भक्तानां प्रसादविहितान्वरान् ||
११ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
५८
युधिष्ठिर उवाच
दातारं दत्तमन्वेति यद्दानं तत्प्रचक्ष्व मे ||
२ ख