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शान्ति पर्व
अध्याय २९६
वसिष्ठ उवाच
विमोक्षिणा विमोक्षश्च समेत्येह तथा भवेत् ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३
युधिष्ठिर उवाच
विमोक्षितो महासत्रात्पशुतामभ्युपागतः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय ९
व्यास उवाच
विमोक्ष्यन्ति विषं क्रुद्धाः करवेय़ेषु भारत ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६०
सञ्जय़ उवाच
विमोक्ष्ये कवचं राजन्सत्येनाय़ुधमालभे ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११५
सञ्जय़ उवाच
विमोक्ष्येऽहं तदा प्राणान्सुहृदः सुप्रिय़ानपि ||
४९ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १७
उपमन्युरु उवाच
विमोचनः सुरगणो हिरण्यकवचोद्भवः |
५८ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
विमोचनमुपस्पृश्य जितमन्युर्जितेन्द्रिय़ः |
१४० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
भीष्म उवाच
विमोच्य चैतौ विधिवत्ततो वाक्यमुवाच ह ||
५० ख
शल्य पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
विमोचय़ामहे सर्वे शापादेतां सरस्वतीम् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७४
कश्यप उवाच
विमोहनं कुरुते देव एष; ततः सर्वं स्पृश्यते पुण्यपापैः ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
विमोहितमिरावन्तमसिना राक्षसोऽवधीत् ||
६९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
विमोहय़ित्वा माय़ाभिस्तस्य गात्राणि साय़कैः |
५८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८०
पराशर उवाच
विरक्तं शोध्यते वस्त्रं न तु कृष्णोपसंहितम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय १२९
युधिष्ठिर उवाच
विरक्तपौरराष्ट्रस्य निर्द्रव्यनिचय़स्य च ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५४
दुर्योधन उवाच
विरक्तराष्ट्राश्च वय़ं मित्राणि कुपितानि नः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
विरक्ताश्च न रुष्यन्ति मनसाप्यर्थकोविदाः |
२१ क
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
विरजं तीर्थमासाद्य विराजति यथा शशी ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
विरजस्कमलं नित्यमनन्तं शुद्धमव्रणम् ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०१
नारद उवाच
विरजा धारणश्चैव सुवाहुर्मुखरो जय़ः |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७६
भीष्म उवाच
विरजा राजशार्दूल सोऽभ्ययात्सृञ्जय़ं नृपम् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४३
व्यास उवाच
विरजाः कालमाकाङ्क्षन्धीरो धैर्येण वर्तते ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८८
हंस उवाच
विरजाः कालमाकाङ्क्षन्धीरो धैर्येण सिध्यति ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
इन्द्र उवाच
विरजाः श्रेय़सा युक्तः प्रेत्य स्वर्गमवाप्नुय़ात् ||
५३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
विरजाः सर्वतो मुक्तो यो नरः स सुखी सदा ||
४५ ख
आदि पर्व
अध्याय ३१
सूत उवाच
विरजाश्च सुवाहुश्च शालिपिण्डश्च वीर्यवान् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
विरजास्तु महाभाग विभुत्वं भुवि नैच्छत |
९५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
श्वशुर उवाच
विरजो व्रह्मभवनं गच्छ विप्र यथेच्छकम् ||
७९ ख
सभा पर्व
अध्याय ७
नारद उवाच
विरजोम्वरश्चित्रमाल्यो ह्रीकीर्तिद्युतिभिः सह ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय २००
व्याध उवाच
विरज्यति यथाकामं न च धर्मं विमुञ्चति ||
४८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६५
भीष्म उवाच
विरज्यते तदा कामान्न च धर्मं विमुञ्चति ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
धृतराष्ट्र उवाच
विरथं कृतवान्कर्णं वासुदेवसमो युवा ||
७४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८०
सञ्जय़ उवाच
विरथं चैनमालोक्य हताश्वं हतसारथिम् |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०९
सञ्जय़ उवाच
विरथं तं रथश्रेष्ठं दृष्ट्वाधिरथिमाहवे |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८३
वैशम्पाय़न उवाच
विरथं तं विधन्वानं गदय़ा परिवर्जितम् |
२२ क
शल्य पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
विरथं तं समालक्ष्य विशिखैर्लोमवाहिभिः |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
विरथं तं समालोक्य व्याय़ुधं च विशेषतः |
४२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८२
सञ्जय़ उवाच
विरथं तं समासाद्य चित्रसेनं मनस्विनम् |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
विरथं धर्मराजं च दृष्ट्वा सुदृढविक्षतम् |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
विरथं भीमकर्माणं भीमं कर्णश्चकार ह ||
२३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
विरथं भ्रातरं कृत्वा भीमसेनमुपाहसत् ||
६९ ख
विराट पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
विरथं मत्स्यराजानं जीवग्राहमगृह्णताम् ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
विरथं रथिनां श्रेष्ठं कारय़ामास साय़कैः ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
विरथं विधनुष्कं च कुरुष्वैनं यदीच्छसि ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय १९
वासुदेव उवाच
विरथं विप्रकीर्णं च भग्नशस्त्राय़ुधं तथा ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय १५८
वैशम्पाय़न उवाच
विरथं विप्लुतं तं तु स गन्धर्वं महावलम् |
२९ क
शल्य पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
विरथं सात्यकिं कृत्वा मद्रराजो महावलः |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०९
सञ्जय़ उवाच
विरथं सैन्धवं चक्रे सर्वलोकस्य पश्यतः ||
१७ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
विरथः स गृहीत्वा तु खड्गं खड्गभृतां वरः |
१४५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४३
सञ्जय़ उवाच
विरथः स तु धर्मात्मा धनुष्पाणिरवस्थितः |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १४२
सञ्जय़ उवाच
विरथः सहदेवस्तु खड्गं चर्म समाददे |
६ क