chevron_left  विवेशarrow_drop_down
आदि पर्व
अध्याय ३८
सूत उवाच
विवेश भवनं राज्ञः पूर्वं द्वाःस्थैर्निवेदितः ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय १७०
व्राह्मण्यु उवाच
विवेश भृगुवंशस्य भूय़ः प्रिय़चिकीर्षय़ा ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
विवेश रङ्गं विस्तीर्णं कर्णः परपुरञ्जय़ः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४
नारद उवाच
विवेश रङ्गं सा कन्या धात्रीवर्षधरान्विता ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय २९२
वैशम्पाय़न उवाच
विवेश राजभवनं पुनः शोकातुरा ततः ||
२४ ख
सभा पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
विवेश राजा मतिमान्पुनर्वार्हद्रथं पुरम् ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४८
भीष्म उवाच
विवेश राज्यं स्वममित्रकर्शनो; दिवं यथा पूर्णवपुर्निशाकरः ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
विवेश वसुधां भित्त्वा श्वसन्विलमिवोरगः ||
५० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
विवेश वसुधां भित्त्वा साशनिर्भृशदारुणा ||
१०५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
विवेश वसुधां भित्त्वा सुरास्तत्र विसिस्मिय़ुः ||
९२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
विवेश वसुधां शीघ्रं सपुङ्खः पृथिवीपते ||
१३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४१
सञ्जय़ उवाच
विवेश वसुधामुग्रः सुपुङ्खः पृथिवीपते ||
३५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३३
वैशम्पाय़न उवाच
विवेश विदुरो धीमान्गात्रैर्गात्राणि चैव ह |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
विवेश विपुलः काय़माकाशं पवनो यथा ||
५६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२४
भीष्म उवाच
विवेश विवरं भूमेर्यत्रास्ते वाग्यतो वसुः ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय ५४
सूत उवाच
विवेश शिष्यैः सहितो वेदवेदाङ्गपारगैः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
विवेश शोभय़ा युक्तं भ्रातृभिश्च सहानघ |
३६ क
वन पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
विवेश सर्वैः सहितो द्विजाग्र्यैः; कृताञ्जलिर्धर्मभृतां वरिष्ठः ||
२३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ११
वासुदेव उवाच
विवेश सहसा ज्योतिर्जग्राह विषय़ं ततः ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ११
वासुदेव उवाच
विवेश सहसा वाय़ुं जग्राह विषय़ं ततः ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ११
वासुदेव उवाच
विवेश सहसा शक्रं जग्राह विषय़ं ततः ||
१७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ११
वासुदेव उवाच
विवेश सहसैवापो जग्राह विषय़ं ततः ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय १६८
गन्धर्व उवाच
विवेश सहितस्तेन वसिष्ठेन महात्मना ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
विवेश सामात्यपुरोहितोऽरिहा; विविक्तमत्यर्थमनोहरं शिवम् ||
४२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
विवेश सुमहानादैरापूर्य भरतर्षभ ||
१८ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
विवेश सोमं धर्मात्मा कर्मणोऽन्ते महारथः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय २४२
वैशम्पाय़न उवाच
विवेश हास्तिनपुरं सहितः कर्णसौवलैः ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
विवेशाधिरथो रङ्गं यष्टिप्राणो ह्वय़न्निव ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
विवेशान्तःपुरं राजंस्तेऽन्ये जग्मुर्यथालय़म् ||
४० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
विवेष्टन्तः स्म दृश्यन्ते व्याधिक्लिष्टा नरा इव ||
२२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
विवेष्टमानं मह्यां च सुभृशं गाढवेदनम् ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय ४७
सूत उवाच
विवेष्टमानाः कृपणा आह्वय़न्तः परस्परम् ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २६
अङ्गिरा उवाच
विवोध्यते विमानस्थः सोऽप्सरोभिरभिष्टुतः ||
९ ग
वन पर्व
अध्याय २६९
मार्कण्डेय़ उवाच
विव्यथुः सकला येन त्रय़ो लोकाश्चराचराः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३९
वैशम्पाय़न उवाच
विव्यथुश्चुक्रुशुश्चैव तस्य वाक्यप्रधर्षिताः ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७८
सञ्जय़ उवाच
विव्यथे न च राजेन्द्र तव पुत्रो जनेश्वरः ||
४५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
विव्यथे नैव गाङ्गेय़ो भिद्यमानेषु मर्मसु ||
४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १८
वासुदेव उवाच
विव्यथे पृथिवी देवी पर्वताश्च चकम्पिरे ||
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
विव्यथे सुविरूढेव लता वाय़ुसमीरिता ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
विव्यधाते न चाकम्पत्कार्ष्णिर्मेरुरिवाचलः ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११०
सञ्जय़ उवाच
विव्यधाते महावाहुं वहुधा मर्मभेदिभिः ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
विव्यधुः कर्णमासाद्य त्रिभिस्त्रिभिरजिह्मगैः ||
५३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४५
सञ्जय़ उवाच
विव्यधुः पञ्चभिस्तूर्णमेकैको रथिनां वरः ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२८
सञ्जय़ उवाच
विव्यधुः समरे तूर्णं निन्युश्चैव यमक्षय़म् ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८३
सञ्जय़ उवाच
विव्यधुः समरे तूर्णं सौमदत्तिममर्षणम् ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
विव्यधुः समरे भीष्मं परिवार्य समन्ततः ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९०
सञ्जय़ उवाच
विव्यधुः साय़कैर्गाढं कृतवर्माणमाहवे ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९०
सञ्जय़ उवाच
विव्यधुः साय़कैर्हृष्टा रक्षार्थं मारुतेर्मृधे ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४७
सञ्जय़ उवाच
विव्यधुः सोमकास्तूर्णं समन्ताच्छरवृष्टिभिः ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११०
सञ्जय़ उवाच
विव्यधुर्निशितैर्वाणै रुक्मपुङ्खैरजिह्मगैः ||
१० ख