आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
पितो उवाच
तव प्रसवनिर्वृत्या मम लोकाः किलाक्षय़ाः |
४३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
तव प्रसादात्संवृत्तमिदं सर्वं महामुने |
६२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
तव प्रसादादिच्छामि सिन्धुराजानमाहवे |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
तव प्रसादाद्गोविन्द पाण्डवा निहतद्विषः |
२४ क
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
तव प्रसादाद्गोविन्द प्राप्तवानस्मि वै क्रतुम् ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
तव प्रसादाद्गोविन्द भूतात्मा ह्यसि शाश्वतः ||
१ ग
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
तव प्रसादाद्गोविन्द राज्यं निहतकण्टकम् |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२४
सञ्जय़ उवाच
तव प्रसादाद्गोविन्द वय़ं जेष्यामहे रिपून् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५४
भीष्म उवाच
तव प्रसादाद्गोविन्द सद्यो व्यपगतानघ ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५४
भीष्म उवाच
तव प्रसादाद्धि शुभा मनो मे वुद्धिराविशत् ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
तव प्रसादाद्भगवन्महर्षेश्च महात्मनः |
२७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
तव प्रसादाद्भगवन्विशोकोऽय़ं महीपतिः |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३१
युधिष्ठिर उवाच
तव प्रसादाद्वालास्ते प्राप्ता राज्यमरिन्दम |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
तव प्रसादाद्विजय़ः क्रोधात्तव पराजय़ः |
६३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
तव प्राज्ञ प्रसादाद्धि क्षिप्रं प्राप्स्यामि जीवितम् ||
७६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
तव प्राणैः प्रिय़तरः किरीटिन्नेति सात्यकिः ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
तव प्रिय़हिते युक्तो महेष्वासो महावलः |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
तव प्रिय़ार्थं मम जीवितं हि; व्रवीमि सत्यं तदवेहि राजन् |
१०० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२१
श्रीभगवानु उवाच
तव भक्तिमतो व्रह्मन्वक्ष्यामि तु यथातथम् ||
२७ ख
सभा पर्व
अध्याय
१७
राक्षस्यु उवाच
तव भाग्यैर्महाराज हेतुमात्रमहं त्विह ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१४५
युधिष्ठिर उवाच
तव भीम वलेनाहमतिभीमपराक्रम |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
तव भ्राता मम सखा सम्वन्धी शिष्य एव च |
३३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
तव मध्यावतरणं मम कृष्ण न रोचते ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
तव मम च गुणैर्महानुभावा; जुषतु मतिं सततं स्वधर्मय़ुक्तैः |
१०० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
तव मातरमित्युक्त्वा ततो मां पुनरव्रवीत् |
४३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
तव मृत्युं रणे कर्णं मन्यते पुरुषर्षभः ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
तव मोक्षस्य चाप्यस्य जिज्ञासार्थमिहागता ||
१८७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
तव यत्सन्दिदेशासौ पाण्डवानां वलाग्रणीः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७६
सञ्जय़ उवाच
तव योधा महाराज हतमेव जय़द्रथम् ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
तव योधा हतोत्साहा विभ्रान्तमनसस्तदा ||
६० ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
तव राजन्रिपुवले कालवत्प्रचरिष्यति ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
तव राजन्सवर्णास्मि शुद्धय़ोनिरविप्लुता ||
१८१ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
तव राजेन्द्र तेन त्वं भीमसेनं जिघांससि ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
तव राजेन्द्र पुत्राणां पाण्डवानां तथैव च ||
२४ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
कर्ण उवाच
तव वश्या भविष्यन्ति वनं यास्यन्ति वा पुनः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
तव वश्या हि सततं पाण्डवाः प्रिय़दर्शने |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
तव वा नाहुष कुले कः स्त्रिय़ं स्प्रष्टुमर्हति ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७६
अर्जुन उवाच
तव वाक्यं तु मे श्रुत्वा प्रतिभाति परन्तप ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
तव वाक्यमभिश्रुत्य हर्षेणास्मि परिप्लुतः ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
तव वाक्यानि दिव्यानि तत्र तेषां च माधव |
७१ क
शल्य पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
तव वाहुवलं प्राप्य धार्तराष्ट्रा महावलाः |
८ ख
वन पर्व
अध्याय
१९२
मार्कण्डेय़ उवाच
तव विक्रमणैर्देवा निर्वाणमगमन्परम् |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
स्नुषो उवाच
तव विप्र प्रसादेन लोकान्प्राप्स्याम्यभीप्सितान् ||
५१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२३
सञ्जय़ उवाच
तव वीर्यं वलं चैव रुद्रशक्रान्तकोपमम् |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
तव वीर्यपरित्राताः शुद्धास्तीर्थपरिप्लुताः |
७ क
सभा पर्व
अध्याय
१७
राक्षस्यु उवाच
तव वेश्मनि राजेन्द्र पूजिता न्यवसं सुखम् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६३
गन्धर्व उवाच
तव वैवस्वती पार्थ तापत्यस्त्वं यय़ा मतः ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२७
सञ्जय़ उवाच
तव व्याय़च्छमानस्य द्रोणस्य च महात्मनः |
३ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२०
गान्धार्यु उवाच
तव शस्त्रजिताँल्लोकान्धर्मेण च दमेन च |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५०
भीष्म उवाच
तव शाखा महाशाख स्कन्धं च विपुलं तथा |
९ क