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शल्य पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
विशस्तं भ्रातरं दृष्ट्वा कर्णपुत्रौ महारथौ |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९७
सञ्जय़ उवाच
विशस्त्रकवचा रुग्णास्तत्र तत्र पतन्ति च |
४८ क
कर्ण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
विशस्त्रकवचान्वाणैः कृत्वा पाण्ड्योऽकरोद्व्यसून् ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६७
सञ्जय़ उवाच
विशस्त्रकवचाश्चान्ये वाहनेभ्यः क्षितिं गताः |
१५ क
कर्ण पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
विशस्त्रक्षतदेहं च प्राय़ आसीत्पराङ्मुखम् ||
३० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५८
सञ्जय़ उवाच
विशस्त्रपत्रकवचैर्युद्धशौण्डैर्गतासुभिः |
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
विशस्त्रांश्च तथैवान्यान्सशस्त्रांश्च वहून्हतान् |
११३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
विशस्त्रय़न्त्रकवचान्मुक्तकेशान्कृताञ्जलीन् |
१०१ क
वन पर्व
अध्याय १२८
लोमश उवाच
विशस्य चैनं विधिना वपामस्य जुहाव सः ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
विशाखस्तु यय़ौ येन देवी गिरिवरात्मजा |
३९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६३
नारद उवाच
विशाखाय़ामनड्वाहं धेनुं दत्त्वा च दुग्धदाम् |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
विशाखो हुतभुग्वाय़ुश्चन्द्रादित्यौ प्रभाकरौ ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय १७४
वैशम्पाय़न उवाच
विशाखय़ूपं समुपेत्य चक्रु; स्तदा निवासं पुरुषप्रवीराः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
विशाखय़ूपे देवानां सर्वेषामग्नय़श्चिताः |
३ क
वन पर्व
अध्याय ८८
धौम्य उवाच
विशाखय़ूपेऽतप्यन्त तस्मात्पुण्यतमः स वै ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३
व्यास उवाच
विशाखय़ोः समीपस्थौ वृहस्पतिशनैश्चरौ ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय २८५
सूर्य उवाच
विशाखय़ोर्मध्यगतः शशीव विमलो दिवि ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
विशारदं रथमार्गेष्वसक्तं; धुर्यं नित्यं समरेषु प्रवीरम् |
१६ क
विराट पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
विशारदानां वश्यानां हृष्टानां चानुय़ाय़िनाम् |
२८ क
वन पर्व
अध्याय २९४
वैशम्पाय़न उवाच
विशालं पृथिवीराज्यं क्षेमं निहतकण्टकम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
विशालशाखां विस्तीर्णामतिद्युतिसमन्विताम् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय १४२
युधिष्ठिर उवाच
विशाला वदरी यत्र नरनाराय़णाश्रमः |
२३ क
सभा पर्व
अध्याय १४
युधिष्ठिर उवाच
विशाला वहुला भूमिर्वहुरत्नसमाचिता |
४ क
शल्य पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
विशालां तु गय़ेष्वाहुरृषय़ः संशितव्रताः |
२० क
वन पर्व
अध्याय १५२
भीम उवाच
विशालां वदरीं प्राप्तो भ्रातृभिः सह राक्षसाः ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
विशालाक्षं सुकेशान्तं चारुवाक्यं सुगन्धि च |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८४
सञ्जय़ उवाच
विशालाक्षशिरश्छित्त्वा पातय़ामास भूतले |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
विशालाक्षश्च भगवान्काव्यश्चैव महातपाः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
विशालान्राजमार्गांश्च कारय़ेत नराधिपः |
५१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
विशालाय़तताम्राक्षैः पद्मेन्दुसदृशाननैः |
५४ क
वन पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
विशालैरग्निशरणैः स्रुग्भाण्डैराचितं शुभैः |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
विशालैश्चाग्निशरणैर्भूषितं कुशसंवृतम् ||
३६ ख
शल्य पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
विशिखानां शतेनैनमाजघान समन्ततः ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
विशिखानेव पश्यन्ति भीष्मचापच्युतान्वहून् ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
विशिखेन सुतीक्ष्णेन खड्गमस्य द्विधाकरोत् ||
४८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४२
सञ्जय़ उवाच
विशिखैर्वहुभिर्विद्ध्वा ततो निन्ये यमक्षय़म् ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
विशिखोन्मथितैर्गात्रैर्वाहुभिश्च सकार्मुकैः |
८ क
विराट पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
विशिखोन्मथितैर्गात्रैर्वाहुभिश्च सकार्मुकैः |
१२ क
स्त्री पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
विशिरस्कानथो काय़ान्दृष्ट्वा घोराभिनन्दिनः |
५० क
भीष्म पर्व
अध्याय ८९
सञ्जय़ उवाच
विशिरस्कैर्मनुष्यैश्च छिन्नगात्रैश्च वारणैः |
२७ क
कर्ण पर्व
अध्याय २३
शल्य उवाच
विशिष्टं देवकीपुत्रात्प्रीतिमानस्म्यहं त्वय़ि ||
५१ ख
वन पर्व
अध्याय १६९
अर्जुन उवाच
विशिष्टं देवनगरादपृच्छं मातलिं ततः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
विशिष्टं वहुभिर्यज्ञैः क्षत्रधर्ममनुस्मर ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४२
व्यास उवाच
विशिष्टं सर्वधर्मेभ्यस्तमिहैकमनाः शृणु ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
विशिष्टं सर्वशिष्येभ्यः प्रीतिमांश्चाभवत्तदा ||
७२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
विशिष्टः सर्वय़ज्ञेभ्यो ददतस्तात वर्तताम् ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
विशिष्टः सर्वय़ज्ञेभ्यो नित्यं तात प्रवर्तताम् ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
विशिष्टतां ज्ञातिषु च लभन्ते नात्र संशय़ः ||
७३ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
विशिष्टमिति मन्यामि यथा प्राहुर्मनीषिणः ||
५३ ख
आदि पर्व
अध्याय १४
सूत उवाच
विशिष्टवलमीप्सन्त्या पञ्चवर्षशतात्परः ||
२० ख