chevron_left  देवकार्यमुपाकृत्यarrow_drop_down
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
देवकार्यमुपाकृत्य पितृकार्यमथापि च |
७५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
देवकार्यादपि मुने पितृकार्यं विशिष्यते |
५५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
महेश्वर उवाच
देवकार्यार्थसिद्ध्यर्थं पिनाकं मे करे स्थितम् ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय ९२
स्त्र्यु उवाच
देवकार्यार्थसिद्ध्यर्थमुषिटाहं त्वय़ा सह ||
४९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
देवकी सुप्रजा देवी त्वय़ा पुरुषसत्तम |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
देवकीतनय़ः प्रीतो देवकल्पमकल्पय़त् ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
देवकीनन्दनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः ||
११९ ख
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
देवकूटं समासाद्य व्रह्मर्षिगणसेवितम् |
१२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६३
भीष्म उवाच
देवक्या नारदेनेह सा स्नुषाभ्योऽव्रवीदिदम् ||
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६३
भीष्म उवाच
देवक्याश्चैव संवादं देवर्षेर्नारदस्य च ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय २१८
मार्कण्डेय़ उवाच
देवगन्धर्वगीतैश्च सर्वैरप्सरसां गणैः ||
३७ ख
आदि पर्व
अध्याय १५८
गन्धर्व उवाच
देवगन्धर्ववाहास्ते दिव्यगन्धा मनोगमाः |
४६ क
वन पर्व
अध्याय १९५
मार्कण्डेय़ उवाच
देवगन्धर्वसहिताः समवैक्षन्महर्षय़ः ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय २०४
नारद उवाच
देवगन्धर्वय़क्षाणां नागपार्थिवरक्षसाम् |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
कृप उवाच
देवगन्धर्वय़क्षाणां मनुष्योरगरक्षसाम् |
३३ ख
वन पर्व
अध्याय २७५
मार्कण्डेय़ उवाच
देवगन्धर्वय़क्षाणां मानुषासुरभोगिनाम् |
४७ क
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
देवगर्भोपमैः पुत्रैर्व्यूढोरस्कैर्महावलैः |
८२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
देवगर्भोऽजितः सङ्ख्ये मनुष्यैरधिको भुवि ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
देवगर्भौ देवसमौ देवतुल्यौ च रूपतः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय २८५
सूर्य उवाच
देवगुह्यं त्वय़ा ज्ञातुं न शक्यं पुरुषर्षभ |
९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
देवगुह्यमिदं प्रीत्या मय़ा वः कथितं महत् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
देवगोष्ठे गवां मध्ये व्राह्मणानां क्रिय़ापथे |
१९ क
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
देवता त्वं हि कल्याणि त्वां वय़ं शरणं गताः ||
११४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६३
भीष्म उवाच
देवता व्राह्मणाः सन्तो यक्षा मानुषचारणाः |
५४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
देवताः पञ्चभूतस्थाः किं भूय़ः श्रोतुमिच्छसि ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय ७
सूत उवाच
देवताः पितरश्चैव जुह्वते मय़ि यत्सदा |
१० क
आदि पर्व
अध्याय ७
सूत उवाच
देवताः पितरश्चैव तेन तृप्ता भवन्ति वै ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
देवताः पितरश्चैव पूर्वे ये चास्य वान्धवाः |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय ७
सूत उवाच
देवताः पितरस्तस्मात्पितरश्चापि देवताः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
देवताः पूजय़न्तीह दैवेनैवेह तेजसा |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
देवताः पूजय़न्नित्यमतिथींश्च द्विजैः सह |
४ क
वन पर्व
अध्याय ६६
वृहदश्व उवाच
देवताः पूजय़ामास व्राह्मणांश्च यशस्विनी |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
देवताः स्थापय़िष्यामि स्वेषु स्थानेषु नारद |
७६ ख
वन पर्व
अध्याय २०४
मार्कण्डेय़ उवाच
देवतागृहसङ्काशं दैवतैश्च सुपूजितम् |
६ क
आदि पर्व
अध्याय १६५
वसिष्ठ उवाच
देवतातिथिपित्रर्थमाज्यार्थं च पय़स्विनी |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
देवतातिथिपूजासु गुरुशुश्रूषणे रता |
३८ क
विराट पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
देवतातिथिपूजासु सर्वभूतानुरागवान् ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३२
नारद उवाच
देवतातिथिपूजाय़ां प्रसक्ता गृहमेधिनः |
१९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४६
व्रह्मो उवाच
देवतातिथिपूर्वं च सदा भुञ्जीत वाग्यतः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९३
भीष्म उवाच
देवतातिथिभिः सार्धं पितृभिश्चोपभुञ्जते |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
देवतातिथिभिश्चैव पितृभिश्चैव पार्थिव |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
भीष्म उवाच
देवतातिथिभृत्यानां निरुप्य पतिना सह ||
४५ ख
वन पर्व
अध्याय १९९
मार्कण्डेय़ उवाच
देवतातिथिभृत्यानां पितॄणां प्रतिपूजनात् ||
४ ग
वन पर्व
अध्याय २९७
युधिष्ठिर उवाच
देवतातिथिभृत्यानां पितॄणामात्मनश्च यः |
३९ क
वन पर्व
अध्याय १९७
मार्कण्डेय़ उवाच
देवतातिथिभृत्यानां श्वश्रूश्वशुरय़ोस्तथा |
१५ क
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
देवतातिथिभृत्यानामवशिष्टेन वर्तय़े ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८१
पराशर उवाच
देवतातिथिभृत्येभ्यः पितृभ्योऽथात्मनस्तथा |
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४५
व्रह्मो उवाच
देवतातिथिशिष्टाशी निरतो वेदकर्मसु |
१७ क
वन पर्व
अध्याय २४६
व्यास उवाच
देवतातिथिशेषेण कुरुते देहय़ापनम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६३
भीष्म उवाच
देवतातिथिशेषेण फलमूलाशनो द्विजः |
३३ क