स्त्री पर्व
अध्याय
२४
गान्धार्यु उवाच
दिष्ट्या नेदं महाराज दारुणं भरतक्षय़म् |
४ क
वन पर्व
अध्याय
२९८
यक्ष उवाच
दिष्ट्या पञ्चसु रक्तोऽसि दिष्ट्या ते षट्पदी जिता |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२४
सञ्जय़ उवाच
दिष्ट्या पश्यामि वां वीरौ विमुक्तौ सैन्यसागरात् |
२९ क
शल्य पर्व
अध्याय
२९
दुर्योधन उवाच
दिष्ट्या पश्यामि वो मुक्तानीदृशात्पुरुषक्षय़ात् |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२४
सञ्जय़ उवाच
दिष्ट्या पश्यामि सङ्ग्रामे तीर्णभारौ महारथौ |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३९
सञ्जय़ उवाच
दिष्ट्या पश्यामि सङ्ग्रामे मानिनं शत्रुमागतम् |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७
शल्य उवाच
दिष्ट्या पापसमाचारः कृतः सर्पो महीतले ||
२० ग
आदि पर्व
अध्याय
१८३
वैशम्पाय़न उवाच
दिष्ट्या पापो धृतराष्ट्रस्य पुत्रः; सहामात्यो न सकामोऽभविष्यत् ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९५
भीष्म उवाच
दिष्ट्या पुरोचनः पापो नसकामोऽत्ययं गतः ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८१
श्रीरु उवाच
दिष्ट्या प्रसादो युष्माभिः कृतो मेऽनुग्रहात्मकः |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
दिष्ट्या प्राप्तोऽसि कौन्तेय़ सहामात्यो युधिष्ठिर |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
दिष्ट्या प्राप्तोऽसि धर्मज्ञ दिष्ट्या स्मरसि मेऽनघ ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
२३५
वैशम्पाय़न उवाच
दिष्ट्या भवद्भिर्वलिभिः शक्तैः सर्वैर्न हिंसितः |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय
६६
वैशम्पाय़न उवाच
दिष्ट्या भवन्तः सम्प्राप्ताः सर्वे कुशलिनो वनात् |
२५ क
सभा पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
दिष्ट्या भीमेन वलवाञ्जरासन्धो निपातितः |
४५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७९
भीष्म उवाच
दिष्ट्या भीष्म मय़ा सार्धं योद्धुमिच्छसि सङ्गरे ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९८
धृतराष्ट्र उवाच
दिष्ट्या मम परं दुःखमपनीतं महाद्युते ||
६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
दिष्ट्या महात्मा कौन्तेय़ं महाय़ोगवलान्वितः ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
दिष्ट्या महारथो वीरः पितुस्तुल्यपराक्रमः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
दिष्ट्या मुक्ताः स्थ सङ्ग्रामादस्माल्लोकभय़ङ्करात् |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
दिष्ट्या मे विपुला लक्ष्मीर्मृते त्वन्यं गता विभो ||
२४ ख
सभा पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
दिष्ट्या मोक्षाद्यशो दीप्तमाप्तं ते पुरुषोत्तम ||
३३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
दिष्ट्या युवामनुप्राप्तौ जित्वासुरमिवामरौ ||
९ ग
स्त्री पर्व
अध्याय
२४
गान्धार्यु उवाच
दिष्ट्या यूपध्वजं वीरं पुत्रं भूरिसहस्रदम् |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
दिष्ट्या रक्षो हतं युद्धे सूतपुत्रेण मानद ||
५७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
दिष्ट्या राजंस्त्वमद्येमामखिलां भोक्ष्यसे महीम् |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
दिष्ट्या राजंस्त्वामरोगं प्रपश्ये; सहाय़वन्तं च महेन्द्रकल्पम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
दिष्ट्या राज्यं पुनः प्राप्तं धर्मेण च वलेन च ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
२३१
वैशम्पाय़न उवाच
दिष्ट्या लोके पुमानस्ति कश्चिदस्मत्प्रिय़े स्थितः |
१७ ख
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
दिष्ट्या वर्धसि धर्मज्ञ साम्राज्यं प्राप्तवान्विभो |
३६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७
अगस्त्य उवाच
दिष्ट्या वर्धामहे शक्र हतो व्राह्मणकण्टकः ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९८
धृतराष्ट्र उवाच
दिष्ट्या वर्धामहे सर्वे दिष्ट्या शान्तः पुरोचनः |
६ क
वन पर्व
अध्याय
१७१
युधिष्ठिर उवाच
दिष्ट्या वर्धामहे सर्वे दिष्ट्यासि पुनरागतः ||
१३ ख
विराट पर्व
अध्याय
२३
कन्या ऊचुः
दिष्ट्या विनिहताः सूता ये त्वां क्लिश्यन्त्यनागसम् ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२४
सञ्जय़ उवाच
दिष्ट्या शत्रुगणाश्चैव निमग्नाः शोकसागरे ||
४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
६
युधिष्ठिर उवाच
दिष्ट्या शुश्रूषमाणस्त्वां मोक्ष्यामि मनसो ज्वरम् ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३१
युधिष्ठिर उवाच
दिष्ट्या शूरोऽसि कौरव्य दिष्ट्या जानासि सङ्गरम् |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
दिष्ट्या शृणोमि गर्जन्तौ वासुदेवधनञ्जय़ौ ||
३४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
दिष्ट्या स कुशली जिष्णुरुपय़ाति च माधव ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
२३६
वैशम्पाय़न उवाच
दिष्ट्या समग्रान्पश्यामि भ्रातॄंस्ते कुरुनन्दन |
१० क
वन पर्व
अध्याय
७६
वृहदश्व उवाच
दिष्ट्या समेतो दारैः स्वैर्भवानित्यभ्यनन्दत ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२३
सञ्जय़ उवाच
दिष्ट्या सम्पादिता जिष्णो प्रतिज्ञा महती त्वय़ा |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
दिष्ट्या सहाय़वन्तश्च दिष्ट्या धर्मे च ते रताः ||
२ ख
विराट पर्व
अध्याय
२३
कन्या ऊचुः
दिष्ट्या सैरन्ध्रि मुक्तासि दिष्ट्यासि पुनरागता |
१९ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२४
गान्धार्यु उवाच
दिष्ट्या स्नुषाणामाक्रन्दे घोरं विलपितं वहु |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
दिष्ट्या स्वधर्मं प्राप्तोऽसि विक्रमेण महाद्युते ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७
शल्य उवाच
दिष्ट्या हतारिं पश्यामि भवन्तं वलसूदन ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
दिष्ट्या हतो नैकृतिको दुरात्मा; सहात्मजो वीर रणे त्वय़ेति ||
६३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
दिष्ट्या हतोऽय़ं पापात्मा सामात्यज्ञातिवान्धवः ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५५
वासुदेव उवाच
दिष्ट्यापनीतकवचो दिष्ट्यापहृतकुण्डलः |
१४ क