शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
सात्त्विकस्तु स विज्ञेय़ो भवेन्मोक्षे च निश्चितः ||
६८ ख
वन पर्व
अध्याय
२०३
व्याध उवाच
सात्त्विकस्त्वथ सम्वुद्धो लोकवृत्तेन क्लिश्यते |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६७
असित उवाच
सात्त्विकस्य निमित्तानि भावान्संश्रय़ते स्मृतिः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०२
याज्ञवल्क्य उवाच
सात्त्विकस्योत्तमं स्थानं राजसस्येह मध्यमम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
वसिष्ठ उवाच
सात्त्विका देवलोकाय़ गच्छन्ति सुखभागिनः ||
४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
भीष्म उवाच
सात्त्विका राजसाश्चैव तामसा ये च केचन |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
सात्त्विकानां च जन्तूनां कुत्सितं भरतर्षभ |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६७
असित उवाच
सात्त्विकाश्चैव ये भावास्तथा राजसतामसाः |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३९
श्रीभगवानु उवाच
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३६
वैशम्पाय़न उवाच
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति भारत ||
६३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति भारत ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१२
भीष्म उवाच
सात्त्विको राजसश्चैव तामसश्चैव ते त्रय़ः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०९
गुरुरु उवाच
सात्त्विको वा यथाय़ोगमानन्तर्यफलोदय़ः ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
सात्मानं मन्यमानापि कृतकृत्यं श्रमान्विता |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
सात्यकिं कुन्तिभोजं च राक्षसं च घटोत्कचम् ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
सात्यकिं च त्रिभिर्विद्ध्वा पुनर्विव्याध सोऽष्टभिः |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय
७८
नकुल उवाच
सात्यकिं च महावीर्यं विराटं च सहात्मजम् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८९
धृतराष्ट्र उवाच
सात्यकिं च रणे दृष्ट्वा प्रविशन्तमभीतवत् |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
सञ्जय़ उवाच
सात्यकिं च रथोदारं कम्पय़ामास मार्गणैः ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
सात्यकिं च शतेनाजौ सहदेवं त्रिभिः शरैः ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
सात्यकिं चक्ररक्षौ च भीमः कर्णमय़ोधय़त् ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
सात्यकिं चापि सम्प्रेक्ष्य युध्यमानं नरर्षभम् |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
सात्यकिं चाभिमन्युं च महत्या सेनय़ा सह |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
सात्यकिं चेकितानं च धृष्टद्युम्नशिखण्डिनौ |
५० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३७
सञ्जय़ उवाच
सात्यकिं चेषुजालेन सोमदत्तो अपीडय़त् ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३७
सञ्जय़ उवाच
सात्यकिं छादय़ामास शरवृष्ट्या महावलः ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
सात्यकिं छिन्नधन्वानं प्रहसन्निव भारत |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
सात्यकिं तु नरव्याघ्रं व्याघ्रदत्तस्त्ववारय़त् |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
सात्यकिं तु महाराज प्रहसन्निव भारत |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
सात्यकिं ते समासाद्य पृतनास्वनिवर्तिनम् |
३२ क
शल्य पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
सात्यकिं त्रिभिराहत्य धनुरेकेन चिच्छिदे ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
सात्यकिं दंशितं युद्धे भीष्माय़ाभ्युद्यतं तदा |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
सात्यकिं दशभिर्विद्ध्वा भीमसेनं त्रिभिः शरैः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
सात्यकिं दशभिर्विद्ध्वा सिंहनादं ननाद ह ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
सात्यकिं दशभिर्विद्ध्वा हय़ांश्चास्य त्रिभिः शरैः |
७२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
सात्यकिं पञ्चभिर्विद्ध्वा मत्स्यं च दशभिः शरैः ||
२८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३९
सञ्जय़ उवाच
सात्यकिं पञ्चविंशत्या प्राविध्यत शिलाशितैः ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
सात्यकिं पञ्चविंशत्या भीमसेनं च पञ्चभिः |
५४ क
शल्य पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
सात्यकिं पञ्चविंशत्या शल्यो विव्याध मारिष |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
सात्यकिं पूरय़न्तौ तौ चेरतुर्लघु सुष्ठु च ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
सात्यकिं प्रतिविव्याध चित्रपुङ्खैः शितैः शरैः ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७२
सञ्जय़ उवाच
सात्यकिं प्रेक्ष्य गोप्तारं पाञ्चाल्यस्य महाहवे |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
सात्यकिं प्रेषय़ित्वा तु पाण्डवस्य पदानुगम् |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
सात्यकिं प्रय़यौ क्रुद्धः शूरो रथवरं युधि ||
४० ख
शल्य पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
सात्यकिं भीमसेनं च माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ |
६० क
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
सात्यकिं मोक्षय़स्वाद्य यमदंष्ट्रान्तरं गतम् ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
सात्यकिं यदि हन्यामो धृष्टद्युम्नं च पार्षतम् |
५४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
सात्यकिं रभसं युद्धे द्रौणिर्व्राह्मणपुङ्गवः |
९ क
वन पर्व
अध्याय
२२
वासुदेव उवाच
सात्यकिं वलदेवं च प्रद्युम्नं च महारथम् |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
सात्यकिं वलदेवं च ये चान्येऽन्धकवृष्णय़ः |
२८ क