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आदि पर्व
अध्याय १२५
वैशम्पाय़न उवाच
द्वारं चाभिमुखाः सर्वे वभूवुः प्रेक्षकास्तदा ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
द्वारं त्वं स्वर्गमोक्षाणामाक्षेप्ता त्वं ददासि च ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय १३०
लोमश उवाच
द्वारं निषादराष्ट्रस्य येषां द्वेषात्सरस्वती |
४ क
सभा पर्व
अध्याय ५९
विदुर उवाच
द्वारं सुघोरं नरकस्य जिह्मं; न वुध्यसे धृतराष्ट्रस्य पुत्र |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
द्वारकां तु गते कृष्णे युधिष्ठिरपुरोगमाः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय २३
वैशम्पाय़न उवाच
द्वारकां प्रय़यौ कृष्णः समाश्वास्य युधिष्ठिरम् ||
४५ ख
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
द्वारकां रत्नसम्पूर्णां जलेनाप्लावय़त्तदा ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय २२
वासुदेव उवाच
द्वारकाधिपतिर्वीर आह त्वामाहुको वचः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६३
भीष्म उवाच
द्वारकामनुसम्प्राप्तं नारदं देवदर्शनम् |
३ क
वन पर्व
अध्याय १३
अर्जुन उवाच
द्वारकामात्मसात्कृत्वा समुद्रं गमय़िष्यसि ||
३१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
द्वारकामेव गोविन्दः शीघ्रवेगैर्महाहय़ैः ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय २२
वासुदेव उवाच
द्वारकामेव रक्षस्व कार्यमेतन्महत्तव ||
१४ ख
सभा पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
द्वारकावासिनं कृष्णं द्वारवत्यां समासदत् ||
२९ ख
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
द्वारकावासिनः पौराः सर्व एव नरर्षभ ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १
युधिष्ठिर उवाच
द्वारकावासिनी कृष्णमितः प्रतिगतं हरिम् ||
१६ ख
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
द्वारकावासिनो ये तु पुरुषाः पार्थमन्वय़ुः |
७३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
द्वारकावासिभिश्चान्यैर्वृष्ण्यन्धकमहारथैः |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
द्वारकाय़ां सुभद्रा च कामय़ानेन कामिनी |
९२ क
आदि पर्व
अध्याय १०२
वैशम्पाय़न उवाच
द्वारतोरणनिर्यूहैर्युक्तमभ्रचय़ोपमैः |
८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ५
सञ्जय़ उवाच
द्वारदेशं तु सम्प्राप्य द्रौणिस्तस्थौ रथोत्तमे ||
३८ ख
आदि पर्व
अध्याय १२५
वैशम्पाय़न उवाच
द्वारदेशात्समुद्भूतो माहात्म्य वलसूचकः |
२७ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ६
धृतराष्ट्र उवाच
द्वारदेशे ततो द्रौणिमवस्थितमवेक्ष्य तौ |
१ क
आदि पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
द्वारदेशे विनिक्षिप्य जगामानुपलक्षितः ||
६ ख
सभा पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
द्वारपालं च तरसा वशे चक्रे महाद्युतिः ||
१० ग
सभा पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
द्वारपालाः समासाद्य हृष्टा वचनमव्रुवन् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय १२९
लोमश उवाच
द्वारमेतद्धि कौन्तेय़ कुरुक्षेत्रस्य भारत ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४५
वासुदेव उवाच
द्वारवत्यां मम गृहे चिरं कालमुपावसत् ||
३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७१
युधिष्ठिर उवाच
द्वारवत्यां यथा चासौ निविशन्त्यां समुद्धृतः |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४२
सनत्सुजात उवाच
द्वाराणि तस्या हि वदन्ति सन्तो; वहुप्रकाराणि दुरावराणि |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६१
कपिल उवाच
द्वाराणि यस्य सर्वाणि सुगुप्तानि मनीषिणः |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
द्वाराण्येतानि धर्मस्य विहितानि स्वय़म्भुवा ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय २९८
यक्ष उवाच
द्वाराण्येतानि मे विद्धि प्रिय़ो ह्यसि सदा मम ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय ७६
वृहदश्व उवाच
द्वारि द्वारि च पौराणां पुष्पभङ्गः प्रकल्पितः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
द्वारेषु च गुरूण्येव यन्त्राणि स्थापय़ेत्सदा |
४३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
द्वावङ्कुशधरौ तेषु द्वावुत्तमधनुर्धरौ |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५७
सञ्जय़ उवाच
द्वावर्थौ युध्यमानस्य तस्मात्कुरुत पौरुषम् ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३८
सञ्जय़ उवाच
द्वावश्वपृष्ठे परिपार्श्वतोऽन्ये; ध्वजेषु चान्ये जघनेषु चान्ये ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय १३४
अष्टावक्र उवाच
द्वावश्विनौ द्वे च रथस्य चक्रे; भार्यापती द्वौ विहितौ विधात्रा ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२८
व्यास उवाच
द्वावात्मानौ च वेदेषु विषय़ेषु च रज्यतः |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२८
व्यास उवाच
द्वावात्मानौ च वेदेषु सिद्धान्तेष्वप्युदाहृतौ ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९१
उतथ्य उवाच
द्वावाददाते ह्येकस्य द्वय़ोश्च वहवोऽपरे |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
द्वाविंशे दिवसे प्राप्ते यो भुङ्क्ते ह्येकभोजनम् |
९० क
वन पर्व
अध्याय १३४
अष्टावक्र उवाच
द्वाविन्द्राग्नी चरतो वै सखाय़ौ; द्वौ देवर्षी नारदः पर्वतश्च |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३३
भीष्म उवाच
द्वाविमावथ पन्थानौ यत्र वेदाः प्रतिष्ठिताः |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
द्वाविमौ कण्टकौ तीक्ष्णौ शरीरपरिशोषणौ |
५२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
द्वाविमौ ग्रसते भूमिः सर्पो विलशय़ानिव |
४९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
द्वाविमौ पुरुषव्याघ्र परप्रत्ययकारिणौ |
५१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६८
भीष्म उवाच
द्वाविमौ पुरुषव्याघ्रौ रथोदारौ मतौ मम ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
द्वाविमौ पुरुषौ राजन्स्वर्गस्योपरि तिष्ठतः |
५३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३७
श्रीभगवानु उवाच
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च |
१६ क