chevron_left  अनुarrow_drop_down
वन पर्व
अध्याय १६३
अर्जुन उवाच
अनु तस्यापरं भूतं महत्कैरातसंस्थितम् |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
अनु तस्याभवद्भोजो जुगोपैनं ततः स्वय़म् ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय १९१
वैशम्पाय़न उवाच
अनु त्वमभिषिच्यस्व नृपतिं धर्मवत्सलम् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७६
भीष्म उवाच
अनु त्वा तात जीवन्तु सुहृदः साधुभिः सह |
३६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २८
यतिरु उवाच
अनु त्वा मन्यतां माता पिता भ्राता सखापि च |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय ७५
शर्मिष्ठो उवाच
अनु त्वां तत्र यास्यामि यत्र दास्यति ते पिता ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
अनु त्वां तात जीवन्तु मित्राणि सुहृदस्तथा |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३१
मातो उवाच
अनु त्वां तात जीवन्तु व्राह्मणाः सुहृदस्तथा |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
अनु दुर्योधनं चान्ये न्यवर्तन्त महारथाः ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय ७५
देवय़ान्यु उवाच
अनु मां तत्र गच्छेत्सा यत्र दास्यति मे पिता ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६०
स्यूमरश्मिरु उवाच
अनु यज्ञं जगत्सर्वं यज्ञश्चानु जगत्सदा ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय १६
वासुदेव उवाच
अनु रथ्यासु सर्वासु चत्वरेषु च कौरव |
२० क
आदि पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
अनु संवत्सराच्छापमोक्षं वै समवाप्स्यथ ||
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
अनुकम्पता सर्ववर्णान्व्रह्मणा समुदाहृतम् ||
१४८ ख
वन पर्व
अध्याय २
व्राह्मणा ऊचुः
अनुकम्पां हि भक्तेषु दैवतान्यपि कुर्वते |
६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
नकुल उवाच
अनुकम्पितो नरो नार्या पुष्टो रक्षित एव च |
२२ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
देवा ऊचुः
अनुकर्षान्ग्रहान्दीप्तान्वरूथं चापि तारकाः |
७० क
द्रोण पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
अनुकर्षैः पताकाभिः शिरस्त्राणैः सकाञ्चनैः |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
अनुकर्षैः पताकाभिरुपासङ्गैर्ध्वजैरपि |
६४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
अनुकर्षैः पताकाभिस्तथा सारथिवाजिभिः |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
अनुकर्षैः शुभै राजन्योक्त्रैश्चव्यसुरश्मिभिः |
३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
अनुकर्षैरुपासङ्गैश्चक्रैर्भग्नैश्च मारिष ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
अनुकीर्णं महारण्यं व्राह्मणैः समपद्यत ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
अनुकीर्णानि रक्षोभिस्तेभ्यो नस्त्रातुमर्हसि ||
१२ ख
मौसल पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
अनुकुर्वन्नुलूकानां सारसा विरुतं तथा |
५ क
वन पर्व
अध्याय २०९
मार्कण्डेय़ उवाच
अनुकूजन्ति येनेह वेदनार्ताः स्वय़ं जनाः |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
अनुकूलः शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः ||
५० ख
वन पर्व
अध्याय २२२
वैशम्पाय़न उवाच
अनुकूलवती नित्यं भवाम्यनलसा सदा ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय २०४
मार्कण्डेय़ उवाच
अनुकूलाः कथा वच्मि विप्रिय़ं परिवर्जय़न् |
२४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०
भीष्म उवाच
अनुकूलाः कथाः कृत्वा यथावत्पर्यपृच्छत |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४४
भीष्म उवाच
अनुकूलामनुवंशां भ्रात्रा दत्तामुपाग्निकाम् |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
अनुकूलाश्च कार्येषु गुरुवृद्धोपसेविनः ||
४१ ख
विराट पर्व
अध्याय ४
धौम्य उवाच
अनुकूलो भवेच्चास्य सर्वार्थेषु कथासु च |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४१
धृतराष्ट्र उवाच
अनुक्तं यदि ते किञ्चिद्वाचा विदुर विद्यते |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३९
सञ्जय़ उवाच
अनुक्त्वा च ततः किञ्चिच्छरवर्षेण पाण्डवम् |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
अनुक्त्वा तत्र तद्वाच्यं सर्वे तेऽनृतवादिनः ||
१७ ग
वन पर्व
अध्याय २९६
यक्ष उवाच
अनुक्त्वा तु ततः प्रश्नान्पीत्वैव न भविष्यसि ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय २९
वासुदेव उवाच
अनुक्त्वा त्वं धर्ममेवं सभाय़ा; मथेच्छसे पाण्डवस्योपदेष्टुम् |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३५२
नाग उवाच
अनुक्त्वा मद्गतं कार्यं क्वेदानीं प्रस्थितो भवान् |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
सञ्जय़ उवाच
अनुक्त्वा विक्रमेद्यस्तु तद्वै सत्पुरुषव्रतम् ||
१९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
अनुक्त्वा समरे तात शूरा युध्यन्ति शक्तितः |
५४ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
अनुक्रमणिमध्याय़ं भारतस्येममादितः |
१९९ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
अनुक्रमणिमध्याय़ं वृत्तान्तानां सपर्वणाम् ||
६२ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
अनुक्रमण्या यावत्स्यादह्ना रात्र्या च सञ्चितम् ||
२०० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
अनुक्रोशं च संस्मृत्य त्यज वासमिमं द्विज ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११८
भीष्म उवाच
अनुक्रोशं वलं वीर्यं भावं सम्प्रशमं क्षमाम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६६
भीष्म उवाच
अनुक्रोशं विदधतः सर्वावस्थं पदं भवेत् ||
१४ ख
सभा पर्व
अध्याय ४५
दुर्योधन उवाच
अनुक्रोशभय़े चोभे यैर्वृतो नाश्नुते महत् ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५
भीष्म उवाच
अनुक्रोशश्च साधूनां सदा प्रीतिं प्रय़च्छति ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय ९९
वैशम्पाय़न उवाच
अनुक्रोशाच्च भूतानां सर्वेषां रक्षणाय़ च |
३३ क