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अनुशासन पर्व
अध्याय ३२
नारद उवाच
अलोलुपाः पुण्यशीलास्तान्नमस्यामि केशव ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२८
व्यास उवाच
अलोलुपोऽव्यथो दान्तो न कृती न निराकृतिः |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय १३३
वैशम्पाय़न उवाच
अलोहं निशितं शस्त्रं शरीरपरिकर्तनम् |
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
अल्पं च वलमेतेषां कृष्णौ च भृशविक्षतौ |
५७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६९
द्रोण उवाच
अल्पं च विवरं कृत्वा तूर्णं याति धनञ्जय़ः ||
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३९
व्रह्मो उवाच
अल्पं तत्र तमो ज्ञेय़ं सत्त्वं चाल्पतरं ततः ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३९
व्रह्मो उवाच
अल्पं तत्र रजो ज्ञेय़ं तमश्चाल्पतरं ततः ||
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३९
व्रह्मो उवाच
अल्पं तत्र रजो ज्ञेय़ं सत्त्वं चाल्पतरं ततः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७६
भीष्म उवाच
अल्पं तु साधुभूय़िष्ठं यत्कर्मोदारमेव तत् |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४५
भीष्म उवाच
अल्पं वा वहु वा राजन्विक्रय़स्तावदेव सः ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
अल्पं वापि प्रदातव्यं शूद्रापुत्राय़ भारत ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९
युधिष्ठिर उवाच
अल्पं वास्वादु वा भोज्यं पूर्वालाभेन जातु चित् |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
अल्पकश्च यथा राजन्वह्निः शाम्यति दुर्वलः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय ७१
वृहदश्व उवाच
अल्पकार्यं विनिर्दिष्टं तस्यागमनकारणम् ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
अल्पकालं जीवितं यन्मनुष्ये; महास्रावं नित्यदुःखं चलं च |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७
युधिष्ठिर उवाच
अल्पकालस्य राज्यस्य कृते मूढेन घातितः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
अल्पक्षीरास्तथा गावो भविष्यन्ति जनाधिप |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८९
धृतराष्ट्र उवाच
अल्पदानभृतस्तात न कुप्यभृतको नरः ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
अल्पदेहाल्पसाराश्च तथा सत्याल्पभाषिणः ||
३२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
अल्पदोषमिह ज्ञेय़ं विपरीते तु लिप्यते ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
अल्पद्रव्या वृथालिङ्गा हिंसा च प्रभविष्यति |
५० क
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
अल्पपुष्पफलाश्चापि पादपा वहुवाय़साः ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
अल्पप्रज्ञैः सह मन्त्रं न कुर्या; न्न दीर्घसूत्रैरलसैश्चारणैश्च ||
५८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
उमो उवाच
अल्पप्रज्ञो विरूपाक्ष कथं भवति मानवः |
४४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७१
शक्र उवाच
अल्पप्रदाता वहुदः कथं च स्यादिहेश्वर ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय ४९
वृहदश्व उवाच
अल्पभाग्यतरः कश्चित्पुमानस्तीति पाण्डव ||
३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
महेश्वर उवाच
अल्पभोगकुले जाता अल्पभोगरता नराः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय ११०
पाण्डुरु उवाच
अल्पमल्पं यथाभोज्यं पूर्वलाभेन जातु चित् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०५
मुनिरु उवाच
अल्पमिच्छन्नचपलो मृदुर्दान्तः सुसंशितः |
४८ क
वन पर्व
अध्याय १८१
मार्कण्डेय़ उवाच
अल्पवाधपरित्रासाद्भवन्ति निरुपद्रवाः ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय १८१
मार्कण्डेय़ उवाच
अल्पवाधा निरातङ्का सिद्धार्था निरुपद्रवाः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
अल्पवीर्यवलाः स्तव्धा लोभमोहपराय़णाः |
३१ क
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
अल्पवुद्धितय़ा वन्यानुत्सादय़सि यन्मृगान् ||
७७ ख
आदि पर्व
अध्याय ४८
सूत उवाच
अल्पशेषपरीवारो वासुकिः पर्यतप्यत ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३७
भीष्म उवाच
अल्पश्रुताः कुतर्काश्च दृष्टाः स्पृष्टाः कुपण्डिताः ||
१५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २७३
व्रह्मो उवाच
अल्पा इति मतिं कृत्वा यो नरो वुद्धिमोहितः |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६३
भीष्म उवाच
अल्पान्तरगतस्यापि दशधर्मगतस्य वा |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०२
नारद उवाच
अल्पान्तरप्रभावश्च वासवेन रणे रणे ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२१
भीष्म उवाच
अल्पान्तरमहं मन्ये विशिष्टमपि वा त्वय़ा ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
अल्पान्तरमिदं शश्वत्पुराणा मेनिरे जनाः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३१
भीष्म उवाच
अल्पाप्यथेह मर्यादा लोके भवति पूजिता ||
१२ ख
विराट पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
अल्पावशिष्टं कालस्य गतभूय़िष्ठमन्ततः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
अल्पावशिष्टं दिवसं नृवीर; विघातय़स्वाद्य रिपुं शरौघैः |
१२ क
वन पर्व
अध्याय ९५
लोपामुद्रो उवाच
अल्पावशिष्टः कालोऽय़मृतौ मम तपोधन |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४५
प्रजा ऊचुः
अल्पावशिष्टा गाङ्गेय़ ताः परित्रातुमर्हसि ||
२६ ख
शल्य पर्व
अध्याय १
जनमेजय़ उवाच
अल्पावशिष्टाः कुरवः किमकुर्वत वै द्विज ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
अल्पावशिष्टाः सम्भग्नाः कृच्छ्रप्राणा विचेतसः |
४३ क
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
अल्पावशिष्टे तु तदा युगान्ते भरतर्षभ |
२४ क
शल्य पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
अल्पावशिष्टे सैन्ये तु कौरवेय़ान्महाहवे |
१४ क
शल्य पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
अल्पावशिष्टे सैन्येऽस्मिन्सूतपुत्रे च पातिते |
२४ क