chevron_left  जाय़न्तेarrow_drop_down
भीष्म पर्व
अध्याय ३
व्यास उवाच
जाय़न्ते विवृतास्याश्च व्याहरन्तोऽशिवा गिरः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५५
तुलाधार उवाच
जाय़न्तेऽसाधवो धूर्ता लुव्धा वित्तप्रय़ोजनाः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
जाय़मानं हि पुरुषं यं पश्येन्मधुसूदनः |
६८ क
सभा पर्व
अध्याय ४१
शिशुपाल उवाच
जाय़मानेन येनेय़मभवद्दारिता मही ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय ६९
वैशम्पाय़न उवाच
जाय़ा जनय़ते पुत्रमात्मनोऽङ्गं द्विधा कृतम् |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
जाय़ां च ऋतुकाले वै ये मोहादभिगच्छताम् |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
जाय़ाय़ा इति जाय़ात्वं पुराणाः कवय़ो विदुः ||
३६ ख
सभा पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
जिगाय़ करदं चैव स्वराज्ये संन्यवेशय़त् ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५१
धृतराष्ट्र उवाच
जिगाय़ च सुरान्सर्वान्नास्य वेद्मि पराजय़म् ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
जिगाय़ पार्थिवान्सर्वान्राजसूय़े महाक्रतौ ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०
धृतराष्ट्र उवाच
जिगाय़ वरुणं युद्धे सलिलान्तर्गतं पुरा ||
१९ ख
सभा पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
जिगाय़ समरे वीरावाश्विनेय़ः प्रतापवान् ||
१० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८४
वैशम्पाय़न उवाच
जिगाय़ समरे वीरो यज्ञविघ्नार्थमुद्यतम् ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
जिगाय़ समरे वीरो वलेन वलिनां वरः ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
जिगाय़ैकरथेनैव काशिपुर्यां महारथः ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
जिगीषति रिपूनन्यान्रिपवोऽभिभवन्ति तम् ||
६५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
जिगीषतोर्युधान्योन्यमिन्द्रप्रह्रादय़ोरिव ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय २७०
मार्कण्डेय़ उवाच
जिगीषतोर्युधान्योन्यमिन्द्रप्रह्लादय़ोरिव ||
१२ ख
सभा पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
जिगीषन्ति वलाद्राजंस्ते दह्यन्तीह वह्निना ||
२२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७६
वैशम्पाय़न उवाच
जिगीषन्तो नरव्याघ्राः पूर्वं विनिकृता युधि ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५
कर्ण उवाच
जिगीषन्तोऽसुरान्सङ्ख्ये कार्त्तिकेय़मिवामराः ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
जिगीषन्तौ परं स्थानमन्योन्यमभिजघ्नतुः ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
जिगीषमाणं तु गृहे तदा मृत्युः सुदर्शनम् |
४७ क
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
जिगीषमाणः सङ्ग्रामे धार्तराष्ट्रान्सराजकान् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
जिगीषमाणस्त्वां युद्धे पितृपैतामहे पदे ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय १०५
वैशम्पाय़न उवाच
जिगीषमाणो वसुधां यय़ौ शत्रूननेकशः ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८०
सञ्जय़ उवाच
जिगीषुस्तान्नरव्याघ्राञ्जिघांसुश्च जय़द्रथम् ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
जिगीषय़ा ततो देवा वव्रिरेऽऽङ्गिरसं मुनिम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
जिघांसतां दक्षिणाः सिद्धिमाहु; र्ये त्वग्रतस्ते प्रतिषेधय़न्ति ||
१० ख
विराट पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
जिघांसन्तं नरव्याघ्रमर्जुनं तिग्मतेजसम् |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३५
व्यास उवाच
जिघांसन्तं निहत्याजौ न तेन व्रह्महा भवेत् ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७५
सञ्जय़ उवाच
जिघांसन्तः शतानीकं सर्वतः पर्यवारय़न् ||
४९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
जिघांसन्तौ यथा नागं व्याघ्रौ राजन्महावने ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय १८०
वैशम्पाय़न उवाच
जिघांसमानाः कुरुराजपुत्रा; वमर्षय़न्तोऽर्जुनभीमसेनौ ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय २३०
वैशम्पाय़न उवाच
जिघांसमानाः सहिताः कर्णमभ्यद्रवन्रणे ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
जिघांसवः क्रोधवशाः सुभीमा; भीमं समन्तात्परिवव्रुरुग्राः ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
जिघांसुः पुरुषव्याघ्रं भ्रातृभिः सहितो वली |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०८
सञ्जय़ उवाच
जिघांसुः समरे भीष्मं परं यत्नं करिष्यति ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
जिघांसुः सूतपुत्रस्य तस्योपेक्षा न युज्यते ||
५१ ग
कर्ण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
जिघांसुभिर्महेष्वासैर्द्रुतं पार्थानुसर्यते ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
कर्ण उवाच
जिघांसुभिस्तान्कुशलैः शरोत्तमा; न्महाहवे सञ्जवितान्प्रय़त्नतः |
५६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
जिघांसुरर्केन्दुसमप्रभावः; कर्णं समाप्तिं नय़तां यमाय़ ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
जिघांसुरर्केन्दुसमप्रभेण; चक्रे विषक्तं रिपुमातताय़ी ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
जिघांसुरुग्रं द्रुपदात्मजो युवा; प्रमोहनास्त्रं युय़ुजे महारथः |
४२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
जिघांसुर्द्रौणिमाक्रन्दे याति भारत भारतः ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३२
सञ्जय़ उवाच
जिघांसुर्धर्मतनय़ं तव पुत्रहिते रतः ||
३१ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १७०
सञ्जय़ उवाच
जिघांसुर्धार्तराष्ट्रश्च श्रान्तेष्वश्वेषु फल्गुनम् |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८९
सञ्जय़ उवाच
जिघांसुर्भरतश्रेष्ठ दुर्योधनमुपाद्रवत् ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
जिघांसुर्भरतश्रेष्ठ विव्याध निशितैः शरैः ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
जिघांसुर्भरतश्रेष्ठं धृष्टद्युम्नो व्यवासृजत् ||
२७ ख