वन पर्व
अध्याय
२६२
मार्कण्डेय़ उवाच
न ते प्रकृतिमान्वर्णः कच्चित्क्षेमं पुरे तव |
३ क
विराट पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
न ते प्रकृतिमान्वर्णः कृशा पाण्डुश्च लक्ष्यसे |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
न ते प्रतिन्यवर्तन्त समुद्रादिव सिन्धवः ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
न ते प्रभविता मृत्युर्यशस्वी च भविष्यसि ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५
इन्द्राण्यु उवाच
न ते प्रमुखतः स्थातुं कश्चिदिच्छति वीर्यवान् ||
१३ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
३४
भीष्म उवाच
न ते प्रेत्य विनश्यन्ति गच्छन्ति न पराभवम् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
६३
वृहदश्व उवाच
न ते भय़ं नरव्याघ्र दंष्ट्रिभ्यः शत्रुतोऽपि वा |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
न ते मद्विषय़े राम वस्तव्यमिह कर्हिचित् ||
५८ ख
वन पर्व
अध्याय
१२५
लोमश उवाच
न ते मिथ्या समारम्भो भवत्वेष परो विधिः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
सृञ्जय़ उवाच
न ते मोघं विप्रलप्तं महर्षे; दृष्ट्वैव त्वां नारदाहं विशोकः |
१३९ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
३
युधिष्ठिर उवाच
न ते मय़ा जीवय़ितुं हि शक्या; तस्मात्त्यागस्तेषु कृतो न जीवताम् ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
४९
सूत उवाच
न ते मय़ि मनो जातु मिथ्या भवितुमर्हति ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५५
तुलाधार उवाच
न ते यज्ञेष्वात्मसु वा फलं पश्यन्ति किञ्चन ||
१२ ग
आदि पर्व
अध्याय
७२
वैशम्पाय़न उवाच
न ते यशः प्रणशिता भागभाङ्नो भविष्यसि ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
न ते युद्धान्निवर्तन्ते धर्मोपेता महावलाः |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४८
वासुदेव उवाच
न ते राज्यं प्रय़च्छन्ति विना युद्धेन पाण्डव |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२६
सञ्जय़ उवाच
न ते वसुन्धरास्तीति तदहं चिन्तय़े नृप |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
३५
युधिष्ठिर उवाच
न ते वाचं भीमसेनाभ्यसूय़े; मन्ये तथा तद्भवितव्यमासीत् ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९
अग्निरु उवाच
न ते वाचं रोचय़ते मरुत्तो; वृहस्पतेरञ्जलिं प्राहिणोत्सः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
न ते विभेमि पवन यद्यपि त्वं स्वय़म्प्रभुः ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
२९४
इन्द्र उवाच
न ते वीभत्सता कर्ण भविष्यति कथञ्चन |
३१ क
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
न ते वेगं विषहितुं शक्तास्तव विशां पते |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
देवा ऊचुः
न ते शक्तास्मि भगवंस्तेजसोऽस्य विधारणे ||
५७ ग
आदि पर्व
अध्याय
९९
वैशम्पाय़न उवाच
न ते शक्यमनाख्यातुमापद्धीय़ं तथाविधा ||
४ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
युधिष्ठिर उवाच
न ते शक्या दरिद्रेण यज्ञाः प्राप्तुं पितामह |
२ क
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
न ते शक्या दरिद्रेण यज्ञाः प्राप्तुं महीपते |
३५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
न ते शक्याः समाधातुं कथञ्चिदिति मे मतिः ||
२४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३९
व्यास उवाच
न ते शोच्या महात्मानः सर्व एव नरर्षभाः |
४ क
सभा पर्व
अध्याय
३८
शिशुपाल उवाच
न ते श्रुतमिदं भीष्म नूनं कथय़तां सताम् |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
२१९
वैशम्पाय़न उवाच
न ते सखा संनिहितस्तक्षकः पन्नगोत्तमः |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
न ते सुखं प्रवुध्यन्ते न सुखं प्रस्वपन्ति च ||
३८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२४
वैशम्पाय़न उवाच
न ते सुतेष्ववेक्षास्ति तानृषीनुक्तवानसि |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
न ते सौम्य विषत्तव्यं जीविष्यसि यथा पुरा |
४९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
न ते स्थास्यन्ति समय़े पाण्डवा इति मे मतिः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
न ते स्म शक्याः सङ्ख्यातुं व्राताः शतसहस्रशः |
४३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
न ते स्वल्पेन तुष्येय़ुर्महोत्साहा महावलाः ||
९४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
न तेन किञ्चिन्न प्राप्तं तन्मे वहुमतं फलम् ||
८३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
न तेन किञ्चिन्न प्राप्तं तीर्थाभिगमनाद्भवेत् ||
६० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४१
विदुर उवाच
न तेन गर्ह्यो देवानां तस्मादेतद्व्रवीमि ते ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
११०
लोमश उवाच
न तेन दृष्टपूर्वोऽन्यः पितुरन्यत्र मानुषः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
न तेन भ्रूणहा स स्यान्मन्युस्तं मनुमृच्छति ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
न तेन भ्रूणहा स स्यान्मन्युस्तं मन्युमृच्छति ||
५५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९९
मनुरु उवाच
न तेन मर्त्याः पश्यन्ति येन गच्छन्ति तत्परम् ||
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
न तेन विकृतं वक्त्रं कृतं सङ्ग्राममूर्धनि |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३५
व्यास उवाच
न तेन व्रह्महा स स्यान्मन्युस्तं मन्युमृच्छति ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
१३३
अष्टावक्र उवाच
न तेन स्थविरो भवति येनास्य पलितं शिरः |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०६
भगीरथ उवाच
न तेनाप्यहमागच्छं फलेनेह पितामह ||
२६ ग
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
न तेषां कुलकर्तारं कञ्चित्पश्याम्यहं शुभे ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०९
सुपर्ण उवाच
न तेषां ज्ञाय़ते सूतिर्नाकृतिर्न तपश्चितम् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
न तेषां दुर्लभं किञ्चिदिह लोके परत्र च |
११५ क