आदि पर्व
अध्याय
१७९
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा सम्प्रस्थितं पार्थमिन्द्रकेतुसमप्रभम् ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा सम्प्राद्रवन्योधाः पाण्डवस्य ततस्ततः ||
११ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा सर्वाणि सैन्यानि नाध्यवस्यंस्तय़ोर्जय़म् |
५८ क
आदि पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा सर्वानवद्याङ्गीं यथावत्प्रतिपूजितः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
२९४
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा सर्वे सिद्धसङ्घाश्च नेदु; र्न ह्यस्यासीद्दुःखजो वै विकारः ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय
१९७
मार्कण्डेय़ उवाच
दृष्ट्वा साध्वी मनुष्येन्द्र सान्त्वपूर्वं वचोऽव्रवीत् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
भीष्म उवाच
दृष्ट्वा सुकृपणां चेमामवस्थामात्मनो वले |
३ क
वन पर्व
अध्याय
६५
वृहदश्व उवाच
दृष्ट्वा सुदेवं सहसा भ्रातुरिष्टं द्विजोत्तमम् ||
३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४
व्यास उवाच
दृष्ट्वा सुपर्णोपचितिं महतीमपि भारत ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा सुमहदाश्चर्यमात्मनो विजय़ावहम् |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा सृष्टं तु नीहारं ततस्तं परमर्षिणा |
६० क
द्रोण पर्व
अध्याय
८९
धृतराष्ट्र उवाच
दृष्ट्वा सेनां व्यतिक्रान्तां सात्वतेनार्जुनेन च |
३१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा सेनापतिं यान्तं पाञ्चालानां रथव्रजान् ||
९९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा सैन्धवकं सङ्ख्ये शममस्मासु धास्यति ||
४५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा सैन्यं वाणवर्षान्धकारं; प्रभज्यन्तं गोकुलवद्रणाग्रे ||
४८ ख
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा स्त्रिय़ो नीय़मानाः पार्थेनैकेन भारत ||
४४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा स्पृष्ट्वा च कौन्तेय़ो वाह्यां कक्ष्यामगात्ततः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
२९४
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा स्वागतमित्याह न वुवोधास्य मानसम् ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा हतांस्तान्युधि राजपुत्रां; स्त्रिगर्तराजः प्रय़यौ क्षणेन ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
दृष्ट्वा हनिष्यथ रिपुं क्षिप्रं गच्छत मन्दरम् |
५६ क
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा हनूमतो वर्ष्म सम्भ्रान्तः पवनात्मजः ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा हि क्षत्रिय़ाञ्शूराञ्शय़ानान्धरणीतले |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
१७८
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा हि तान्मत्तगजेन्द्ररूपा; न्पञ्चाभिपद्मानिव वारणेन्द्रान् |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
अर्जुन उवाच
दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा; धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा हि भीष्मं तमनन्तवीर्यं; भग्नं च सैन्यं द्रवमाणमेवम् |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
जनमेजय़ उवाच
दृष्ट्वा हि विवुधश्रेष्ठमपूर्वममितौजसम् |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा हि समरे भीष्मं व्यात्ताननमिवान्तकम् |
४५ क
आदि पर्व
अध्याय
५
सूत उवाच
दृष्ट्वा हृष्टमभूत्तत्र जिहीर्षुस्तामनिन्दिताम् ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वाग्रतो भीमसेनं गदापाणिमवस्थितम् ||
४४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वाचार्यं च सङ्क्रुद्धं दहन्तं रिपुवाहिनीम् |
७१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वाजिमुख्यावथ युध्यमानौ; दिदृक्षवः शूरवरावरिघ्नौ |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
२०३
व्याध उवाच
दृष्ट्वात्मानं निरात्मानं तदा स तु विमुच्यते ||
३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
अर्जुन उवाच
दृष्ट्वाद्भुतं रूपमिदं तवोग्रं; लोकत्रय़ं प्रव्यथितं महात्मन् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
१११
लोमश उवाच
दृष्ट्वान्तरं काश्यपस्य प्राहिणोद्वुद्धिसंमताम् ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७०
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वान्तरिक्षमाविग्नाः पाण्डुपाञ्चालसृञ्जय़ाः ||
२० ख
शल्य पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वापतन्तं सहसा तु नागं; धृष्टद्युम्नः स्वरथाच्छीघ्रमेव |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
दृष्ट्वापरिमितं तस्य प्रभावममितौजसः ||
१२० ख
वन पर्व
अध्याय
१५२
भीम उवाच
दृष्ट्वापि च महाराजं नाहं याचितुमुत्सहे ||
८ ख
सभा पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वापि नाभ्यजानन्त तेऽज्ञानात्प्रपतन्त्युत ||
३० ख
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वाप्सरसमाय़ान्तीं घृताचीं पृथुलोचनाम् ||
५७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वामन्यत देहस्य कालपर्याय़मागतम् ||
११७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वार्जुनमुवाचेदं वचनं शोककर्शितः ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वार्जुनसुतः सङ्ख्ये राक्षसं समुपाद्रवत् ||
४८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वार्जुनहतान्नागान्पतितान्पर्वतोपमान् |
६२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वार्जुनो निमित्तानि विजय़ाय़ प्रदक्षिणम् |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वार्दितं शरैः कार्ष्णिं त्वदीय़ा हृषिताभवन् ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३८
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वाविषह्यं तं युद्धे व्राह्मणं चरितव्रतम् |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वाश्वनरसङ्घानां विपुलं च क्षय़ं युधि |
६३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२६
भीष्म उवाच
दृष्ट्वाहं तं कृशं विप्रं भीतः परमदुर्मनाः |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१७०
अर्जुन उवाच
दृष्ट्वाहं प्राणमं भूय़स्त्रिपुरघ्नाय़ वेधसे ||
५० ख