द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सात्यकिरु उवाच
चेष्टमानं प्रतीघाते सभुजं मां सचक्षुषः |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७७
भृगुरु उवाच
चेष्टा वय़ूः खमाकाशमूष्माग्निः सलिलं द्रवः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
चेष्टात्मनो देवगणाश्च सर्वे; ये व्रह्मलोकादमराः स्म तेऽपि ||
५१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
२
कृप उवाच
चेष्टामकुर्वँल्लभते यदि किञ्चिद्यदृच्छय़ा |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
धृतराष्ट्र उवाच
चेष्टितं नरसिंहेन तन्मे कथय़ सञ्जय़ ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
युधिष्ठिर उवाच
चेष्टितव्यं कथं चात्र शत्रोर्मित्रस्य चान्तरे ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
चैत्यकं च गिरेः शृङ्गं भित्त्वा किमिव सद्म नः |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
चैत्यद्रुमाणामामर्दो रोधःकर्मान्तनाशनम् |
६३ क
आदि पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
चैत्ययूपाङ्किता चासीद्भूमिः शतसहस्रशः |
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
चैत्ययूपाङ्किता भूमिर्यस्येय़ं सवनाकरा ||
१६९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५२
वैशम्पाय़न उवाच
चैत्यस्थाने स्थितं वृक्षं फलवन्तमिव द्विजाः ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
चैत्यांश्च वृक्षान्कल्याणान्व्राह्मणांश्च नमस्यसि ||
९० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
चैत्यानां सर्वथा वर्ज्यमपि पत्रस्य पातनम् ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय
१२५
लोमश उवाच
चैत्याश्चैते वहुशतास्त्रिदशानां युधिष्ठिर ||
१३ ग
आदि पर्व
अध्याय
१३८
वैशम्पाय़न उवाच
चैत्यो भवति निर्ज्ञातिरर्चनीय़ः सुपूजितः ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
चैत्रं तु निय़तो मासमेकभक्तेन यः क्षपेत् |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
चैत्रसेनिर्महाराज तव पौत्रो न्यवारय़त् ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०१
भीष्म उवाच
चैत्र्यां वा मार्गशीर्ष्यां वा सेनाय़ोगः प्रशस्यते |
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७१
व्यास उवाच
चैत्र्यां हि पौर्णमास्यां च तव दीक्षा भविष्यति |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
चैद्यश्च चेकितानश्च पुत्रः काश्यस्य चाभिभुः |
४० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
चैद्यश्च चेकितानश्च शिखण्डी चापराजितः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११८
भीष्म उवाच
चोक्षं चोक्षजनाकीर्णं सुवेषं सुखदर्शनम् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३२
सञ्जय़ उवाच
चोदितस्तव पुत्रेण साय़कैरभ्यवाकिरत् ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४२
हिडिम्वो उवाच
चोदिता तव पुत्रस्य मन्मथेन वशानुगा ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
चोदिताः सादिभिः क्षिप्रं निपेतुरितरेतरम् ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
चोदितास्तव पुत्रेण रुरुधुः सर्वतोदिशम् ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
चोदितास्तव पुत्रैश्च सर्वतः पर्यवारय़न् ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४१
वैशम्पाय़न उवाच
चोदितैषा ह्यनङ्गेन शरीरान्तरचारिणा |
४ ख
सभा पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
चोदितो वासुदेवस्तु मय़ेन भरतर्षभ |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
चोदितो वासुदेवेन भीमसेनो महावलः |
४४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३३
मातो उवाच
चोद्यं मां चोदय़स्येतद्भृशं वै चोदय़ामि ते ||
१८ ख
विराट पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
चोद्यमानस्ततो भीमो दुःखेनैवाकरोन्मतिम् |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३७
द्रोण उवाच
चोद्यमानोऽपि पापेन शुभात्मा शुभमिच्छति ||
८ ख
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
चोदय़त्येव राजेन्द्र पतिव्यसनदुःखिता |
४६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
चोदय़न्तो हय़ांस्तूर्णं पलाय़न्ते स्म तावकाः |
५९ क
सभा पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
चोदय़ामास तं कृष्णः सभा वै क्रिय़तामिति |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
चोदय़ामास तं नागं वधाय़ाच्युतपार्थय़ोः ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
२६२
मार्कण्डेय़ उवाच
चोदय़ामास तस्यार्थे सा रामं विधिचोदिता ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
चोदय़ामास तानश्वान्पाण्डुरान्वातरंहसः ||
१२ ख
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
चोदय़ामास तानश्वान्भारद्वाजरथं प्रति ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
चोदय़ामास तानश्वान्वितुन्नान्भीष्मसाय़कैः ||
५१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
चोदय़ामास तानश्वान्वितुन्नान्भीष्मसाय़कैः ||
४२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
चोदय़ामास नागेन्द्रं भीमसेनरथं प्रति ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३००
याज्ञवल्क्य उवाच
चोदय़ामास भगवानव्यक्तोऽहङ्कृतं नरम् ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९०
भीष्म उवाच
चोदय़ामास भार्यार्थं कन्याय़ाः पुत्रवत्तदा ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१
नारद उवाच
चोदय़ामास वज्रं स दिव्यास्त्रं मूर्तिसंस्थितम् |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
१६४
अर्जुन उवाच
चोदय़ामास स हय़ान्मनोमारुतरंहसः |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
चोदय़ाश्वांस्तथा कृष्ण यथा हन्यां जय़द्रथम् ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
चोदय़ाश्वानसम्भ्रान्तः प्रविशैतद्वलार्णवम् |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
चोदय़ाश्वान्भृशं कृष्ण यतो राजा जय़द्रथः |
३ क