कर्ण पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
सोऽर्जुनेन हतः कर्णः प्रतिमानं धनुष्मताम् ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
सोऽर्जुनेन हतो वीरो भ्राता भ्रात्रा सहोदरः ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९२
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽर्जुनो जय़तां श्रेष्ठो महावाणधनुर्धरः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२५
सूत उवाच
सोऽलम्वतीर्थमासाद्य देववृक्षानुपागमत् ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६७
अर्जुन उवाच
सोऽल्पकालस्य राज्यस्य कारणान्निहतो गुरुः ||
४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
सोऽवकर्षन्विकर्षंश्च सेनाग्रं समलोडय़त् ||
६६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२
भीष्म उवाच
सोऽवगाह्य सरस्तात पाय़यामास वाजिनम् ||
८ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
सोऽवतीर्य पुनस्तस्थौ रथे हेमपरिष्कृते |
६१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
सोऽवतीर्य पुनस्तस्थौ रथे हेमपरिष्कृते |
५२ क
शल्य पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
सोऽवतीर्य रथात्तूर्णं पदातिः समवस्थितः ||
४५ ख
वन पर्व
अध्याय
७०
वृहदश्व उवाच
सोऽवतीर्य रथात्तूर्णं शातय़ामास तं द्रुमम् ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽवतीर्य रथात्तूर्णमभिवाद्य जनार्दनः |
६१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
सोऽवतीर्य रथोपस्थादसम्भ्रान्तो धनञ्जय़ः |
४१ क
वन पर्व
अध्याय
७१
वृहदश्व उवाच
सोऽवतीर्य रथोपस्थादृतुपर्णो नराधिपः |
१९ क
शल्य पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
सोऽवतीर्य रथोपस्थाद्धताश्वः पाण्डुनन्दनः |
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५२
सञ्जय़ उवाच
सोऽवतीर्य रथोपस्थाद्धताश्वो हतसारथिः |
४० क
शल्य पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽवतीर्याचलश्रेष्ठात्प्लक्षप्रस्रवणाच्छुभात् |
३३ क
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
सोऽवनीं मध्यमां भुक्त्वा मिथोभेदेष्वमन्यत ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
सोऽवप्लुत्य द्रुतं सूतो युय़ुधानरथं यय़ौ ||
४५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
सोऽवप्लुत्य रथात्तूर्णं गदां जग्राह सात्वतः |
२३ क
विराट पर्व
अध्याय
१४
द्रौपद्यु उवाच
सोऽवमंस्यति मां दृष्ट्वा न यास्ये तत्र शोभने ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१२
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽवमन्य च नामास्माननादृत्य च केशवम् |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
२९
प्रह्लाद उवाच
सोऽवमानादर्थहानिमुपालम्भमनादरम् |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९
शल्य उवाच
सोऽवर्धत दिवं स्तव्ध्वा सूर्यवैश्वानरोपमः |
४४ क
सभा पर्व
अध्याय
१७
कृष्ण उवाच
सोऽवर्धत महातेजा मगधाधिपतेः सुतः |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६९
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽवर्धत यथाकालं पिता तव नराधिप |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
सोऽववद्धशिरस्त्राणः शुभकाञ्चनवर्मभृत् |
५५ क
वन पर्व
अध्याय
५९
वृहदश्व उवाच
सोऽवस्त्रतामात्मनश्च तस्याश्चाप्येकवस्त्रताम् |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
सोऽवहद्धिमवन्तं मां प्राप्य चैनं व्यसर्जय़म् ||
२६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
सोऽवाप्य वैरस्य परस्य पारं; वृकोदरः प्राह शनैः प्रहस्य |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३२
श्रीभगवानु उवाच
सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशय़ः ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
सोऽविध्यद्दशभिर्वाणैरभिमन्युं दुरासदम् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३११
भीष्म उवाच
सोऽविशङ्केन मनसा तथैव द्विजसत्तमः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२०
भीष्म उवाच
सोऽविशङ्केन मनसा तथैवाभ्यपतच्छुकः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
सोऽविशत्कृतवर्माणं यमदण्डोपमः शरः |
३८ क
सभा पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽविषह्यतमं ज्ञात्वा कौन्तेय़ं पर्वतेश्वरः |
८ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
सोऽव्रवीज्जातसंरम्भस्तदा लोकगुरुर्गुरुम् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२२
भीष्म उवाच
सोऽव्रवीत्परमप्रीतो मान्धाता राजसत्तमम् |
१० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
सोऽव्रवीत्पितरं दृष्ट्वा गिरिशं मग्नमम्भसि |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६९
भीष्म उवाच
सोऽव्रवीत्पितरं पुत्रः स्वाध्याय़करणे रतम् |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
सोऽव्रवीत्पुरुषव्याघ्रः स्वागतेनैव माधवम् |
३२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
सोऽव्रवीत्सात्यकिं वीरं धृष्टद्युम्नं च पार्षतम् |
६ क
वन पर्व
अध्याय
२४३
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽव्रवीत्सुहृदश्चापि पार्श्वस्थान्नृपसत्तमः |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
सोऽव्रवीत्स्वागतं देवा व्रूत किं करवाण्यहम् |
५८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७
शल्य उवाच
सोऽव्रवीदर्च्य देवेन्द्रं दिष्ट्या वै वर्धते भवान् |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
कृष्ण उवाच
सोऽव्रवीदर्जुनं चापि मुहूर्तं क्षम पाण्डव ||
६० ख
आदि पर्व
अध्याय
२१५
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽव्रवीदर्जुनं चैव वासुदेवं च सात्वतम् |
१ क
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽव्रवीदर्जुनं तत्र स्थितं दृष्ट्वा महातपाः |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३
नारद उवाच
सोऽव्रवीदहमासं प्राग्गृत्सो नाम महासुरः |
१९ क
विराट पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
सोऽव्रवीदुपसङ्गम्य विराटं प्रणतस्तदा ||
६ ख