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शान्ति पर्व
अध्याय २१७
वलिरु उवाच
तमिन्द्रिय़ाणि सर्वाणि नानुपश्यन्ति पञ्चधा ||
५१ ग
आदि पर्व
अध्याय ५१
सूत उवाच
तमिन्द्रेणैव सहितं पातय़ध्वं विभावसौ ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय १२४
लोमश उवाच
तमिन्द्रो वारय़ामास गृह्यमाणं तय़ोर्ग्रहम् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय २९३
वैशम्पाय़न उवाच
तमिन्द्रो व्राह्मणो भूत्वा भिक्षां देहीत्युपस्थितः |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय १०४
वैशम्पाय़न उवाच
तमिन्द्रो व्राह्मणो भूत्वा भिक्षार्थं भूतभावनः |
१८ क
सभा पर्व
अध्याय ३८
शिशुपाल उवाच
तमिमं ज्ञानवृद्धः सन्गोपं संस्तोतुमिच्छसि ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय १७०
व्राह्मण्यु उवाच
तमिमं तात याचध्वमौर्वं मम सुतोत्तमम् |
६ क
वन पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
तमिमं पुरुषव्याघ्रं पूजितं देवदानवैः |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
तमिमं पुरय़ानाय़ त्वमनुज्ञातुमर्हसि ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
तमिमं विक्रमं लोके प्रथितं ते यशोवहम् |
४ क
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
तमिमं विद्धि सम्प्राप्तं कालं कालविदां वर ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय १९५
भीष्म उवाच
तमिमं समुपातिष्ठ धर्मं कुरुकुलोचितम् |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय ३५
भीष्म उवाच
तमिमं सर्वसम्पन्नमाचार्यं पितरं गुरुम् |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
तमिषुं संहितं तेन भारद्वाजः प्रतापवान् |
११७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
तमिषुं सन्धितं दृष्ट्वा भारद्वाजेन संय़ुगे ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८
धृतराष्ट्र उवाच
तमिष्वस्त्रवराचार्यं द्रोणं शंससि मे हतम् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय १७९
वैशम्पाय़न उवाच
तमिस्राभ्युदय़े तस्मिन्धौम्येन सह पाण्डवाः |
१८ क
विराट पर्व
अध्याय २१
द्रौपद्यु उवाच
तमिस्रे तत्र गच्छेथा गन्धर्वास्तन्न जानते |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५७
भीष्म उवाच
तमिहैकमना राजन्गदतस्त्वं निवोध मे ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
तमिय़ं पृथिवी सर्वा एकाह्ना समपद्यत |
८० क
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
कर्ण उवाच
तमीदृशं प्रतिय़ोत्स्यामि पार्थं; महाहवे पश्य च पौरुषं मे ||
३७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
कर्ण उवाच
तमीदृशं वीर्यगुणोपपन्नं; कृष्णद्वितीय़ं वरय़े रणाय़ |
४७ क
आदि पर्व
अध्याय १०४
वैशम्पाय़न उवाच
तमुग्रं संशितात्मानं सर्वय़त्नैरतोषय़त् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४९
वासुदेव उवाच
तमुग्रतपसं दृष्ट्वा सहस्राक्षः पुरन्दरः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२७
भीष्म उवाच
तमुग्रतपसं युक्तं तपसा भावितं मुनिम् ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय २०५
व्याध उवाच
तमुग्रतपसं विप्रं निष्टनन्तं महीतले ||
२७ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १३७
द्रोण उवाच
तमुग्रतपसं वीरं कथं जेष्यसि पाण्डवम् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
तमुग्रतपसः प्रीताः कृत्वा पार्थं प्रदक्षिणम् |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
तमुग्रतपसः सिद्धाः सुव्रताः सत्यवादिनः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
तमुग्रपाशो वरुणो भगवान्सलिलेश्वरः |
११ क
वन पर्व
अध्याय ११८
वैशम्पाय़न उवाच
तमुग्रमास्थाय़ तपश्चरन्तं; शुश्राव रामश्च जनार्दनश्च |
१८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६३
भीष्म उवाच
तमुग्रमुग्रकर्माणमुग्रां वुद्धिं समास्थितम् |
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २००
भीष्म उवाच
तमुग्रमुग्रकर्माणमुग्रां वुद्धिं समास्थितम् |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय ११६
माद्र्यु उवाच
तमुच्छिन्द्यामस्य कामं कथं नु यमसादने ||
२६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
नकुल उवाच
तमुञ्छवृत्तिरालक्ष्य ततश्चिन्तापरोऽभवत् ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
तमुत्तङ्क उपाध्याय़ं प्रत्युवाच |
१६६ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
तमुत्तङ्कः प्रत्युवाच |
१२४ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
तमुत्तङ्कः प्रत्युवाच |
१३० क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
तमुत्तङ्कः प्रत्युवाच |
१३४ क
वन पर्व
अध्याय १९३
मार्कण्डेय़ उवाच
तमुत्तङ्को महातेजाः सर्वास्त्रविदुषां वरम् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
तमुत्तङ्कोऽन्वाविवेश तेनैव विलेन |
१३८ ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
तमुत्तङ्कोऽभिसृत्य जग्राह |
१३७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
तमुत्तमं सर्वधनुर्धराणा; मसक्तकर्मा कपिराजकेतुः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०६
मुनिरु उवाच
तमुत्तमेन शौचेन कर्मणा चाभिराधय़ |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
तमुत्तमौजा जनमेजय़श्च; क्रुद्धौ युधामन्युशिखण्डिनौ च |
१५ क
शल्य पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
तमुत्तीर्णं तु सम्प्रेक्ष्य समहृष्यन्त सर्वशः |
४१ क
शल्य पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
तमुत्तीर्णं महावाहुं गदाहस्तमरिन्दमम् |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
तमुत्तीर्णं रथानीकात्तमसो भास्करं यथा |
१ क
वन पर्व
अध्याय २४३
वैशम्पाय़न उवाच
तमुत्थाय़ महाराज सूतपुत्रोऽव्रवीद्वचः |
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
तमुत्थितं महात्मानं लव्धसञ्ज्ञं मनस्विनम् |
१३ क