शान्ति पर्व
अध्याय
३४९
भीष्म उवाच
तमेव मनसा ध्याय़न्कार्यवत्तां विचारय़न् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
तमेव मनसाध्याय़मुपावर्तत्सरिद्वरा ||
८ ख
विराट पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
तमेव मां प्रापय़ राजपुत्र; दुर्योधनापाश्रय़जातदर्पम् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैश्रवण उवाच
तमेव मानुषं दृष्ट्वा किल्विषाद्विप्रमोक्ष्यसे ||
५७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
श्रीभगवानु उवाच
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत |
६२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
तमेव शास्त्रकर्तारं प्रवदन्ति मनीषिणः |
६५ क
विराट पर्व
अध्याय
२०
द्रौपद्यु उवाच
तमेवं कामसंमत्तं भिन्धि कुम्भमिवाश्मनि |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
तमेवं वहुदोषं तु क्रोधं साधुविवर्जितम् |
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५
भीष्म उवाच
तमेवं शुभकर्माणं शुकं परमधार्मिकम् |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
१८१
वैशम्पाय़न उवाच
तमेवंवादिनं तत्र फल्गुनः प्रत्यभाषत |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
काक उवाच
तमेवंवादिनं दीनं विलपन्तमचेतनम् |
५१ क
शल्य पर्व
अध्याय
४९
सिद्धा ऊचुः
तमेवंवादिनं धीरं प्रत्यूचुस्ते दिवौकसः |
६४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३५
वासुदेव उवाच
तमेवंवादिनं पार्थ शिष्यं गुरुरुवाच ह |
५ क
सभा पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
तमेवंवादिनं पार्थं प्रहसन्निव सौवलः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
तमेवंवादिनं पार्थं वन्धुशोकेन विह्वलम् |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
तमेवंवादिनं प्राज्ञः शास्त्रविद्वुद्धिसंमतः |
१०० क
स्त्री पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
तमेवंवादिनं भीतं संनिकर्षगतं तदा |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१
नारद उवाच
तमेवंवादिनं भूय़ः पर्वतः प्रत्यभाषत |
१४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
तमेवंवादिनं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
तमेवंवादिनं राजा सूतपुत्रं कृताञ्जलिम् |
३३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
तमेवंवादिनं व्यासस्ततः प्रोवाच धर्मवित् |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
तमेवंवादिनं शक्रं शुश्राव विपुलो मुनिः |
९ क
वन पर्व
अध्याय
२४६
व्यास उवाच
तमेवंवादिनमृषिर्देवदूतमुवाच ह |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
तमेवङ्गुणसम्पन्नं दुर्वारमपि दैवतैः |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४५
व्यास उवाच
तमेवमतितेजोंशं भूतात्मानं हृदि स्थितम् |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
तमेवमुक्तं भर्त्रा तु विदित्वा पन्नगात्मजा |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
तमेवमुक्त्वा तु पृथा विसृज्योपय़यौ गृहान् |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
तमेवमुक्त्वा भगवाञ्शतक्रतुः; प्रतिप्रय़ातो गजराजवाहनः |
११६ क
वन पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
तमेवमुक्त्वा वचनं महर्षि; स्तपस्विमध्ये सहितं सुहृद्भिः |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९४
सञ्जय़ उवाच
तमेवमुक्त्वा शिनिपुङ्गवस्तदा; महामृधे सोऽग्र्यधनुर्धरोऽरिहा |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
तमेवमुक्त्वाभ्यनुनीय़ चासकृ; त्तवात्मजः स्वाननुशास्ति सैनिकान् |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
तमेवानुव्रता भूत्वा पाणिग्राहस्य नाम सा ||
५० ख
वन पर्व
अध्याय
२५५
अर्जुन उवाच
तमेवान्विष भद्रं ते किं ते योधैर्निपातितैः |
३८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
तमेवाभिमुखा यान्ति पतङ्गा इव पावकम् ||
११७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
तमेवाभिमुखा यान्ति शलभा इव पावकम् ||
१०४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
तमेवाभिमुखाः क्षीणाः शक्रस्यातिथितां गताः ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
तमेवाभिमुखौ पीठे सेव्यास्तरणसंवृते |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३२
वैशम्पाय़न उवाच
तमेवाभ्यर्चय़न्देवं नरनाराय़णौ च तौ ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८३
वैशम्पाय़न उवाच
तमेवार्थं ध्याय़माना मनोभि; रासां चक्रुरथ तत्रामितौजाः ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०३
नारद उवाच
तमेवार्थं पुरस्कृत्य पितामहमचोदय़न् ||
८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
तमेवार्थमतिक्रान्तं कुरुपाण्डवय़ोः क्षय़म् ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
तमेवासुरधर्मं त्वमास्थिता न विभेषि किम् ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४३
भीष्म उवाच
तमेवाहुरृषिमेकं पुराणं; स विश्वकृद्विदधात्यात्मभावान् ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
तमेवाहुर्गरीय़ांसं यश्चासौ ज्ञातिभिः कृतः ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
तमेष कथमुत्सृज्य मम कृष्ण पदानुगः ||
२८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
तमेष प्रद्रुतः सङ्ख्ये धृष्टद्युम्नो महारथः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
व्रह्मो उवाच
तमेषा यास्यति क्षिप्रं तत्रैव च निवत्स्यति |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
व्रह्मो उवाच
तमेषा यास्यति क्षिप्रं तत्रैव च निवत्स्यति |
५३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
व्रह्मो उवाच
तमेषा यास्यति क्षिप्रं व्येतु वो मानसो ज्वरः ||
४४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२०
गान्धार्यु उवाच
तमेषा हि समासाद्य भार्या भर्तारमन्तिके |
५ क