शान्ति पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
सुदुहा या तु भवति नैव तां क्लेशय़न्त्युत ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
सुदूरमनुजग्मुस्तं पौरजानपदास्तदा |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
सुदूरमन्वय़ुः पार्थाः पाञ्चालाः सह सोमकैः ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
सुदृष्टः क्रिय़तां भीष्म लोकोऽय़ं समितिञ्जय़ ||
४७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
सुदृष्टः क्रिय़तां लोक इति राजानमव्रवीत् ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
सुदृष्टः क्रिय़तां लोको अमुं लोकं गमिष्यसि |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
६५
वृहदश्व उवाच
सुदेवेन सहैकान्ते कथय़न्तीं च भारत ||
३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
भीष्म उवाच
सुदेवो देवसङ्काशः साक्षाद्धर्म इवापरः ||
१३ ख
विराट पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
सुदेष्णा प्रेषय़ामास सैरन्ध्रीं कीचकालय़म् ||
९ ख
विराट पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
सुदेष्णां च पुरस्कृत्य मत्स्यानां च वरस्त्रिय़ः |
२९ क
विराट पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
सुदेष्णां चाव्रवीद्राजा महिषीं जातसाध्वसः |
८ क
विराट पर्व
अध्याय
३
द्रौपद्यु उवाच
सुदेष्णां प्रत्युपस्थास्ये राजभार्यां यशस्विनीम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
सुद्युम्नश्चापि राजर्षिः श्रूय़ते दण्डधारणात् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४
व्यास उवाच
सुद्युम्नस्त्वन्तपालेभ्यः श्रुत्वा लिखितमागतम् |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय
६१
विदुर उवाच
सुधन्वना तथोक्तः सन्व्यथितोऽश्वत्थपर्णवत् |
६४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
सुधन्वनो धनुश्छित्त्वा हय़ान्वै न्यवधीच्छरैः |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
विरोचन उवाच
सुधन्वन्न त्वमर्होऽसि मय़ा सह समासनम् ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
प्रह्राद उवाच
सुधन्वन्पुनरिच्छामि त्वय़ा दत्तं विरोचनम् ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
विरोचन उवाच
सुधन्वन्विपणे तेन प्रश्नं पृच्छाव ये विदुः ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः |
७४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
केशिन्यु उवाच
सुधन्वा प्रातरागन्ता पश्येय़ं वां समागतौ ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
सुधन्वा शकटं चैव रथं चामितकूवरम् |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
विरोचन उवाच
सुधन्वानं च मां चैव प्रातर्द्रष्टासि सङ्गतौ ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
सुधर्मा कुन्तिभोजश्च धृष्टद्युम्नस्य चात्मजाः ||
६० ख
सभा पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
सुधर्मा चानिरुद्धश्च श्रुताय़ुश्च महावलः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
सुधर्मा चैव धौम्यश्च यथास्वं जग्मुरालय़ान् ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
सुधर्मा तु ततो राजन्भारद्वाजं महारथम् |
३४ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
सुधर्मा धौम्यसहित इन्द्रसेनादय़स्तथा ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
सुधर्मा विदुरो धौम्यो धृतराष्ट्रश्च कौरवः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
सुधर्मा सुधनुश्चैव सुवाहुश्च समर्पय़न् ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
सुधा यथा च नागानां तथा गङ्गाजलं नृणाम् ||
४८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
सुधां वै लभते भोक्तुं यो नरो जाय़ते पुनः ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
सुधामा नाम दुर्धर्षो द्वितीय़ो हेमपर्वतः ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सुधारसं च भुञ्जीत अमृतोपममुत्तमम् ||
८० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सुधारसं चोपजीवन्नमृतोपममुत्तमम् ||
१०२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
सुधारसकृताहारः श्रीमान्सर्वमनोहरः |
१२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
सुधावदातं रक्ताक्षं स्तव्धकर्णं मदोत्कटम् |
८९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
सुधावदातां विस्तीर्णां कनकाजिरभूषिताम् |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१००
नारद उवाच
सुधाहारेषु च सुधां स्वधाभोजिषु च स्वधाम् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
६६
वृहदश्व उवाच
सुनन्दा शोधय़ामास पिप्लुप्रच्छादनं मलम् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
सुनन्दिताः प्राणभृतां भय़ङ्कराः; समानभक्षाः श्वसृगालपक्षिणः ||
५१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
सुनसं सुभ्रु केशान्तं शिरोऽहार्षीत्सकुण्डलम् |
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
सुनसां तमसां दासीं त्रसामन्यां वराणसीम् |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय
८४
सञ्जय़ उवाच
सुनाभस्य शरेणाशु शिरश्चिच्छेद चारिहा ||
१२ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
सुनामा नाम विक्रान्तः समग्राक्षौहिणीपतिः |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
सुनासाननकेशान्तैरव्रणैश्चारुकुण्डलैः |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
सुनासिकेन काय़ेन भूत्वा चन्द्रप्रभस्तदा |
४४ क
आदि पर्व
अध्याय
६८
दुःषन्त उवाच
सुनिकृष्टा च योनिस्ते पुंश्चली प्रतिभासि मे |
७९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
सुनिमग्नांश्च भीमास्त्रैर्धार्तराष्ट्रान्महारथान् |
६६ क
वन पर्व
अध्याय
१११
लोमश उवाच
सुनिर्णिक्तं स्रुक्स्रुवं होमधेनुः; कच्चित्सवत्सा च कृता त्वय़ाद्य ||
२१ ख