उद्योग पर्व
अध्याय
५७
धृतराष्ट्र उवाच
न त्वं करोषि कामेन कर्णः कारय़िता तव |
९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
न त्वं जातु सतां मार्गे स्थातेति पुरुषर्षभ ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
न त्वं धर्मं विजानासि वृद्धा नोपासितास्त्वय़ा |
७७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३२
विदुरो उवाच
न त्वं परस्यानुधुरं तात जीवितुमर्हसि ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०५
भीष्म उवाच
न त्वं पश्यसि तानद्य न त्वा पश्यन्ति तेऽपि च ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८
अश्मो उवाच
न त्वं पश्यसि तानद्य न त्वां पश्यन्ति तेऽपि च ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१६
वलिरु उवाच
न त्वं पश्यसि भृङ्गारं न छत्रं व्यजनं न च |
२४ क
विराट पर्व
अध्याय
२०
द्रौपद्यु उवाच
न त्वं प्रतिवलस्तेषां गन्धर्वाणां यशस्विनाम् ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२२
शार्ङ्गका ऊचुः
न त्वं मिथ्योपचारेण मोक्षय़ेथा भय़ं महत् |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३७
भीष्म उवाच
न त्वं मूढ विजानीषे व्राह्मणं क्षत्रिय़ाद्वरम् |
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
न त्वं मय़ा पुनः काम नस्योतेनेव रंस्यसे ||
४२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
न त्वं युद्धोचितस्तात वनवासरतिर्भव ||
७४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
न त्वं वाक्यं व्रुवन्युक्तश्चाण्डालेषु द्विजो यथा ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
८८
यय़ातिरु उवाच
न त्वं वाचा हृदय़ेनापि विद्व; न्परीप्समानान्नावमंस्था नरेन्द्र |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२३
व्राह्मण उवाच
न त्वं श्रेष्ठोऽसि नः प्राण अपानो हि वशे तव |
१० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२३
व्राह्मण उवाच
न त्वं श्रेष्ठोऽसि नो व्यान समानो हि वशे तव ||
१५ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२३
व्राह्मण उवाच
न त्वं सर्वमिदं व्याप्य तिष्ठसीह यथा वय़म् |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
७
सूत उवाच
न त्वं सर्वशरीरेण सर्वभक्षत्वमेष्यसि |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
न त्वं स्मरसि वारुण्या लट्वाकानां च पक्षिणाम् |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
न त्वं हन्ता न भीमोऽपि नार्जुनो न यमावपि |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
अर्जुन उवाच
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो; लोकत्रय़ेऽप्यप्रतिमप्रभाव ||
४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
न त्वदन्य इहाचार्यं योद्धुमुत्सहते पुमान् |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
३५
युधिष्ठिर उवाच
न त्वद्य शक्यं भरतप्रवीर; कृत्वा यदुक्तं कुरुवीरमध्ये |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
न त्वद्य शक्यमस्माभिरेतत्कर्तुमतोऽन्यथा |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
न त्वन्यमभिगच्छेय़ं पुमांसं राघवादृते |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
न त्वन्यामिह मार्जाराद्गतिं पश्यामि साम्प्रतम् |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
न त्वन्ये क्षुद्रपशवस्तपोवननिवासिनः |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
२२७
वैशम्पाय़न उवाच
न त्वभ्यनुज्ञां लप्स्यामि गमने यत्र पाण्डवाः ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
न त्वमद्य महीं दातुमीशः कौरवनन्दन |
५८ क
वन पर्व
अध्याय
१६५
अर्जुन उवाच
न त्वमद्य युधा जेतुं शक्यः सुरगणैरपि |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
न त्वमर्हसि पार्थेन सूतपुत्र रणे वधम् |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२४
भीष्म उवाच
न त्वमल्पेन तपसा दानेन निय़मेन वा |
६ क
वन पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
न त्वमस्मिन्वने घोरे विभेषि कनकप्रभ ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
१९०
वामदेव उवाच
न त्वमेनं शरवर्यं विमोक्तुं; सन्धातुं वा शक्ष्यसि मानवेन्द्र ||
७६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९४
वामदेव उवाच
न त्वरेत न चासूय़ेत्तथा सङ्गृह्यते परः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
१९७
विदुर उवाच
न त्वशुश्रूषमाणेषु वाक्यं सम्प्रतितिष्ठति ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
व्राह्मण उवाच
न त्वसौ चक्षुषा ग्राह्यो न च सर्वैरपीन्द्रिय़ैः |
४४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१५
धृतराष्ट्र उवाच
न त्वस्य कर्म सङ्ग्रामे त्वय़ा सञ्जय़ कीर्तितम् ||
१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
न त्वस्य नृपतेर्लोकाः कथितास्ते महामुने ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३११
भीष्म उवाच
न त्वस्य रमते वुद्धिराश्रमेषु नराधिप |
२७ क
सभा पर्व
अध्याय
३८
शिशुपाल उवाच
न त्वहं तव धर्मज्ञ पश्याम्युपचय़ं क्वचित् |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२८
वैशम्पाय़न उवाच
न त्वहं निन्दितं कर्म कुर्यां पापं कथञ्चन ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४९
व्राह्मण उवाच
न त्वहं वधमाकाङ्क्षे स्वय़मेवात्मनः शुभे |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
न त्वहं विनिवर्तिष्ये युद्धादस्मात्कथञ्चन ||
२२ ग
आदि पर्व
अध्याय
९७
वैशम्पाय़न उवाच
न त्वहं सत्यमुत्स्रष्टुं व्यवसेय़ं कथञ्चन ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४६
व्राह्मण्यु उवाच
न त्वहं सुतय़ोः शक्ता तथा रक्षणपोषणे ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
न त्वहं स्ववशस्तात क्रिय़माणं न मे प्रिय़म् |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
न त्वहमेतमपूपमुपय़ोक्तुमुत्सहे अनिवेद्य गुरव इति ||
७२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२५०
नारद उवाच
न त्वा दोषेण यास्यन्ति व्याधिसम्पीडिताः प्रजाः ||
२९ ख
मौसल पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
न त्वा प्रत्यभिजानामि किमिदं भरतर्षभ |
६ क