आदि पर्व
अध्याय
१९१
वैशम्पाय़न उवाच
कोटिशश्च सुवर्णं स तेषामकृतकं तथा |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
२०३
नारद उवाच
कोटिशश्चापि रत्नानि तस्या गात्रे न्यवेशय़त् |
१३ क
सभा पर्व
अध्याय
४७
दुर्योधन उवाच
कोटिशश्चैव वहुशः सुवर्णं पद्मसंमितम् |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
कोटीर्दश द्वादश च त्रिंशत्पञ्च प्रकर्षति ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
कोटीशतवृतौ चापि गजो गवय़ एव च |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
कोटीशतसहस्रं च तेषु लोकेषु मोदते ||
३९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
कोटीशतसहस्रं च दश कोटिशतानि च ||
४९ ख
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
कोटीशतसहस्रेण जाम्ववान्प्रत्यदृश्यत ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
२६८
मार्कण्डेय़ उवाच
कोटीशतसहस्रेण लङ्कामभ्यपतत्तदा ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०६
भगीरथ उवाच
कोटीश्च काञ्चनस्याष्टौ प्रादां व्रह्मन्दश त्वहम् |
१७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
कोटीसहस्रं निष्काणां व्यासाय़ तु वसुन्धराम् ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
कोटीसहस्रं वर्षाणां त्रीणि कोटिशतानि च |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
कोटीसहस्रमुग्राणां हरीणां समकर्षत ||
५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२६
युधिष्ठिर उवाच
कोट्यः षष्टिश्च षट्चैव येऽस्मिन्राजमृधे हताः ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
कोट्यश्च लोकवीराणां समेताः कुरुजाङ्गले ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
कोट्यश्चाप्रतिवीराणां समाजग्मुस्ततस्ततः |
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
कोप आसीन्महीपानामालोक्यान्योन्यमन्तिकात् ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३४
युधिष्ठिर उवाच
कोपं कुर्यात्किमर्थं वा कौरवान्कोपय़ेत सः |
२२ ख
विराट पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
कोपं नार्हसि नः कर्तुं सदा समरदुर्जय़ ||
१६ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
कोपं संय़च्छ गान्धारि मैवं भूः सत्यवादिनि ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
७०
वृहदश्व उवाच
कोपं संय़च्छ नृपते कीर्तिं दास्यामि ते पराम् ||
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
दुर्योधन उवाच
कोपः खलु न कर्तव्यः सूतपुत्रे कथञ्चन ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
६५
मेनको उवाच
कोपनश्च तथा ह्येनं जानाति भगवानपि ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
कोपसंरक्तनय़नः कथमित्यव्रवीद्वचः ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
३७
सूत उवाच
कोपसंरक्तनय़नः प्रज्वलन्निव मन्युना ||
१० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३८
कुन्त्यु उवाच
कोपस्थानेष्वपि महत्स्वकुप्यं न कदाचन ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
११३
वैशम्पाय़न उवाच
कोपात्कमलपत्राक्षि यदर्थं तन्निवोध मे ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
२१९
वैशम्पाय़न उवाच
कोपामर्षौ समुत्सृज्य सम्प्रतस्थे दिवं तदा ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३९
सञ्जय़ उवाच
कोपितः परुषैर्वाक्यैर्धर्मराजो युधिष्ठिरः |
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११७
कर्ण उवाच
कोपिताः पाण्डवा नित्यं मय़ाश्रित्य सुय़ोधनम् ||
२३ ग
वन पर्व
अध्याय
२८७
वैशम्पाय़न उवाच
कोपिते तु द्विजश्रेष्ठे कृत्स्नं दह्येत मे कुलम् ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
कोपेन युध्यमानानां ये च नीचानुसारिणाम् ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
११६
अकृतव्रण उवाच
कोपो अगच्छत्सहसा प्रसन्नश्चाव्रवीदिदम् ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
४३
सूत उवाच
कोपो वा धर्मशीलस्य धर्मलोपोऽथ वा पुनः |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
कोविदारध्वजं दृष्ट्वा भीमसेनः समाश्वसत् ||
८९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
कोशं दण्डं च दुर्गं च सहाय़ान्मन्त्रिणस्तथा |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
कोशं दण्डं वलं मित्रं यदन्यदपि सञ्चितम् |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२८
भीष्म उवाच
कोशं सञ्जनय़ेद्राजा निर्जलेभ्यो यथा जलम् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
कोशकारवदात्मानं वेष्टय़न्नाववुध्यसे ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
कोशकारवदात्मानं वेष्टय़न्नाववुध्यसे ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९२
वसिष्ठ उवाच
कोशकारो यथात्मानं कीटः समनुरुन्धति |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०६
मुनिरु उवाच
कोशक्षय़े त्वमित्राणां वशं कौसल्य गच्छति ||
१८ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
११३
नारद उवाच
कोशधान्यवलोपेतं प्रिय़पौरं द्विजप्रिय़म् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११९
भीष्म उवाच
कोशमूला हि राजानः कोशमूलकरो भव ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
कोशलाय़ां समासाद्य कालतीर्थ उपस्पृशेत् |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११९
भीष्म उवाच
कोशश्च सततं रक्ष्यो यत्नमास्थाय़ राजभिः |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३
युधिष्ठिर उवाच
कोशश्चापि विशीर्णोऽसौ धार्तराष्ट्रस्य दुर्मतेः ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
कोशसञ्जनने दाने भृत्यानां चान्ववेक्षणे |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
कोशसञ्जनने मन्त्रे व्यूहप्रहरणेषु च |
११ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
कोशस्य सञ्चय़े यत्नं कुर्वीथा न्याय़तः सदा |
९ क