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उद्योग पर्व
अध्याय २२
धृतराष्ट्र उवाच
अस्तम्भनीय़ं युधि मन्यमानं; ज्याकर्षतां श्रेष्ठतमं पृथिव्याम् |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१५
भीष्म उवाच
अस्तम्भमनहङ्कारं सत्त्वस्थं समय़े रतम् ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय २२
वासुदेव उवाच
अस्तम्भय़ं महावाहो शाल्ववाणप्रपीडितम् ||
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
अस्तम्भय़त तोय़ं च माय़या मनुजाधिपः ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११८
भीष्म उवाच
अस्तव्धं प्रश्रितं शक्तं मृदुवादिनमेव च |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७१
भीष्म उवाच
अस्तव्धः पूजय़ेन्मान्यान्गुरून्सेवेदमाय़या |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३७
विदुर उवाच
अस्तव्धमक्लीवमदीर्घसूत्रं; सानुक्रोशं श्लक्ष्णमहार्यमन्यैः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय १९१
वैशम्पाय़न उवाच
अस्ति कश्चिदन्यो भवतश्चिरजाततर इति ||
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
अस्ति कश्चिदुपाय़ोऽत्र पुष्कलः प्रतिभाति माम् |
५० क
वन पर्व
अध्याय १९१
वैशम्पाय़न उवाच
अस्ति कश्चिद्भवतश्चिरजाततर इति ||
१ क
वन पर्व
अध्याय १९१
वैशम्पाय़न उवाच
अस्ति कश्चिद्भवतश्चिरजाततर इति ||
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
अस्ति कश्चिद्विशिष्टो वा मद्विधो वा भवेद्युधि |
७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
अस्ति काचिद्विवक्षा तु मम तां गदतः शृणु |
३ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
अस्ति खलु मय़ोच्छिष्टेनोपस्पृष्टं शीघ्रं गच्छता चेति ||
११३ ख
वन पर्व
अध्याय २८५
सूर्य उवाच
अस्ति चात्र परं किञ्चिदध्यात्मं देवनिर्मितम् |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
अस्ति चाय़मिषुः शल्य सुपुङ्खो रक्तभोजनः |
५७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६९
व्राह्मण उवाच
अस्ति चैव कृतं पापमज्ञानात्तदपि त्वय़ा |
२२ क
वन पर्व
अध्याय २६७
मार्कण्डेय़ उवाच
अस्ति त्वत्र नलो नाम वानरः शिल्पिसंमतः |
४१ क
वन पर्व
अध्याय २४१
वैशम्पाय़न उवाच
अस्ति त्वन्यन्महत्सत्रं राजसूय़समं प्रभो |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय ४१
पितर ऊचुः
अस्ति त्वेकोऽद्य नस्तन्तुः सोऽपि नास्ति यथा तथा ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१८
शक्र उवाच
अस्ति देवमनुष्येषु सर्वभूतेषु वा पुमान् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३३
भीष्म उवाच
अस्ति धर्म इति प्रोक्तं नास्तीत्यत्रैव यो वदेत् |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३४
मातो उवाच
अस्ति नः कोशनिचय़ो महानविदितस्तव |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५५
तुलाधार उवाच
अस्ति नस्तत्त्वतो भूय़ इति प्रज्ञागवेषिणः ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय ४१
पितर ऊचुः
अस्ति नस्तात तपसः फलं प्रवदतां वर |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २११
भीष्म उवाच
अस्ति नास्तीति चाप्येतत्तस्मिन्नसति लक्षणे |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
अस्ति नूनं कर्म कृतं पुरस्ता; दनिर्विष्टं पापकं धार्तराष्ट्रैः ||
६ ग
वन पर्व
अध्याय २५७
वैशम्पाय़न उवाच
अस्ति नूनं मय़ा कश्चिदल्पभाग्यतरो नरः |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय ४९
वासुदेव उवाच
अस्ति पौरवदाय़ादो विडूरथसुतः प्रभो |
६७ क
वन पर्व
अध्याय ५८
वृहदश्व उवाच
अस्ति भक्षो ममाद्याय़ं वसु चेदं भविष्यति ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय ३६
भीमसेन उवाच
अस्ति मासः प्रतिनिधिर्यथा प्राहुर्मनीषिणः |
३२ क
वन पर्व
अध्याय ८०
भीष्म उवाच
अस्ति मे भगवन्कश्चित्तीर्थेभ्यो धर्मसंशय़ः |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २६
भीष्म उवाच
अस्ति मे भगवन्कश्चित्तीर्थेभ्यो धर्मसंशय़ः |
५ क
आदि पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
अस्ति मे मानुषे लोके नरदेवात्मजा सखी |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३७
द्रोण उवाच
अस्ति मे वलमित्येव सहसा त्वं तितीर्षसि |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
अस्ति मे वलवानस्मि राजास्मीति युधिष्ठिर |
२५ क
विराट पर्व
अध्याय १५
कीचक उवाच
अस्ति मे शय़नं शुभ्रं त्वदर्थमुपकल्पितम् |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५४
कुशिक उवाच
अस्ति मे संशय़ः कश्चित्तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ||
४० ख
आदि पर्व
अध्याय ४७
ऋत्विज ऊचुः
अस्ति राजन्महत्सत्रं त्वदर्थं देवनिर्मितम् |
६ क
वन पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
अस्ति राजा मय़ा कश्चिदल्पभाग्यतरो भुवि |
३४ क
सभा पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
अस्ति विन्दुसरस्येव गदा श्रेष्ठा कुरूद्वह |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७४
युधिष्ठिर उवाच
अस्ति वृत्रवधादेव विवक्षा मम जाय़ते ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
व्रह्मदत्त उवाच
अस्ति वै कृतमस्माभिरस्ति प्रतिकृतं त्वय़ा |
२० क
आदि पर्व
अध्याय १११
तापसा ऊचुः
अस्ति वै तव धर्मात्मन्विद्म देवोपमं शुभम् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय १२७
ऋत्विगु उवाच
अस्ति वै तादृशं कर्म येन पुत्रशतं भवेत् |
१७ क
सभा पर्व
अध्याय ५८
शकुनिरु उवाच
अस्ति वै ते प्रिय़ा देवी ग्लह एकोऽपराजितः |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
अस्ति वोऽस्यान्तरं कश्चित्कुमारस्य प्रपश्यति ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय १६७
गन्धर्व उवाच
अस्ति सन्तानमित्युक्त्वा मृत्योः पार्थ न्यवर्तत ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय ३३
द्रौपद्यु उवाच
अस्ति सर्वमदृश्यं तु दिष्टं चैव तथा हठः |
३१ ख
वन पर्व
अध्याय २७७
युधिष्ठिर उवाच
अस्ति सीमन्तिनी काचिद्दृष्टपूर्वाथ वा श्रुता |
३ क