भीष्म पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
स्वर्गं परमभीप्सन्तः सुय़ुद्धेन कुरूद्वहाः ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
युधिष्ठिर उवाच
स्वर्गं पुण्यं च लभते कथं भरतसत्तम ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
स्वर्गं पुण्यं यथाकाममुपभुङ्क्ते यथाविधि ||
१३३ ख
वन पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
स्वर्गं प्राप्ताश्चरन्ति स्म देवैः सह गतव्यथाः ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
११२
वैशम्पाय़न उवाच
स्वर्गं मनुजशार्दूल गच्छेय़ं सहिता त्वय़ा |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
स्वर्ग उवाच
स्वर्गं मां विद्धि राजेन्द्र रूपिणं स्वय़मागतम् |
७६ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२
विदुर उवाच
स्वर्गं यान्ति तथा मर्त्या यथा शूरा रणे हताः ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
स्वर्गं येन द्विजः प्राप्तः सभार्यः ससुतस्नुषः |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७
भीष्म उवाच
स्वर्गं सत्येन लभते दीक्षय़ा कुलमुत्तमम् ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३३
उमो उवाच
स्वर्गं समभिपद्यन्ते सम्प्रदानेन केन वा ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
१९९
मार्कण्डेय़ उवाच
स्वर्गं सुदुर्लभं प्राप्तः क्षमावान्द्विजसत्तम ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
स्वर्गं स्वर्गसदश्चैव धर्मश्च स्वय़मेव तु ||
२५ ग
वन पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
स्वर्गं हि गत्वा सशरीर एव; को मानुषः पुनरागन्तुमिच्छेत् |
२९ क
सभा पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
स्वर्गं ह्येव समास्थाय़ रणय़ज्ञेषु दीक्षिताः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८३
भृगुरु उवाच
स्वर्गः प्रकाश इत्याहुर्नरकं तम एव च |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६०
स्यूमरश्मिरु उवाच
स्वर्गकामो यजेतेति सततं श्रूय़ते श्रुतिः |
१८ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
५
सूत उवाच
स्वर्गकामो लभेत्स्वर्गं जय़कामो लभेज्जय़म् |
४० क
वन पर्व
अध्याय
१५९
वैश्रवण उवाच
स्वर्गजिच्छक्रलोकस्थः कुशलं परिपृच्छति ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय
८२
वैशम्पाय़न उवाच
स्वर्गतः स तु राजेन्द्रो निवसन्देवसद्मनि |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२१
युधिष्ठिर उवाच
स्वर्गतश्चैव किं कुर्याद्येन न च्यवते दिवः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वासुदेव उवाच
स्वर्गताश्च महात्मानो वीराः क्षत्रिय़पुङ्गवाः ||
४८ ख
आदि पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
स्वर्गते शन्तनौ भीष्मश्चित्राङ्गदमरिन्दमम् |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
१४५
व्राह्मण उवाच
स्वर्गतो हि पिता वृद्धस्तथा माता चिरं तव |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
स्वर्गतोऽभिमुखः सङ्ख्ये युध्यमानो नरर्षभः ||
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५५
जाजलिरु उवाच
स्वर्गद्वारं च वृत्तिं च भूतानामवरोत्स्यते ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
स्वर्गद्वारं ततो गच्छेन्निय़तो निय़ताशनः |
१४५ क
सभा पर्व
अध्याय
५१
दुर्योधन उवाच
स्वर्गद्वारं दीव्यतां नो विशिष्टं; तद्वर्तिनां चापि तथैव युक्तम् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
स्वर्गद्वारं प्रजाद्वारं मोक्षद्वारं त्रिविष्टपम् ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
स्वर्गद्वारं प्रजाद्वारं मोक्षद्वारं त्रिविष्टपम् |
१४० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
श्वशुर उवाच
स्वर्गद्वारं सुसूक्ष्मं हि नरैर्मोहान्न दृश्यते |
६९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
कुण्डधार उवाच
स्वर्गद्वारं हि संरुद्धं मानुषेषु विशेषतः ||
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३५१
सूर्य उवाच
स्वर्गद्वारकृतोद्योगो येनासौ त्रिदिवं गतः ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
सौदास उवाच
स्वर्गद्वारस्य गमने स्थाने चेह द्विजोत्तम ||
६ ग
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
स्वर्गद्वारेण यत्तुल्यं गङ्गाद्वारं न संशय़ः ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३२
विदुरो उवाच
स्वर्गद्वारोपमं राज्यमथ वाप्यमृतोपमम् |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
स्वर्गपर्व ततो ज्ञेय़ं दिव्यं यत्तदमानुषम् |
२३२ क
आदि पर्व
अध्याय
१११
वैशम्पाय़न उवाच
स्वर्गपारं तितीर्षन्स शतशृङ्गादुदङ्मुखः |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२४७
व्यास उवाच
स्वर्गभाजश्च्यवन्तीह तस्मात्स्वर्गं न कामय़े ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
स्वर्गमार्गाभिरामेषु सत्त्वेषु निरता ह्यहम् ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
स्वर्गमार्गोपगा भूय़ः किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ||
३९ ख
सभा पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
स्वर्गमास्थाय़ कस्य स्याद्विग्रहित्वं यथा तव |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६०
स्यूमरश्मिरु उवाच
स्वर्गमेवाभिकाङ्क्षन्ते न च स्वर्गस्त्वृते मखम् ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
स्वर्गमेष गतः शूरो यो हतो नपराङ्मुखः |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
स्वर्गलोकमवाप्नोति देवैश्च सह मोदते ||
५० ग
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
स्वर्गलोकमवाप्नोति व्रह्मलोकं च गच्छति ||
१४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३५
व्यास उवाच
स्वर्गलोके गृहस्थानां प्रतिष्ठा निय़तात्मनाम् |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७२
भीष्म उवाच
स्वर्गलोके च महतीं श्रिय़ं प्राप्स्यसि पाण्डव |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
स्वर्गलोके महीय़न्तमप्सरोभिः शचीपतिम् |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
स्वर्गलोके महीय़ेत नरो नास्त्यत्र संशय़ः ||
५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३५
व्यास उवाच
स्वर्गलोको गृहस्थानामुदारमनसां हितः |
२५ क