chevron_left  तस्मिन्यःarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय १८०
भृगुरु उवाच
तस्मिन्यः संश्रितो देहे ह्यव्विन्दुरिव पुष्करे ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय २०३
व्याध उवाच
तस्मिन्यः संस्थितो ह्यग्निर्नित्यं स्थाल्यामिवाहितः |
३० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८७
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्यज्ञे प्रवृत्ते तु वाग्मिनो हेतुवादिनः |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५
जनमेजय़ उवाच
तस्मिन्यदुक्तवान्काले तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्मिन्युगसहस्रान्ते सम्प्राप्ते चाय़ुषः क्षय़े |
५६ क
शल्य पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्युद्धे महाराज सम्प्रवृत्ते सुदारुणे |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५३
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्युद्धे महारौद्रे वर्तमाने सुदारुणे |
२४ क
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्मिन्रथे पशुपतिः स्थितो भात्युमय़ा सह |
४ क
वन पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्रथे स्थितं सूतं तप्तहेमविभूषितम् |
९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्रात्रिमुखे घोरे दुःखशोकसमन्विताः |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्रात्रिमुखे घोरे पाण्डवा वृष्णिभिः सह |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय १३९
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्रात्रिमुखे घोरे पुत्रस्य तव शासनात् ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२९
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्रात्रिमुखे घोरे महाशव्दनिनादिते |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९९
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्रौद्रे तथा युद्धे वर्तमाने महाभय़े |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्रौद्रे राक्षसेन्द्रे यदि ते हृच्छय़ो महान् |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८६
दुर्योधन उवाच
तस्मिन्वद्धे भविष्यन्ति वृष्णय़ः पृथिवी तथा |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
तस्मिन्वद्धे महाप्राज्ञः शत्रौ नित्यातताय़िनि |
२६ क
वन पर्व
अध्याय ९७
लोमश उवाच
तस्मिन्वनगते गर्भो ववृधे सप्त शारदान् ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय २२०
जनमेजय़ उवाच
तस्मिन्वने दह्यमाने व्रह्मन्नेतद्वदाशु मे ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय २१९
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्वने दह्यमाने षडग्निर्न ददाह च |
४० क
वन पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्वने धर्मभृतां निवासे; ददर्श सिद्धर्षिगणाननेकान् ||
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २७
व्राह्मण उवाच
तस्मिन्वने सप्त महाद्रुमाश्च; फलानि सप्तातिथय़श्च सप्त |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६४
भीष्म उवाच
तस्मिन्वने समीपस्थो मृगोऽभूत्सहचारिकः |
८ ख
विराट पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्वसंश्च वीभत्सुरानिनाय़ जनार्दनम् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय २४८
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्वहुमृगेऽरण्ये रममाणा महारथाः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्वाक्यान्तरे वक्ता देवस्थानो महातपाः |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्वाक्यान्तरे वाक्यं क्षत्तापि विदुरोऽव्रवीत् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्वाक्यान्तरे वाक्यं पुनरेवार्जुनोऽव्रवीत् |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८६
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्वाच्याः प्रिय़ा वाचो भवता वान्धवैः सह ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७६
भृगुरु उवाच
तस्मिन्वाय़्वम्वुसङ्घर्षे दीप्ततेजा महावलः |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९७
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्विनिर्जिते तूर्णं कूटय़ोधिनि राक्षसे |
२८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३२
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्विनिहते चास्त्रे भारद्वाजो युधिष्ठिरे |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्विनिहते नूनं युध्यतेऽसौ जनार्दनः |
३३ क
विराट पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्विनिहते मल्ले जीमूते लोकविश्रुते |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३२
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्विनिहते वीरे वाह्लीके पुरुषर्षभे |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
धृतराष्ट्र उवाच
तस्मिन्विनिहते वीरे सैन्धवे सव्यसाचिना |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२६
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्विनिहते शूरे किं शेषं पर्युपास्महे ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८२
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्विनिहते शूरे त्रिगर्तानां महारथे |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १
धृतराष्ट्र उवाच
तस्मिन्विनिहते शूरे दुराधर्षे महौजसि |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय १५७
वासुदेव उवाच
तस्मिन्विनिहते सर्वे पाण्डवाः सृञ्जय़ैः सह |
३५ क
वन पर्व
अध्याय १७
वासुदेव उवाच
तस्मिन्विप्रद्रुते क्रूरे शाल्वस्याथ चमूपतौ |
१७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
श्वशुर उवाच
तस्मिन्विप्रे गते स्वर्गं ससुते सस्नुषे तदा |
८३ क
आदि पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्विमर्दे तुमुले शस्त्रवृष्टिसमाकुले |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५४
भीष्म उवाच
तस्मिन्विमाने सौवर्णे मणिस्तम्भसमाकुले |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
गौतम उवाच
तस्मिन्विरजसि स्फीते प्रज्ञासत्त्वव्यवस्थिते |
५१ क
शल्य पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्विलुलिते सैन्ये त्रस्तास्तस्य पदानुगाः |
४५ क
शल्य पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्विलुलिते सैन्ये वध्यमाने परस्परम् |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०५
सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्विलुलिते सैन्ये सैन्धवाय़ार्जुने गते |
१ क
वन पर्व
अध्याय १४६
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्विहरमाणाश्च रममाणाश्च पाण्डवाः ||
१ ग
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्वीरसमावाय़े संरव्धेष्वथ राजसु |
४१ क