शान्ति पर्व
अध्याय
३०३
याज्ञवल्क्य उवाच
न चोदकस्य स्पर्शेन मत्स्यो लिप्यति सर्वशः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०३
याज्ञवल्क्य उवाच
न चोदकस्य स्पर्शेन लिप्यते तत्र पुष्करम् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०३
याज्ञवल्क्य उवाच
न चोदुम्वरसंय़ोगैर्मशकस्तत्र लिप्यते ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२२
शार्ङ्गका ऊचुः
न चोपकृतमस्माभिर्न चास्मान्वेत्थ ये वय़म् |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
न चोपदिष्टस्तस्यासीन्मय़ानीकविनिर्गमः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४७
शौनक उवाच
न चोपलभते तत्र न च कार्याणि पश्यति |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०३
याज्ञवल्क्य उवाच
न चोपलिप्यते सोऽग्निरुखासंस्पर्शनेन वै ||
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
न चोपलेभे भगवाञ्शक्रः प्रहरणं तदा |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७७
भगवानु उवाच
न चोपशाम्यते पापः श्रिय़ं दृष्ट्वा युधिष्ठिरे ||
१३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४५
नारद उवाच
न चोपाय़ं प्रपश्यामि मोक्षणे जातवेदसः |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
न चोपय़ुङ्क्ते तद्दारु यावन्नो दीप्यते परैः ||
५६ ख
आदि पर्व
अध्याय
४५
सूत उवाच
न चोवाच स मेधावी तमथो साध्वसाधु वा |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६५
भीष्म उवाच
न चोषरां न निर्दग्धां महीं दद्यात्कथञ्चन |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
न चोष्ट्रा न वलीवर्दा नाश्वाश्वतरगर्दभाः |
४१ क
विराट पर्व
अध्याय
४
धौम्य उवाच
न चोष्ठौ निर्भुजेज्जातु न च वाक्यं समाक्षिपेत् |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
विदुर उवाच
न छन्दांसि वृजिनात्तारय़न्ति; माय़ाविनं माय़या वर्तमानम् |
३५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४३
सनत्सुजात उवाच
न छन्दांसि वृजिनात्तारय़न्ति; माय़ाविनं माय़या वर्तमानम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
व्राह्मण उवाच
न छन्दय़ामि ते राजन्नापि ते गृहमाव्रजम् |
७४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
न जग्मुः संविदं तैश्च दर्पादसुरसत्तमाः ||
३० ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
६९
व्राह्मण उवाच
न जग्राह यय़ौ चापि तदा स व्राह्मणर्षभः ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
न जघान नरव्याघ्रः स्मरन्भीमवचस्तदा ||
४० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
न जघान महावाहुर्भीमसेनवचः स्मरन् ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
न जघान रणे पार्थं कृष्णं वा देवकीसुतम् ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
न जघान रणे भीष्मः स च तं नाववुद्धवान् ||
८० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५७
धृतराष्ट्र उवाच
न जघान वृषा कस्मात्तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
न जघानार्जुनो योधान्योधव्रतमनुस्मरन् ||
४८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८२
अर्जुन उवाच
न जनित्री तथास्येय़ं मम या प्रेष्यवत्स्थिता ||
५ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८
संवर्त उवाच
न जरा क्षुत्पिपासे वा न मृत्युर्न भय़ं नृप ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
न जरा न च दुर्भिक्षं नाधय़ो व्याधय़स्तथा ||
१२४ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
गौतम उवाच
न जरामरणे वापि न पुण्यं न च पातकम् ||
५० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४८
भीष्म उवाच
न जल्पन्ति च भुञ्जाना न निद्रान्त्यार्द्रपाणय़ः ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५
भीष्म उवाच
न जहाति शुको वासं तस्य भक्त्या वनस्पतेः ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
न जहुः समरे पार्थं वध्यमानाः शितैः शरैः ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
न जहुः समरे शूरं शल्यमाहवशोभिनम् ||
४५ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
न जहौ धर्मतः पार्थान्मेरुमर्कप्रभा यथा ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
न जहौ समरे भीमं क्रुद्धरूपं परन्तपः ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
न जह्याच्च तनुत्राणं रक्षेदात्मानमात्मना ||
१३ ग
वन पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
न जह्याज्जीवितं प्राज्ञस्तं गच्छानय़ सञ्जय़ ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
न जह्यात्पुरुषव्याघ्रस्तावद्वारय़ कौरवम् ||
६३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
न जातु कलहेनेच्छेन्निय़न्तुमपकारिणः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
न जातु कश्चित्पश्येत्तु गुह्यमेतद्युधिष्ठिर ||
५३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४०
विदुर उवाच
न जातु कामान्न भय़ान्न लोभा; द्धर्मं त्यजेज्जीवितस्यापि हेतोः ||
११ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
५
सूत उवाच
न जातु कामान्न भय़ान्न लोभा; द्धर्मं त्यजेज्जीवितस्यापि हेतोः |
५० क
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
भगवानु उवाच
न जातु गमनं तत्र भवेत्पार्थ निरर्थकम् |
८८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
न जातु तं शत्रवोऽन्ये सहेर; न्येषां स स्यादग्रणीर्वृष्णिसिंहः ||
३९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
न जातु तस्य कर्माणि युधि गाण्डीवधन्वनः |
४८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
न जातु ताञ्शत्रुरन्यः सहेत; येषां स स्यादग्रणीर्वृष्णिसिंहः |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४८
भीष्म उवाच
न जातु त्वमिति व्रूय़ादापन्नोऽपि महत्तरम् |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
न जातु नः शत्रवो धारय़ेय़ु; रसंशय़ं सत्यमेतद्व्रवीमि ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४८
शौनक उवाच
न जातु नाहमस्मीति प्रसक्तव्यमसाधुषु ||
२१ ख