शल्य पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र स्नात्वा च दत्त्वा च द्विजेभ्यो वसु माधवः ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र स्नात्वा च दत्त्वा च वसु विप्रेषु माधवः |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र स्नात्वा च दत्त्वा च वसूनि विविधानि च |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वा च पीत्वा च वसूनां संमतो भवेत् ||
९४ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वा तु योन्यां वै नरो भरतसत्तम ||
१०० ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वा दिवं यान्ति अपि पापकृतो जनाः |
१२९ क
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वा नरः क्षिप्रं शक्रलोकमवाप्नुय़ात् ||
९७ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वा नरः क्षिप्रं सिद्धिमाप्नोति भारत ||
११३ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र अग्निष्टोमफलं लभेत् ||
१५ ग
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र गच्छेत परमां गतिम् ||
५२ ग
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र दृष्टमेतत्पुरातने ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र द्योतते शशिवत्सदा |
१२२ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र न शोचति नराधिप ||
२२ ग
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र रुद्रकोट्यां नरः शुचिः |
१२९ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र वाय़ुलोके महीय़ते ||
८८ ग
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र विन्देद्वहु सुवर्णकम् |
१३२ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र व्रह्मलोकं प्रपद्यते |
१२१ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र सर्वपापैः प्रमुच्यते ||
११८ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र हय़मेधमवाप्नुय़ात् ||
९० ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वा नरश्रेष्ठ लभेद्वहु सुवर्णकम् ||
९५ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वा नरश्रेष्ठ वाजपेय़मवाप्नुय़ात् |
१०४ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वा नरो राजन्गोसहस्रफलं लभेत् ||
१३० ख
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वा नरो राजन्गोसहस्रफलं लभेत् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वा नरो राजन्गोसहस्रफलं लभेत् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वा नरो राजन्धर्मशीलः समाहितः |
१ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वा नरो राजन्न दुर्गतिमवाप्नुय़ात् ||
१४६ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वा नरो राजन्न दुर्गतिमवाप्नुय़ात् ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वा नरो राजन्नग्निष्टोमफलं लभेत् ||
४२ ग
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वा नरो राजन्नग्निष्टोमफलं लभेत् ||
९१ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वा नरो राजन्पुण्डरीकफलं लभेत् ||
६९ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वा नरो राजन्सोमलोकमवाप्नुय़ात् ||
९६ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वा नरो राजन्स्वर्गलोकं प्रपद्यते ||
१५३ ग
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वा नरो राजन्स्वर्गलोके महीय़ते ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वा भवेद्विप्रो विमलश्चन्द्रमा यथा ||
९८ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वा महाराज व्राह्मण्यमभिजाय़ते ||
१२० ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वा स्थितो रात्रिं रुद्रलोकमवाप्नुय़ात् ||
१५५ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वार्चय़ित्वा च त्रिलोकप्रभवं हरिम् |
९ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वार्चय़ित्वा च दैवतानि पितॄंस्तथा |
३८ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वार्चय़ित्वा च दैवतानि पितॄंस्तथा |
५७ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वार्चय़ित्वा च पितॄन्देवांश्च भारत |
६४ क
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वार्चय़ित्वा च रुद्रं देवगणैर्वृतम् |
८९ ख
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वार्चय़ित्वा च शूलपाणिं वृषध्वजम् |
७१ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
तत्र स्नात्वार्चय़ेद्देवान्पितॄंश्च प्रय़तः शुचिः |
७९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
तत्र स्नाय़ुमय़ान्पाशान्यथावत्संनिधाय़ सः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
९९
लोमश उवाच
तत्र स्म केचिन्मतिनिश्चय़ज्ञा; स्तांस्तानुपाय़ाननुवर्णय़न्ति ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र स्म गाथा गाय़न्ति मनुष्या भरतर्षभ |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
तत्र स्म गाथा गाय़न्ति साम्ना परमवल्गुना |
२८ क
सभा पर्व
अध्याय
४९
दुर्योधन उवाच
तत्र स्म दध्मुः शतशः शङ्खान्मङ्गल्यकारणात् |
१७ क
सभा पर्व
अध्याय
४८
दुर्योधन उवाच
तत्र स्म द्वारपालैस्ते प्रोच्यन्ते राजशासनात् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
तत्र स्म नित्यं वध्यन्ते नक्तं वहुविधा मृगाः |
२५ क