उद्योग पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
तपस्विनो महात्मानो वेदव्रतसमन्विताः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७८
राजो उवाच
तपस्विनो मे विषय़े पूजिताः परिपालिताः |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
तपस्विनो व्रह्मविदो गोत्रकर्तार एव च ||
४८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२३
भीष्म उवाच
तपस्विनौ च तावाहुस्ताभ्यां कार्यं सदा नमः ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
शिविरु उवाच
तपस्विभिर्विरुध्येत यस्ते हरति पुष्करम् ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
श्रीभगवानु उवाच
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः |
४६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२६
वासुदेव उवाच
तपस्विव्रतसन्दीप्ता ज्ञानविज्ञानशोभिताः ||
३८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
तपस्विसिद्धचरितं यत्र कन्या धृतव्रता ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०१
भीष्म उवाच
तपस्वी कश्चिदभवत्सुवर्णो नाम नामतः |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
तपस्वी कृतविद्यश्च प्रेक्षितेनापि निर्दहेत् ||
५६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३८
कुन्त्यु उवाच
तपस्वी कोपनो विप्रो दुर्वासा नाम मे पितुः |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
१३
सूत उवाच
तपस्वी च महात्मा च वेदवेदाङ्गपारगः |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय
५
सूत उवाच
तपस्वी च यशस्वी च श्रुतवान्व्रह्मवित्तमः |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७
शल्य उवाच
तपस्वी तत्र भगवानगस्त्यः प्रत्यदृश्यत ||
१ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
व्राह्मण उवाच
तपस्वी त्यक्तसङ्कल्पो दम्भाहङ्कारवर्जितः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
२०५
व्याध उवाच
तपस्वी त्वं महात्मा च धर्मे च निरतः सदा |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
तपस्वी धर्मतत्त्वज्ञः कृष्णद्वैपाय़नोऽव्रवीत् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
१९७
मार्कण्डेय़ उवाच
तपस्वी धर्मशीलश्च कौशिको नाम भारत ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
१६३
अर्जुन उवाच
तपस्वी नचिरेण त्वं द्रक्ष्यसे विवुधाधिपम् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२३
वासुदेव उवाच
तपस्वी नारदो वाढं वाचि नास्य व्यतिक्रमः |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०६
भगीरथ उवाच
तपस्वी निय़ताहारः शममास्थाय़ वाग्यतः ||
२५ ग
आदि पर्व
अध्याय
२२०
देवा ऊचुः
तपस्वी यज्ञकृच्चासि न तु ते विद्यते प्रजा ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२३
युधिष्ठिर उवाच
तपस्वी यज्ञशीलो वा कथं पात्रं भवेत्तु सः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८९
भीष्म उवाच
तपस्वी सत्यवादी च वुद्धिमांश्चाभिरक्षति ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
तपांसि निय़मांश्चैव यमानपि पृथग्विधान् |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
व्राह्मण उवाच
तपांसि यानि चीर्णानि चरिष्यसि च यत्तपः |
६२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
तपांसि संय़ोगविधिर्वेदाः स्तोभाः सरस्वती |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
तपांसि सूक्ष्माणि सुखानि चैव; साङ्ख्ये यथावद्विहितानि राजन् ||
१०५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७०
नाचिकेत उवाच
तपांस्युग्राण्यप्रतिशङ्कमाना; स्ते वै दानं प्रददुश्चापि शक्त्या ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
तपाः प्रकृतिरित्याहुरतपा निष्कलः स्मृतः ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय
१७९
वैशम्पाय़न उवाच
तपात्ययनिकेताश्च शतशोऽथ सहस्रशः |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
तपात्यये पुष्पधरैरुपेतं; महावनं राष्ट्रपतिर्ददर्श ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५५
वासुदेव उवाच
तपान्ते तोय़दो यद्वच्छरधाराः क्षरत्यसौ |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७६
सञ्जय़ उवाच
तपान्ते सरितः पूर्णा महाग्राहसमाकुलाः ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
तपामि चैव त्रैलोक्यं विद्योताम्यहमेव च ||
४२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३१
श्रीभगवानु उवाच
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९४
व्राह्मणा ऊचुः
तपो घोरमनिर्देश्यं तप्येते गन्धमादने ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३०
पितर ऊचुः
तपो घोरमुपातिष्ठ ततः श्रेय़ोऽभिपत्स्यसे ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
तपो ज्ञानमहिंसा च सत्यासत्ये नय़ः परः |
८३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
तपो दमश्च सत्यं च दानं चेति समं मतम् ||
९३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
तपो दमो व्रह्मवित्त्वं वितानाः; पुण्या विवाहाः सततान्नदानम् |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
तपो न कल्कोऽध्ययनं न कल्कः; स्वाभाविको वेदविधिर्न कल्कः |
२१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
तपो नाराय़णपरं नाराय़णपरा गतिः ||
७५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
भीष्म उवाच
तपो निःश्रेय़सं जन्तोस्तस्य मूलं दमः शमः |
५३ क
वन पर्व
अध्याय
२००
व्याध उवाच
तपो निःश्रेय़सं जन्तोस्तस्य मूलं शमो दमः |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६४
भीष्म उवाच
तपो महत्समुच्छिन्नं तस्माद्धिंसा न यज्ञिय़ा ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
तपो यज्ञः श्रुतं शीलमलोभः सत्यसन्धता |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
तपो यज्ञस्तथा विद्या भैक्षमिन्द्रिय़निग्रहः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८०
भीष्म उवाच
तपो यज्ञादपि श्रेष्ठमित्येषा परमा श्रुतिः |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
तपो येषां धनं नित्यं वाक्चैव विपुलं वलम् |
६ क