उद्योग पर्व
अध्याय
१७९
सञ्जय़ उवाच
न चास्याः सोऽकरोद्वाक्यं क्रोधपर्याकुलेक्षणः ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३१
भीष्म उवाच
न चास्याल्पेन तुष्यन्ति कार्यमभ्युत्सहन्ति च ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
न चास्यासीदनिर्भिन्नं गात्रे द्व्यङ्गुलमन्तरम् |
५१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
न चास्यास्त्राणि राजेन्द्र प्रादुरासन्महात्मनः ||
११८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
न चाहं कञ्चिदत्यर्थमपराधमरिन्दम |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
८८
शिविरु उवाच
न चाहं तान्प्रतिपत्स्येह दत्त्वा; यत्र गत्वा त्वमुपास्से ह लोकान् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
५८
नल उवाच
न चाहं त्यक्तुकामस्त्वां किमर्थं भीरु शङ्कसे |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
२३८
वैशम्पाय़न उवाच
न चाहं त्वदृते राजन्प्रशासेय़ं वसुन्धराम् |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
६२
वृहदश्व उवाच
न चाहं पुरुषानन्यान्सम्भाषेय़ं कथञ्चन ||
३८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
न चाहं युधि राधेय़ं गणय़े तुल्यमात्मना ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
न चाहं लक्षय़े कञ्चिद्व्यभिचारमिहात्मनः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
न चाहं शीघ्रय़ानेऽद्य समर्थो वय़सान्वितः |
२२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
४
कृप उवाच
न चाहं समरे तात कृतवर्मा तथैव च |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
१५२
भीम उवाच
न चाहं हातुमिच्छामि क्षात्रधर्मं कथञ्चन ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८९
भीष्म उवाच
न चाहङ्कारय़ोगेन मनः प्रस्थापय़ेत्क्वचित् |
१७ क
विराट पर्व
अध्याय
१४
द्रौपद्यु उवाच
न चाहमनवद्याङ्गि तव वेश्मनि भामिनि |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
न चाहमभिनन्दामि न च माद्रीसुतावुभौ ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६१
तपत्यु उवाच
न चाहमीशा देहस्य तस्मान्नृपतिसत्तम |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
न चाहमुत्सहे कृष्णं विना स्थातुमपि क्षणम् ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
न चाहमुत्सहे कृष्णमृते लोकमुदीक्षितुम् |
३१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३२
धृतराष्ट्र उवाच
न चाहमेतस्य भवाम्यकाल्यः; स मे कस्माद्द्वारि तिष्ठेत क्षत्तः ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
न चाहमेनं यास्यामि पुनर्भीष्मं कथञ्चन ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
न चाहितमनिष्टं वा किञ्चित्तत्र व्यदृश्यत ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१५०
कुन्त्यु उवाच
न चाय़ं वुद्धिदौर्वल्याद्व्यवसाय़ः कृतो मय़ा ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९५
वसिष्ठ उवाच
न चाय़मपराधोऽस्या अपराधो ह्ययं मम |
३३ क
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
न चाय़मलसो भिक्षुरभ्यभाषत किञ्चन ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३१
जनमेजय़ उवाच
न चित्रं कृतवांस्तत्र यदार्यो मे धनञ्जय़ः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
न चिरं पूजय़िष्यन्ति देवास्त्वां मानुषास्तथा ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
न चुकोप स चागस्त्यो युक्तोऽपि नहुषेण वै |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
न चुकोप स धर्मात्मा ततः पादेन देवराट् |
२० क
मौसल पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
न चुक्रोध महातेजा जानन्कालस्य पर्ययम् ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय
१६५
गन्धर्व उवाच
न चुक्षुभे न धैर्याच्च विचचाल धृतव्रतः ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
न चेच्छक्यमथोत्स्रष्टुं वैरमेतत्सुदारुणम् |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
६५
वृहदश्व उवाच
न चेच्छक्याविहानेतुं दमय़न्ती नलोऽपि वा |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
४४
सूत उवाच
न चेच्छाम्यफलं तस्य दारकर्म मनीषिणः ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
देवा ऊचुः
न चेतसोऽस्ति संस्पर्शो मम देव विभावसो |
६० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७६
भीष्म उवाच
न चेत्करिष्यति वचो मय़ोक्तं जाह्नवीसुतः |
३३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३६
वैशम्पाय़न उवाच
न चेत्करिष्यसि वचः सुहृदामरिकर्शन |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४१
च्यवन उवाच
न चेत्करिष्यसि वचो मय़ोक्तं वलसूदन |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५३
भीष्म उवाच
न चेत्ते मां हनिष्यन्ति पूर्वमेव समागमे ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
न चेत्परित्रास्य इमाञ्जनान्भय़ा; द्द्विषद्भिरेवं वलिभिः प्रपीडितान् |
२४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
न चेत्प्रवुध्यते कृष्ण नरकाय़ैव गच्छति |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
न चेत्प्रय़च्छध्वममित्रघातिनो; युधिष्ठिरस्यांशमभीप्सितं स्वकम् |
१४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
न चेत्फलमवाप्नोति द्रौणिः पापस्य कर्मणः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
न चेत्स मम राजेन्द्र गृह्णीय़ान्मधुरं वचः |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
न चेत्सन्धास्यसे राजन्स्वेन कामेन पाण्डवैः |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
२४७
देवदूत उवाच
न चेत्सम्वुध्यते तत्र गच्छत्यधमतां ततः ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
२२९
वैशम्पाय़न उवाच
न चेतय़ति वो राजा मन्दवुद्धिः सुय़ोधनः |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०
भीम उवाच
न चेदं दारुणं युद्धमभविष्यन्महीक्षिताम् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
न चेदमचलं स्थानमनन्तं वापि कस्यचित् |
४३ क