शान्ति पर्व
अध्याय
३१
नारद उवाच
जज्ञे पुत्रो महावीर्यस्तेजसा प्रज्वलन्निव ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
जज्ञे वहुज्ञं परमत्युदारं; यं द्वीपमध्ये सुतमात्मवन्तम् |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
जज्ञे शैलगुरुः प्रांशुर्महिम्ना प्रथितः प्रभुः |
३२ ख
वन पर्व
अध्याय
१९३
मार्कण्डेय़ उवाच
जज्ञे श्रावस्तको राजा श्रावस्ती येन निर्मिता |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
जज्वलुश्चैव शस्त्राणि ध्वजाश्चैव चकम्पिरे |
३७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
जज्वलुश्चैव शस्त्राणि भारद्वाजस्य मारिष |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
जज्वाल खं सनक्षत्रं प्रमूढं भुवनं भृशम् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
४९
वासुदेव उवाच
जज्वाल तस्य वाणैस्तु चित्रभानुर्दिधक्षय़ा ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
जज्वालालङ्कृतैः सेना पत्रिभिः प्राणभोजनैः |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय
१४४
वैशम्पाय़न उवाच
जटाः कृत्वात्मनः सर्वे वल्कलाजिनवाससः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
जटाकरणसंस्कारं द्विजातित्वमवाप्य च |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
जटाजिनधरा दान्ताः पङ्कदिग्धा जितेन्द्रिय़ाः |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४८
ऋषय़ ऊचुः
जटाजिनधराश्चान्ये मुण्डाः केचिदसंवृताः ||
१७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
जटाधराः पञ्चशिखास्तथा मुण्डाः कृशोदराः |
२४ क
शल्य पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
जटामण्डलसंवीतः स्वर्णचीरी महातपाः |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
जटालिका कामचरी दीर्घजिह्वा वलोत्कटा ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१०
भीष्म उवाच
जटाश्च तेजसा तस्य वैश्वानरशिखोपमाः |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
जटासुरवधः पर्व यक्षय़ुद्धमतः परम् |
४४ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
जटासुरस्य तत्रैव वधः समुपवर्ण्यते ||
१११ ख
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
जटासुरस्य तु शिरो भीमसेनवलाद्धृतम् |
६० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
जटासुरात्परिक्लेशं चित्रसेनेन चाहवम् |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८
शल्य उवाच
जटासुरात्परिक्लेशः कीचकाच्च महाद्युते |
३४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१२
वासुदेव उवाच
जटासुरात्परिक्लेशश्चित्रसेनेन चाहवः |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४९
सञ्जय़ उवाच
जटासुरिं भैमसेनिरवधीन्मुष्टिना भृशम् ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४९
सञ्जय़ उवाच
जटासुरिर्भैमसेनिं नानाशस्त्रैरवाकिरत् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४९
सञ्जय़ उवाच
जटासुरिर्महाराज विरथो हतसारथिः |
१९ क
सभा पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
जटासुरो मद्रकान्तश्च राजा; कुन्तिः कुणिन्दश्च किरातराजः |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४९
सञ्जय़ उवाच
जटासुरो मम पिता रक्षसामग्रणीः पुरा |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
जटिने दण्डिने नित्यं लम्वोदरशरीरिणे |
५१ क
वन पर्व
अध्याय
१६२
वैशम्पाय़न उवाच
जटिलं देवराजस्य तपोय़ुक्तमकल्मषम् |
१० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
जटिला दीर्घसक्थाश्च पञ्चपादा महोदराः ||
१२८ ख
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
जटिला मलदिग्धाङ्गी कृशा दीना तपस्विनी ||
५८ ग
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
जटिलां तापसीं वृद्धां कुशकाशपरिक्षताम् ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
उमो उवाच
जटिलो व्रह्मचारी च किमर्थमसि नित्यदा ||
४८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२८
महेश्वर उवाच
जटिलो व्रह्मचारी च लोकानां हितकाम्यया |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
जटी चर्मी शिखण्डी च सर्वाङ्गः सर्वभावनः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६२
भीष्म उवाच
जटी चीराजिनधरः स्वाध्याय़परमः शुचिः ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
जटी द्विजिह्वस्ताम्रास्यो मृगराजतनुच्छदः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
जठरं ते इमे लोकाः पुरुषोऽसि सनातनः ||
४७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६४
भीष्म उवाच
जठरं ते त्रय़ो लोकाः पुरुषोऽसि सनातनः ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
जठराः कुक्कुशाश्चैव सुदाशार्णाश्च भारत |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
जठरे चाशुभे वासं शोणितोदकभाजने |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७८
युधिष्ठिर उवाच
जठरे देवदेवस्य किं चाकार्षीन्महाद्युतिः ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९३
भीष्म उवाच
जडान्धवधिराकारा ये युक्ता द्रुपदे मय़ा ||
५८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
जत्रुदेशे च सुभृशं वत्सदन्तैरताडय़त् |
१२६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
जत्रुदेशे नरव्याघ्रः प्रहसन्वभ्रुवाहनः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
१८
वासुदेव उवाच
जत्रुदेशे भृशं वीरो व्यवासीदद्रथे तदा ||
२१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
जत्रुदेशे समासाद्य विकर्णं समताडय़त् |
३२ ख
आदि पर्व
अध्याय
३३
सूत उवाच
जनं दशन्तु वै सर्वमेवं त्रासो भविष्यति ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
जनं परिजनं चापि युगान्ते पर्युपस्थिते ||
८२ ख