वन पर्व
अध्याय
१२८
लोमश उवाच
ततः स लोकमगमत्सोमकस्य गुरुः परम् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
११४
वैशम्पाय़न उवाच
ततः स वज्रसङ्घातः कुमारोऽभ्यपतद्गिरौ |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
९९
लोमश उवाच
ततः स वज्री वलिभिर्दैवतैरभिरक्षितः |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
४४
सूत उवाच
ततः स ववृधे गर्भो महातेजा रविप्रभः |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
ततः स वस्त्राणि तथैव गाश्च; फलानि पुष्पाणि तथैव निष्कान् |
८ क
वन पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
ततः स वार्युपस्पृश्य कोपसंरक्तलोचनः |
३२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
ततः स वाल्यात्पितरं विव्याध हृदि पत्रिणा |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय
४९
सूत उवाच
ततः स वासुकेर्घोरमपनीय़ मनोज्वरम् |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
ततः स वितथो नाम भुमन्योरभवत्सुतः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६५
भीष्म उवाच
ततः स विदितो राज्ञः प्रविश्य गृहमुत्तमम् |
१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
ततः स विदुरं धीमान्वाक्यमाह युधिष्ठिरः |
६ क
वन पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
ततः स विद्धः साम्वेन क्षेमवृद्धिश्चमूपतिः |
१६ क
विराट पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
ततः स विद्धो भरतर्षभेण; वाणेन गात्रावरणातिगेन |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
ततः स विद्धोऽस्त्रविदा मर्मभिद्भिरजिह्मगैः |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
ततः स विपुलं चर्म शतचन्द्रं च भानुमत् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४४
भीष्म उवाच
ततः स विप्रः कृतधर्मनिश्चय़ः; कृताभ्यनुज्ञः स्वजनेन धर्मवित् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४५
भीष्म उवाच
ततः स विप्रस्तां नागीं समाधाय़ पुनः पुनः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
२५
सूत उवाच
ततः स विप्रो निष्क्रान्तो निषादीसहितस्तदा |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
ततः स विरुजो राजन्पूतात्मा वीतकल्मषः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४
व्यास उवाच
ततः स विस्मितो भ्रातुर्दर्शय़ामास तौ करौ ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
ततः स विस्मितो राजा गाधिः शापभय़ेन च |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
७०
वृहदश्व उवाच
ततः स विस्मय़ाविष्टो राजानमिदमव्रवीत् |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
ततः स विस्मय़ाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जय़ः |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८१
भीष्म उवाच
ततः स विह्वलो वाक्यं राम उत्थाय़ माव्रवीत् |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय
१६६
गन्धर्व उवाच
ततः स वुवुधे पश्चात्तमृषिं नृपसत्तमः |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
ततः स व्याय़तं कृत्वा वेषं विपरिवर्त्य च |
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
श्रीभगवानु उवाच
ततः स व्रह्मणः पुत्र आद्यो ऋषिवरस्त्रितः |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
भीष्म उवाच
ततः स व्राह्मणः स्वप्ने कुण्डधारस्य तेजसा |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
२६
सूत उवाच
ततः स शतसाहस्रं योजनान्तरमागतः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
ततः स शरजालेन महताभ्यवकीर्य तौ |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
ततः स शरभो वन्यो मुनेः शरभमग्रतः |
३५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७६
वैशम्पाय़न उवाच
ततः स शरवर्षाणि प्रत्यमित्रान्प्रति प्रभुः |
२७ क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
ततः स शरवर्षेण पर्जन्य इव वृष्टिमान् |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
ततः स शुशुभे राजन्कण्ठासक्तमहाधनुः |
९२ क
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
ततः स शेषमादाय़ कलत्रस्य महामतिः |
६५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
ततः स सञ्जय़ं राजा पर्यपृच्छत पाण्डवम् ||
४६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सञ्जय़ उवाच
ततः स सर्वसेनाय़ां जनः कृष्णधनञ्जय़ौ |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
ततः स सात्यकिर्धीमान्महात्मा वृष्णिपुङ्गवः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
ततः स सिंहतां नीतो नागेन्द्रो मुनिना तदा |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६४
भीष्म उवाच
ततः स हरिणो गत्वा पदान्यष्टौ न्यवर्तत |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१६२
वैशम्पाय़न उवाच
ततः स हरिभिर्युक्तं जाम्वूनदपरिष्कृतम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
ततः स हारिद्रमुपैति वर्णं; संहारविक्षेपशते व्यतीते ||
४० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०५
द्रोण उवाच
ततः स हेमचित्रं तं स्यन्दनप्रवरं गदी |
३४ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
ततः संनादय़ञ्शक्रो दिवं भूमिं च सर्वशः |
१ क
वन पर्व
अध्याय
२३०
वैशम्पाय़न उवाच
ततः संन्यपतन्सर्वे गन्धर्वाः कौरवैः सह |
१९ क
सभा पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
ततः संमन्त्र्य कृष्णेन कृतस्वस्त्ययनो वली |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
ततः संमन्त्र्य सचिवैर्वृषदुःशासनादिभिः |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९१
भीष्म उवाच
ततः संमन्त्रय़ामास मित्रैः सह महीपतिः |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
१५५
व्राह्मण उवाच
ततः संवत्सरस्यान्ते द्रुपदं स द्विजोत्तमः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
२८९
वैशम्पाय़न उवाच
ततः संवत्सरे पूर्णे यदासौ जपतां वरः |
१२ क