उद्योग पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
द्रौपद्याश्च परिक्लेशं संस्मरन्पुरुषो भव ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
द्रौपद्याश्च परिक्लेशस्त्वन्मूलो ह्यभवत्पुरा ||
६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
द्रौपद्याश्च प्रिय़े नित्यं स्थातव्यमरिकर्शन ||
१४ ख
विराट पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
द्रौपद्याश्च सुता वीराः शिखण्डी चापराजितः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
द्रौपद्यास्तं परिक्लेशं न क्षंस्येते त्वमर्षिणौ ||
५ ख
विराट पर्व
अध्याय
४५
अश्वत्थामो उवाच
द्रौपद्यास्तं परिक्लेशं न क्षन्तुं पाण्डवोऽर्हति |
१४ क
वन पर्व
अध्याय
२५६
भीमसेन उवाच
द्रौपद्यास्तदनर्हाय़ाः परिक्लेष्टा नराधमः ||
७ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
द्रौपद्यास्तनय़ा राजन्युष्माकममितौजसः ||
११ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
द्रौपद्यास्तनय़ाः पञ्च माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९२
वसिष्ठ उवाच
द्वन्द्वमेति च निर्द्वन्द्वस्तासु तास्विह योनिषु |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०२
याज्ञवल्क्य उवाच
द्वन्द्वमेषां त्रय़ाणां तु संनिपातं च तत्त्वतः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
द्वन्द्वशश्चाव्रुवन्सर्वे पश्यध्वं तपसो वलम् |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
द्वन्द्वानां विप्रय़ोगं च विज्ञाय़ कृपणं नृप |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९
युधिष्ठिर उवाच
द्वन्द्वानि च विरुद्धानि तानि सर्वाण्यचिन्तय़न् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४४
व्यास उवाच
द्वन्द्वानि मोक्षजिज्ञासुरर्थधर्मावनुष्ठितः |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
द्वन्द्वानि यानि तत्रासन्संसक्तानि पुरोदय़ात् |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
द्वन्द्वान्यासन्महाराज प्रेक्षणीय़ानि संय़ुगे |
४७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
नारद उवाच
द्वन्द्वारामेषु भूतेषु गच्छन्त्येकैकशो नराः |
४३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
द्वन्द्वारामेषु भूतेषु य एको रमते मुनिः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
कपिल उवाच
द्वन्द्वारामेषु सर्वेषु य एको रमते मुनिः |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय
७२
सञ्जय़ उवाच
द्वन्द्वीभूतेषु सैन्येषु युध्यमानेष्वभीतवत् ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७८
भीष्म उवाच
द्वन्द्वे राम यथेष्टं ते सज्जो भव महामुने ||
३१ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२३३
भीष्म उवाच
द्वन्द्वैर्यत्र न वाध्यन्ते मानसेन च कर्मणा |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३७
श्रीभगवानु उवाच
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ञै; र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
द्वन्द्वैस्तैस्तैरुपहतः सर्वतः परिशङ्कितः |
१५१ क
आदि पर्व
अध्याय
१२६
कर्ण उवाच
द्वन्द्वय़ुद्धं च पार्थेन कर्तुमिच्छामि भारत ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
द्वन्द्वय़ुद्धसमाचारे कुशलः सर्वधर्मवित् ||
३० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
द्वन्द्वय़ुद्धे पराजिष्णुस्तोषय़ामास शङ्करम् ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
द्वाःस्थं प्राह महाप्राज्ञो धृतराष्ट्रो महीपतिः |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
द्वाःस्थो निवेदय़ामास सूतपुत्रमुपस्थितम् ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
द्वात्रिंशत्त्वमनीकानि सर्वाण्येवाभिचोदय़ ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
द्वात्रिंशद्रूपधारिण्यो मधुराः समलङ्कृताः ||
७५ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
द्वादशं पर्व निर्दिष्टमेतत्प्राज्ञजनप्रिय़म् |
१९९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४५
सनत्सुजात उवाच
द्वादशपूगां सरितं देवरक्षितम् |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
द्वादशस्त्रासनश्चाद्यो यज्ञो यज्ञसमाहितः |
९१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
द्वादशस्त्वपरस्तत्र वुद्धिर्नाम गुणः स्मृतः |
१०३ क
वन पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
द्वादशात्मारविन्दाक्षः पिता माता पितामहः |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
द्वादशादित्यसदृशो युगान्ताग्निरिवापरः ||
३४ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
द्वादशादित्यसहितं ददर्श कुरुनन्दनः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
२५५
वैशम्पाय़न उवाच
द्वादशानां तु सर्वेषां सौवीराणां धनञ्जय़ः |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
द्वादशानां हि भवतामादित्यानां महात्मनाम् |
४१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
द्वादशाहं निराहारः कल्मषाद्विप्रमुच्यते ||
४४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
द्वादशाहं निराहारो नरमेधफलं लभेत् ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय
१३४
अष्टावक्र उवाच
द्वादशाहः प्राकृतो यज्ञ उक्तो; द्वादशादित्यान्कथय़न्तीह विप्राः ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
द्वादशाहैश्च सत्रैर्ये यजन्ते विविधैर्नृप |
३७ क
वन पर्व
अध्याय
२८४
वैशम्पाय़न उवाच
द्वादशे समतिक्रान्ते वर्षे प्राप्ते त्रय़ोदशे |
५ क
विराट पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
द्वादशेन तु भल्लेन चकर्तास्य ध्वजं तथा ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
द्वादशेमाः समास्माभिर्वस्तव्यं निर्जने वने |
२ क
विराट पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
द्वादशेमानि वर्षाणि राष्ट्राद्विप्रोषिता वय़म् |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
द्वादशेमानि वर्षाणि वने निर्व्युषितानि नः |
४१ क