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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८३
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यापतत एवाशु गदां हेमपरिष्कृताम् |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय १६३
सञ्जय़ उवाच
तस्यापतत एवाशु भल्लेनामित्रकर्शनः |
२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १४
धृतराष्ट्र उवाच
तस्यापराधाद्दुर्वुद्धेरभिमानान्महीक्षिताम् |
५ क
वन पर्व
अध्याय २४९
कोटिकाश्य उवाच
तस्यापरे भ्रातरोऽदीनसत्त्वा; वलाहकानीकविदारणाध्याः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
तस्यापरोक्षं विज्ञानं षडङ्गेषु तथैव च |
५ क
वन पर्व
अध्याय २०८
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्यापवसुता भार्या प्रजास्तस्यापि मे शृणु ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यापि क्रिय़तां युक्त्या सपर्येति पुनः पुनः ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५१
सञ्जय़ उवाच
तस्यापि गोमाय़ुवडाभिगुप्तो; वभूव केतुर्ज्वलनार्कतुल्यः |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
तस्यापि च महावाहो नित्यं पश्यति संय़ुगे |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६७
यम उवाच
तस्यापि च यमः सर्वमुपदेशं चकार ह |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६९
सञ्जय़ उवाच
तस्यापि तव सोदर्यो निहन्ता पापकृत्तमः |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५१
सञ्जय़ उवाच
तस्यापि तुरगाः शीघ्रा हस्तिकाय़ाः खरस्वनाः |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय १२१
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यापि द्रुपदो नाम तदा समभवत्सुतः ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय १५४
व्राह्मण उवाच
तस्यापि द्रुपदो नाम तदा समभवत्सुतः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्यापि द्विशती सन्ध्या सन्ध्यांशश्च ततः परम् ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
तस्यापि निरृतिर्भार्या नैरृता येन राक्षसाः |
५३ क
वन पर्व
अध्याय २०३
व्याध उवाच
तस्यापि पाय़ुपर्यन्तस्तथा स्याद्गुदसञ्ज्ञितः |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५१
सञ्जय़ उवाच
तस्यापि रथनिर्घोषो महामेघरवोपमः |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४१
भीष्म उवाच
तस्यापि विस्तरेणोक्तं कर्मात्रेः सुमहात्मनः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७२
व्रह्मो उवाच
तस्यापि शततुल्या गौर्भवतीति विनिश्चय़ः ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२१
सञ्जय़ उवाच
तस्यापि शतधा मूर्धा फलिष्यति न संशय़ः ||
२२ ग
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
तस्यापि शरवर्षाणि चर्मणा प्रतिवार्य सः |
५८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५१
सञ्जय़ उवाच
तस्यापि सुमहच्चापं दृढज्यं वलवत्तरम् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८०
पराशर उवाच
तस्यापि सुमहांस्तापः प्रस्थितस्योपजाय़ते ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
तस्यापि सुमहान्धर्मो यः पापाद्विनिवर्तते ||
४६ ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
तस्यापि स्वगृहे वसतस्त्रय़ः शिष्या वभूवुः ||
८३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७२
व्रह्मो उवाच
तस्यापीहाक्षय़ाँल्लोकान्ध्रुवान्विद्धि शचीपते ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
तस्याप्यकथय़त्पूर्वं नारदः सुमहातपाः ||
६० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५१
सञ्जय़ उवाच
तस्याप्यक्षसमा वाणा रुक्मपुङ्खाः शिलाशिताः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५१
सञ्जय़ उवाच
तस्याप्यतुलनिर्घोषो वहुतोरणचित्रितः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
भीष्म उवाच
तस्याप्यधम उद्देशः शरीरस्योरुजाघनी ||
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७
युधिष्ठिर उवाच
तस्याप्युदरमेवैकं किमिदं त्वं प्रशंससि ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
तस्याप्येवम्प्रभावस्य सदश्वस्येव धावतः |
१२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
तस्याप्योघवती कन्या पुत्रश्चौघरथोऽभवत् ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय १२६
लोमश उवाच
तस्याप्रतिहतं चक्रं प्रावर्तत महात्मनः |
३३ क
विराट पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
तस्याभवत्तदा रूपं संवृतस्य शरोत्तमैः |
३२ क
वन पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
तस्याभावाय़ भवति क्रोधः परमदारुणः ||
२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३५०
नाग उवाच
तस्याभिगमनप्राप्तौ हस्तो दत्तो विवस्वता |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय १६
कृष्ण उवाच
तस्याभिजनसंय़ुक्तैर्गुणैर्भरतसत्तम |
१५ क
वन पर्व
अध्याय २७१
मार्कण्डेय़ उवाच
तस्याभिद्रवतस्तूर्णं क्षुराभ्यामुच्छ्रितौ करौ |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
तस्याभिद्रवतो वाहान्हस्तमुक्तेन वारिणा |
४३ क
वन पर्व
अध्याय २३४
वैशम्पाय़न उवाच
तस्याभिपततस्तूर्णं गदाहस्तस्य संय़ुगे |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
तस्याभिपततस्तूर्णं भारद्वाजः प्रतापवान् |
६२ क
आदि पर्व
अध्याय १४१
वैशम्पाय़न उवाच
तस्याभिपततस्तूर्णं भीमो भीमपराक्रमः |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
तस्याभिमतः पुत्र आस्ते सोमश्रवा नाम ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
तस्याभिमन्युराय़म्य स्मय़न्नेकेन पत्रिणा |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
तस्याभिमन्युर्दशभिर्वाणैः सूतं हय़ान्ध्वजम् |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय २१८
वैशम्पाय़न उवाच
तस्याभिवर्षतो वारि पाण्डवः प्रत्यवारय़त् |
१ क
आदि पर्व
अध्याय २००
वैशम्पाय़न उवाच
तस्याभिवाद्य चरणौ देवर्षेर्धर्मचारिणी |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
तस्याभ्यशोभय़त्केतुर्वाराहो राजतो महान् ||
३ ख