शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
स्मितपूर्वाभिभाषिण्यो रूपेणाप्सरसां समाः ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८५
वृहस्पतिरु उवाच
स्मितपूर्वाभिभाषी च तस्य लोकः प्रसीदति ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
स्मिताभिभाषिणं दान्तं गुरुवाक्यकरं सदा |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
स्मितेनाभाष्य कौन्तेय़ं वानरो नरमव्रवीत् |
७४ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१९
गान्धार्यु उवाच
स्मितोपपन्नं सुनसं सुभ्रु ताराधिपोपमम् |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
स्मृतः स्मृतश्च ते विप्र सदा दास्यामि दर्शनम् ||
१९५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३८
वाय़ुरु उवाच
स्मृतमाकाशमण्डं तु तस्माज्जातः पितामहः ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
स्मृता वर्णाश्च चत्वारः पञ्चमो नाधिगम्यते |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
स्मृतास्तिस्रस्तु वाहिन्यः पृतनेति विचक्षणैः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०१
भीष्म उवाच
स्मृतास्त्वङ्गिरसो देवा व्राह्मणा इति निश्चय़ः |
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
स्मृतिभ्रंशाद्वुद्धिनाशो वुद्धिनाशात्प्रणश्यति ||
६३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
स्मृतिमन्तस्तदा धीरा न लीय़न्ते कदाचन ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
स्मृतिश्च संनिरुध्यते पुरा तवेह पुत्रक |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२४
भीष्म उवाच
स्मृतिस्त्वेनं न प्रजहौ तदा नाराय़णाज्ञय़ा ||
१६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२५२
युधिष्ठिर उवाच
स्मृतोऽपि शाश्वतो धर्मो विप्रहीणो न दृश्यते ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
१४४
वैशम्पाय़न उवाच
स्मृतोऽस्मि भवता शीघ्रं शुश्रूषुरहमागतः |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
स्मृतोऽहं दर्शय़िष्यामि कृत्येष्विति च सोऽव्रवीत् ||
७० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
जनमेजय़ उवाच
स्मृत्वा कालपरीमाणं प्रवृत्तिं ये समास्थिताः |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
स्मृत्वा कुन्त्या वचो राजंस्तत एनं व्यसर्जय़त् ||
९५ ग
आदि पर्व
अध्याय
३०
सूत उवाच
स्मृत्वा चैवोपधिकृतं मातुर्दास्यनिमित्ततः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११८
कीट उवाच
स्मृत्वा तदनुतप्येऽहं त्यक्त्वा प्रिय़मिवात्मजम् ||
२५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
स्मृत्वा दुर्योधनं शत्रुं कर्णदुःशासनावपि |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
कृष्ण उवाच
स्मृत्वा धर्मोपदेशं त्वं मुहूर्तं क्षम पाण्डव ||
६५ ख
सभा पर्व
अध्याय
२०
वैशम्पाय़न उवाच
स्मृत्वा पुरुषशार्दूल शार्दूलसमविक्रमम् ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
स्मृत्वा प्रतिज्ञां पार्थस्य दारुकं प्रत्यभाषत ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
स्मृत्वा मनः शल्यवधे यतात्मा; यथोक्तमिन्द्रावरजस्य चक्रे ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
स्मृत्वा स्मृत्वा हि ते पुत्रं नवं वैरं भविष्यति ||
६४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
स्मृत्वा स्मृत्वैव च गुणान्धात्रा यत्नाद्विनिर्मितम् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
७७
वृहदश्व उवाच
स्मय़ंस्तु रोषताम्राक्षस्तमुवाच ततो नृपः |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
स्मय़न्नभ्यहनद्द्रौणिः पाण्ड्यमाचार्यसत्तमः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
स्मय़न्निव गुडाकेशं प्रेक्षमाणः सहस्रदृक् |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
स्मय़न्निव ततः कर्णो दिव्यमस्त्रमुदीरय़त् |
६९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
सञ्जय़ उवाच
स्मय़न्निव महावाहुः सूतपुत्रमिदं वचः ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
२४०
वैशम्पाय़न उवाच
स्मय़न्निवाञ्जलिं कृत्वा पार्थिवं हेतुमद्वचः ||
३५ ख
सभा पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
स्मय़न्निवेदं वचनं वभाषे; पाञ्चालराजस्य सुतां तदानीम् ||
२३ ख
सभा पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
स्मय़न्निवैक्षत्पाञ्चालीमैश्वर्यमदमोहितः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
स्मय़न्नेव तु तान्वीरान्द्रोणः प्रत्यग्रहीत्स्वय़म् |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८२
अर्जुन उवाच
स्मय़न्प्रोवाच कौन्तेय़स्तदा चित्राङ्गदासुतम् ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
स्मय़मान इव क्रोधात्साक्षात्कालान्तकोपमः |
४० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
स्मय़मानश्च गाङ्गेय़स्तान्वाणाञ्जगृहे तदा ||
९९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५०
नारद उवाच
स्मय़मानश्च लोकेशो लोकान्सर्वानवैक्षत ||
१३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
स्मय़मानश्च शनकैरश्वत्थामा महारथः |
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
स्मय़मानस्तु गोविन्दः फल्गुनं प्रत्यभाषत |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
स्मय़मानस्तु राजानं भीष्मद्रोणौ च माधवः |
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३१
युधिष्ठिर उवाच
स्मय़मानाः समाय़ान्तु पाञ्चालाः कुरुभिः सह ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
स्मय़मानो महातेजाः सृक्किणी संलिहन्मुहुः ||
२ ख
विराट पर्व
अध्याय
६५
वैशम्पाय़न उवाच
स्मय़मानोऽर्जुनो राजन्निदं वचनमव्रवीत् ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
स्मय़मानोऽव्रवीत्पार्थमेवमेतदिति व्रुवन् ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
२२४
वैशम्पाय़न उवाच
स्मय़ित्वा तु यदुश्रेष्ठो द्रौपदीं परिसान्त्व्य च |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
९४
वैशम्पाय़न उवाच
स्यन्दते किं न्विय़ं नाद्य सरिच्छ्रेष्ठा यथा पुरा ||
२२ ख