वन पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
सानुक्रोशा महात्मानो विजितेन्द्रिय़शत्रवः |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
सानुगा भीमवपुषश्चन्द्रं तारागणा इव ||
६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
सानुगो नृपतिर्विद्वान्निय़तः संय़तेन्द्रिय़ः ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
सानुज्ञाताव्रवीद्भूय़ो योऽस्मिंस्तीर्थे समाहितः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०
वासुदेव उवाच
सानुनीता वहुविधं पर्वतेन महात्मना |
४१ क
आदि पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
सानुवन्धा विनङ्क्ष्यन्ति पौत्राश्चैवेति नः श्रुतम् ||
९ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
सानुवन्धाः सहामात्या भीष्मेण युधि पातिताः ||
५९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६८
सञ्जय़ उवाच
सानुवन्धान्हनिष्यामि क्षुद्रान्राज्यहरानहम् ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
सानुवन्धान्हनिष्यामि ये मां योत्स्यन्ति संय़ुगे |
४३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
सानुवन्धान्हनिष्यामि ये मां योत्स्यन्ति संय़ुगे ||
३३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
सान्तःपुरपरीवारः सभृत्यः सपुरोहितः |
६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३६
जनमेजय़ उवाच
सान्तःपुरा महात्मान इति तद्व्रूहि मेऽनघ ||
५ ख
मौसल पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
सान्तःपुरास्तदा तीर्थय़ात्रामैच्छन्नरर्षभाः ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
सान्तरं तु प्रतिज्ञाते राज्ञो द्रोणेन निग्रहे |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
सान्तरं हि प्रतिज्ञातं द्रोणेनामित्रकर्शन |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
सान्तराय़ुधिका मत्ता द्विपास्तीक्ष्णविषोपमाः ||
४० ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
सान्त्वं वदन्ति क्रुद्धापि ते नराः स्वर्गगामिनः ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
सान्त्वदः सर्वभूतानां सर्वशोकैर्विमुच्यते |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
सान्त्वनं रक्षणं दानमवस्था चाप्यभीक्ष्णशः |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय
९९
वैशम्पाय़न उवाच
सान्त्वपूर्वं मुनिश्रेष्ठः कामार्तो मधुरं वहु ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
सान्त्वपूर्वं स्मितं कृत्वा पाणिना परिसंस्पृशन् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
सान्त्वपूर्वमिदं वाक्यं मार्जारं मूषकोऽव्रवीत् ||
४७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
सान्त्वपूर्वमिदं वाक्यमव्रवीत्कपिकेतनः ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
२३३
वैशम्पाय़न उवाच
सान्त्वपूर्वमिदं वाक्यमुवाच खचरान्रणे ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
२३७
दुर्योधन उवाच
सान्त्वपूर्वमय़ाचन्त शक्ताः सन्तो महारथाः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
सान्त्वभेदप्रदानानां युद्धमुत्तरमुच्यते ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
४४
सूत उवाच
सान्त्वमानार्थदानैश्च पूजय़ा चानुरूपय़ा |
१५ क
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
सान्त्वमानार्थसम्भोगैर्युनक्ति मनुजाधिप ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८५
वृहस्पतिरु उवाच
सान्त्वमेकपदं शक्र पुरुषः सम्यगाचरन् |
३ क
वन पर्व
अध्याय
२९४
वैशम्पाय़न उवाच
सान्त्वितश्च यथाशक्ति पूजितश्च यथाविधि |
८ क
वन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
सान्त्विता धर्मराजेन प्रसेदुः क्षणदाचराः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
सान्त्वितास्ते न वुध्यन्ते रागलोभवशं गताः ||
१३१ ख
वन पर्व
अध्याय
७७
वृहदश्व उवाच
सान्त्वितो नैषधेनैवं पुष्करः प्रत्युवाच तम् |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
सान्त्वे प्रतिहते युद्धं प्रसिद्धमपराक्रमम् ||
६९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
सान्त्वे प्रय़ुक्ते नृपते कृतवैरे न विश्वसेत् |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३३
भीष्म उवाच
सान्त्वेन भोगदानेन नमस्कारैस्तथार्चय़ेत् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९७
भीष्म उवाच
सान्त्वेन भोगदानेन स राज्ञां परमो नय़ः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८६
पराशर उवाच
सान्त्वेनानुप्रदानेन प्रिय़वादेन चाप्युत |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
सान्त्वेनानुप्रदानेन भेदेन च नराधिप |
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
सान्त्वेनोपप्रदानेन शिष्टांश्च परिपालय़ेत् ||
२० ख
सभा पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
सान्त्व्यमानो वीज्यमानः पार्थेनाक्लिष्टकर्मणा |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१३७
लोमश उवाच
सान्त्वय़ञ्श्लक्ष्णय़ा वाचा पर्यपृच्छद्युधिष्ठिर ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
सान्त्वय़ञ्श्लक्ष्णय़ा वाचा मेघदुन्दुभिनिस्वनः ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय
६९
वृहदश्व उवाच
सान्त्वय़ञ्श्लक्ष्णय़ा वाचा वाहुकं प्रत्यभाषत ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
सान्त्वय़ञ्श्लक्ष्णय़ा वाचा सर्वलोकनमस्कृतः ||
४२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
सान्त्वय़ञ्श्लक्ष्णय़ा वाचा हेतुय़ुक्तमिदं वचः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
सान्त्वय़न्नव्रवीद्धीमानर्जुनं यमजौ तथा ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७२
भीष्म उवाच
सान्त्वय़न्परिरक्षंश्च स्वर्गमाप्स्यसि दुर्जय़म् ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
सान्त्वय़न्मामिदं वाक्यमुवाच वदतां वरः ||
१२९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
सान्त्वय़न्सुमहातेजाः शुभं वचनमर्थवत् ||
१४ ख