आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
द्यूतादीननय़ान्घोरान्प्रवृद्धांश्चाप्युपैक्षत ||
९३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२३
कुन्त्यु उवाच
द्यूतापहृतराज्यानां पतितानां सुखादपि |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
द्यूतार्थे यच्च युष्मासु प्रावर्तत सुय़ोधनः |
६० ख
सभा पर्व
अध्याय
५२
युधिष्ठिर उवाच
द्यूते क्षत्तः कलहो विद्यते नः; को वै द्यूतं रोचय़ेद्वुध्यमानः |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
द्यूते च वञ्चितो राजा यत्त्वय़ा सौवलेन च ||
२९ ख
सभा पर्व
अध्याय
६०
दुर्योधन उवाच
द्यूते जिता चासि कृतासि दासी; दासीषु कामश्च यथोपजोषम् ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
२७७
युधिष्ठिर उवाच
द्यूते दुरात्मभिः क्लिष्टाः कृष्णय़ा तारिता वय़म् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
द्यूते पाने तथा स्त्रीषु मृगय़ाय़ां च यो नरः |
२६ क
सभा पर्व
अध्याय
५१
दुर्योधन उवाच
द्यूते पुराणैर्व्यवहारः प्रणीत; स्तत्रात्ययो नास्ति न सम्प्रहारः |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
द्यूते यद्विजितो राजा शकुनेर्वुद्धिनिश्चय़ात् ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
द्यूते व्रूय़ां महावाहो समासाद्याम्विकासुतम् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
६२
वृहदश्व उवाच
द्यूते स निर्जितश्चैव वनमेकोऽभ्युपेय़िवान् ||
२८ ख
विराट पर्व
अध्याय
६३
कङ्क उवाच
द्यूते हारितवान्सर्वं तस्माद्द्यूतं न रोचय़े |
३५ क
सभा पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
द्यूतेन तदलं पुत्र द्यूते भेदो हि दृश्यते |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
द्यूतेन पाण्डुपुत्रस्य तदनुज्ञातुमर्हसि ||
४० ख
सभा पर्व
अध्याय
५१
दुर्योधन उवाच
द्यूतेन पाण्डुपुत्रेभ्यस्तत्तुभ्यं तात रोचताम् ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६१
सञ्जय़ उवाच
द्यूतेन राज्यहरणमरण्ये वसतिश्च या |
१३ क
सभा पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
द्यूतेऽद्वितीय़ः शकुनिर्नरेषु; कुन्तीसुतस्तेन निसृष्टकामः |
४२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
द्योततो भास्करस्येव घनान्ते परिवेशिनः ||
११५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९०
सञ्जय़ उवाच
द्योतय़न्ती दिशो राजन्महोल्केव दिवश्च्युता |
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
द्योतय़न्तो दिशः सर्वाः सम्पेतुः स्वर्णभूषणाः ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
द्योतय़न्तो दिशः सर्वास्तच्च सैन्यं समन्ततः ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
द्योतय़न्तो दिशः सर्वास्तपसा दग्धकिल्विषाः ||
४२ ख
आदि पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
द्यौ राजन्मानुषे लोके चिरं वत्स्यति भारत ||
४२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
द्यौः पतेच्च सनक्षत्रा न मे मोघं वचो भवेत् ||
४८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
द्यौः सचन्द्रार्कनक्षत्रा खं दिशो भूर्महोदधिः |
१३४ क
वन पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
द्यौः स्वित्पतति किं भूमौ दीर्यन्ते पर्वता नु किम् |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
द्यौरासीत्कर्णतो व्यग्रा सनक्षत्रा विशां पते |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३६
सञ्जय़ उवाच
द्यौरिवादित्यचन्द्राद्यैर्ग्रहैः कीर्णा युगक्षय़े ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
द्यौरिवापेतनक्षत्रा हीनं खमिव वाय़ुना ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२९
सञ्जय़ उवाच
द्यौरिवासीत्सनक्षत्रा रजन्यां भरतर्षभ ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
द्यौरिवोदितचन्द्रार्का ग्रहाकीर्णा युगक्षय़े ||
११८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
द्यौर्यथा पूर्णचन्द्रेण नक्षत्रगणमालिनी ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
अर्जुन उवाच
द्यौर्विय़त्पृथिवी चेय़ं दिशश्च सदिगीश्वराः ||
३५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
द्यौर्विय़द्भूर्दिशश्चाशु प्रणुन्ना निशितैः शरैः |
७६ क
वन पर्व
अध्याय
२३
वासुदेव उवाच
द्यौश्च भूमिश्च खं चैवादृश्यमाने तथा मय़ि ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
द्यौस्तदा तां तु दृष्ट्वैव गां गजेन्द्रेन्द्रविक्रम |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
द्यौस्तदा मानुषे लोके दीर्घकालं स्वकर्मणा ||
३७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४१
वैशम्पाय़न उवाच
द्रक्षत्यद्रिप्रतीकाशं सिंहेनेव महाद्विपम् ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
द्रक्ष्यतस्त्वां रणे वीरौ सहितौ केशवार्जुनौ ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५६
सौदास उवाच
द्रक्ष्यते तां भवानद्य कस्मिंश्चिद्वननिर्झरे |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
द्रक्ष्यन्ति विक्रमं पार्थाः कालस्येव युगक्षय़े ||
५५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
सञ्जय़ उवाच
द्रक्ष्यन्ति समरे योधाः शलभानामिवाय़तीः ||
५६ ख
वन पर्व
अध्याय
२६३
मार्कण्डेय़ उवाच
द्रक्ष्यन्त्यार्यस्य धन्या ये कुशलाजशमीलवैः |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
द्रक्ष्यसि त्वं फलं तीव्रमचिरेण सुय़ोधन ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२०
भीष्म उवाच
द्रक्ष्यसे त्वं च लोकेऽस्मिन्मत्प्रसादान्महामुने ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११
शल्य उवाच
द्रक्ष्यसे देवराजानमिन्द्रं शीघ्रमिहागतम् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
द्रक्ष्यसे धनदोद्यानं रक्षितं यक्षराक्षसैः ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
द्रक्ष्यस्यद्येत्यवोचद्वै शल्यं कर्णो नरेश्वर ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६६
भीष्म उवाच
द्रक्ष्यामि त्वां विनिर्मुक्तमस्माद्युद्धात्सुदुर्मते ||
९ ख