उद्योग पर्व
अध्याय
१४४
कर्ण उवाच
न तु तेऽय़ं समारम्भो मय़ि मोघो भविष्यति |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६२
कपिल उवाच
न तु त्यागसुखं प्राप्ता एतत्त्वमपि पश्यसि ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८५
विदुर उवाच
न तु त्वं धर्ममुद्दिश्य तस्य वा प्रिय़कारणात् |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
११५
पाण्डुरु उवाच
न तु त्वां प्रसहे वक्तुमिष्टानिष्टविवक्षय़ा ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
युधिष्ठिर उवाच
न तु त्वामनृतं कर्तुमुत्सहे स्वार्थगौरवात् |
४३ क
वन पर्व
अध्याय
२८५
सूर्य उवाच
न तु त्वामर्जुनः शक्तः कुण्डलाभ्यां समन्वितम् |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
भीष्म उवाच
न तु त्वय़ा कृतं पार्थ नापि दुर्योधनेन वै |
७५ क
आदि पर्व
अध्याय
१४८
व्राह्मण उवाच
न तु दुःखमिदं शक्यं मानुषेण व्यपोहितुम् ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५६
सञ्जय़ उवाच
न तु दुर्योधने दोषमिममासक्तुमर्हसि |
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
न तु दुर्योधने दोषमिममासक्तुमर्हसि ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२९०
सूर्य उवाच
न तु देवं समाहूय़ न्याय़्यं प्रेषय़ितुं वृथा ||
१२ ख
विराट पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
न तु द्विजोऽय़ं भविता नरोत्तमः; पतिः पृथिव्या इति मे मनोगतम् |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
१८८
धृष्टद्युम्न उवाच
न तु धर्मस्य सूक्ष्मत्वाद्गतिं विद्मः कथञ्चन |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५२
धृतराष्ट्र उवाच
न तु नः शिक्षमाणानामुपेक्षेत युधिष्ठिरः |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११९
व्यास उवाच
न तु नाशोऽस्ति पापस्य यत्त्वय़ोपचितं पुरा |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
न तु निःसंशय़ं न स्यात्त्वय़ि कर्मण्यवस्थिते ||
४१ ख
विराट पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
न तु नीतिः सुनीतस्य शक्यतेऽन्वेषितुं परैः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
२९४
वैशम्पाय़न उवाच
न तु न्याय़्यं मय़ा दातुं तव शक्र वृथा वरम् ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
न तु पर्याय़धर्मेण सिद्धिं प्राप्नोति भूय़सीम् |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
न तु पश्यति पश्यंस्तु यश्चैनमनुपश्यति ||
७० ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१५३
भीष्म उवाच
न तु पश्यामि योद्धारमात्मनः सदृशं भुवि |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
न तु पादतले लिप्ते कस्मात्ते पुत्रकाद्य वै |
३९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६०
भीष्म उवाच
न तु पापकृतां राज्ञां प्रतिगृह्णन्ति साधवः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
मुनिरु उवाच
न तु प्रमादः कर्तव्यः कथञ्चिद्भूतिमिच्छता ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
न तु प्रसक्तं भवति वृक्षच्छाय़ेव हैमनी ||
६२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
न तु भीमो दृढक्रोधस्तद्वचो जगृहे तदा |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
न तु भीष्मः सुसङ्क्रुद्धः शक्यो जेतुं महाहवे ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
न तु भीष्मो महातेजाः शक्यो जेतुं महावलः |
८ क
वन पर्व
अध्याय
१३१
श्येन उवाच
न तु भोजनमुत्सृज्य शक्यं वर्तय़ितुं चिरम् ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
न तु मन्ये विघाताय़ ज्ञानं दुःखस्य सञ्जय़ |
५३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७७
भगवानु उवाच
न तु मन्ये स तद्वाच्यो यद्युधिष्ठिरशासनम् |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
९
देवदूत उवाच
न तु मर्त्यस्य धर्मात्मन्नाय़ुरस्ति गताय़ुषः ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५३
भीष्म उवाच
न तु मां विवृतो युद्धे जातु युध्येत पाण्डवः ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
श्रीभगवानु उवाच
न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
३३
वासुकिरु उवाच
न तु मात्राभिशप्तानां मोक्षो विद्येत पन्नगाः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
१७७
सर्प उवाच
न तु मामजहात्प्रज्ञा यावदद्येति पाण्डव |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
न तु मामन्यथा साधो त्वं विज्ञातुमिहार्हसि |
१७८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३१
श्रीभगवानु उवाच
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ||
२४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७
संवर्त उवाच
न तु मे वर्तते वुद्धिर्धने याज्येषु वा पुनः |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८६
युधिष्ठिर उवाच
न तु मे शुध्यते भावः श्वेताश्वं प्रति मारिष ||
३९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
न तु मे स्यात्सुतो व्रह्मन्नेष मे दीय़तां वरः ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१८
शक्र उवाच
न तु मेऽतिक्रमः स्याद्वै सदा लक्ष्मि तवान्तिके ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८०
पराशर उवाच
न तु यः सत्क्रिय़ां प्राप्य राजसं कर्म सेवते ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९५
वैशम्पाय़न उवाच
न तु युक्तं रणे हन्तुं दिव्यैरस्त्रैः पृथग्जनम् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
भीष्म उवाच
न तु योगमृते शक्या प्राप्तुं सा परमा गतिः |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
न तु राज्ञाभिपन्नस्य शेषं क्वचन विद्यते ||
५० ख
आदि पर्व
अध्याय
१८८
व्यास उवाच
न तु वक्ष्यामि सर्वेषां पाञ्चाल शृणु मे स्वय़म् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९७
भीष्म उवाच
न तु वन्ध्यं धनं तिष्ठेत्पिवेय़ुर्व्राह्मणाः पय़ः |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४
द्रुपद उवाच
न तु वाच्यो मृदु वचो धार्तराष्ट्रः कथञ्चन |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
न तु विक्रमकालोऽय़ं क्षमाकालोऽय़मागतः |
३९ क