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अनुशासन पर्व
अध्याय ७
भीष्म उवाच
कृत्वा द्वादशवर्षाणि वीरस्थानाद्विशिष्यते ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय १२४
वैशम्पाय़न उवाच
कृत्वा धनुषि ते मार्गान्रथचर्यासु चासकृत् |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४०
विदुर उवाच
कृत्वा धृतिमय़ीं नावं जन्मदुर्गाणि सन्तर ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
कृत्वा नसुकरं कर्म गता वैवस्वतक्षय़म् ||
३३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
कृत्वा नसुकरं कर्म गता वैवस्वतक्षय़म् ||
७२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
कृत्वा नसुकरं कर्म गतो वैवस्वतक्षय़म् ||
८० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
कृत्वा नसुकरं कर्म गतो वैवस्वतक्षय़म् ||
८४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
कृत्वा नसुकरं कर्म गतौ वैवस्वतक्षय़म् ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
कृत्वा नसुकरं कर्म गतौ स्वर्गमितोऽनघ ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
कृत्वा नसुकरं कर्म दानवेष्विव वासवः ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४३
देवशर्मो उवाच
कृत्वा नाचक्षतः कर्म मम यच्च त्वय़ा कृतम् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय २२९
वैशम्पाय़न उवाच
कृत्वा निवेशमभितः सरसस्तस्य कौरवः |
१५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
कृत्वा नृशंसं दुर्वुद्धिर्द्रौणिः किं फलमश्नुते ||
१६ ख
सभा पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
कृत्वा परस्परेणैवं संविदं कृष्णपाण्डवौ |
५९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४८
वृहस्पतिरु उवाच
कृत्वा पापं पूर्वमवुद्धिपूर्वं; पुण्यानि यः कुरुते वुद्धिपूर्वम् |
३० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११३
वृहस्पतिरु उवाच
कृत्वा पापानि कर्माणि अधर्मवशमागतः |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
कृत्वा पुरुषकारं तु यथाशक्ति महावलाः |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८१
वैशम्पाय़न उवाच
कृत्वा पौर्वाह्णिकं कृत्यं स्नातः शुचिरलङ्कृतः |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
कृत्वा प्रतिज्ञां नाहत्वा निवर्तिष्यामि केशवम् |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
कृत्वा प्रदक्षिणं यत्नादुपस्थाय़ च भास्करम् |
९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२५
दुर्योधन उवाच
कृत्वा प्रमुखतः शूरं भीष्मं मम पितामहम् ||
१० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
कृत्वा प्रवर्ग्यं धर्मज्ञा यथावद्द्विजसत्तमाः |
२० क
आदि पर्व
अध्याय २०२
नारद उवाच
कृत्वा प्रास्थानिकं रात्रौ मघासु यय़तुस्तदा ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३७
वैशम्पाय़न उवाच
कृत्वा भारतमाख्यानं तपःश्रान्तस्य धीमतः |
१० क
मौसल पर्व
अध्याय ९
व्यास उवाच
कृत्वा भारावतरणं पृथिव्याः पृथुलोचनः |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
कृत्वा भारावतरणं वसुधाय़ा यथेप्सितम् |
९२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
कृत्वा मनसि तं भीमो मिथ्या व्याहृतवांस्तदा ||
७३ ख
आदि पर्व
अध्याय २०६
उलूप्यु उवाच
कृत्वा मम परित्राणं तव धर्मो न लुप्यते ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३१
कुन्त्यु उवाच
कृत्वा मानुष्यकं कर्म सृत्वाजिं यावदुत्तमम् |
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११५
सञ्जय़ उवाच
कृत्वा मुखं भारत योधमुख्यं; दुःशासनं त्वत्सुतमाजमीढ ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
कृत्वा मूत्रपुरीषे तु रथ्यामाक्रम्य वा पुनः |
६३ क
वन पर्व
अध्याय ५६
वृहदश्व उवाच
कृत्वा मूत्रमुपस्पृश्य सन्ध्यामास्ते स्म नैषधः |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
कृत्वा मूलप्रतीकारान्गुल्मैः स्थावरजङ्गमैः |
५६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४१
भीष्म उवाच
कृत्वा यज्ञं यथाकाममाजगाम स्वमाश्रमम् ||
२८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
कृत्वा यत्नं परं श्रान्तः स न्यवर्तत भारत ||
२३ ग
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
कृत्वा यो व्राह्मणच्छद्म भिक्षार्थी समुपागतः |
१२ ख
वन पर्व
अध्याय २७४
मार्कण्डेय़ उवाच
कृत्वा रामस्य रूपाणि लक्ष्मणस्य च भारत |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
कृत्वा लोकान्गमिष्यामि स्वानहं व्रह्मसत्कृतान् ||
९३ ख
आदि पर्व
अध्याय २८
सूत उवाच
कृत्वा लोकान्निरालोकांस्तेन देवानवाकिरत् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
कृत्वा वलवता सन्धिमात्मानं यो न रक्षति |
१०३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
कृत्वा वहून्यकार्याणि पाण्डवेषु नृशंसवत् |
१७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४६
व्रह्मो उवाच
कृत्वा वह्निं चरेद्भैक्ष्यं विधूमे भुक्तवज्जने ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय ११३
विभाण्डक उवाच
कृत्वा विघ्नं तापसानां रमन्ते; पापाचारास्तपसस्तान्यपाप ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
कृत्वा विधनुषौ वीरौ शरवर्षैरवाकिरत् ||
३१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
कृत्वा विमर्दं भृशमर्जुनेन; कर्णं हतं केसरिणेव नागम् |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
कृत्वा विवाहं तु कुरुप्रवीरा; स्तदाभिमन्योर्मुदितस्वपक्षाः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३४
शुक उवाच
कृत्वा वुद्धिं विय़ुक्तात्मा त्यक्ष्याम्यात्मानमव्यथः ||
४ ख
विराट पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
कृत्वा वेषं च सैरन्ध्र्याः कृष्णा व्यचरदार्तवत् ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
कृत्वा व्याय़ामपूर्वाणि कृत्यानि प्रतिकर्म च ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०४
सञ्जय़ उवाच
कृत्वा व्यूहं महाराज सर्वशत्रुनिवर्हणम् |
४ क