शल्य पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
निरन्तरमिवाकाशं सम्वभूव जनाधिप ||
४० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
निरन्तरमिवाकाशमासीन्नुन्नैः किरीटिना ||
९६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
निरन्तरविशेषास्ते वहुमानावमानय़ोः ||
६५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
निरपेक्षः शरीरे च प्राणतश्च वलाधिकः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
भीष्म उवाच
निरपेक्षः शुको भूत्वा निःस्नेहो मुक्तवन्धनः |
६३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१००
सञ्जय़ उवाच
निरपेक्षा व्यधावन्त तेन तेन स्म भारत ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२६
सूत उवाच
निरभ्रमपि चाकाशं प्रजगर्ज महास्वनम् |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
निरभ्रे विद्युतस्तीव्रा दिशश्च रजसावृताः |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
कुन्त्यु उवाच
निरमर्षं निरुत्साहं निर्वीर्यमरिनन्दनम् |
२८ क
शल्य पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
निरर्गलान्सजारूथ्यान्सर्वान्विविधदक्षिणान् |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
निरर्गलान्सर्वमेधान्पुत्रवत्पालय़न्प्रजाः ||
६१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४४
कर्ण उवाच
निरर्जुनाः सकर्णा वा सार्जुना वा हते मय़ि ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
निरर्थं कलहं प्राज्ञो वर्जय़ेन्मूढसेवितम् |
२८ क
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
निरर्थकं महद्वैरं कुर्यादन्यः सुय़ोधनात् ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
गृध्र उवाच
निरर्थको ह्ययं स्नेहो निरर्थश्च परिग्रहः ||
५६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४६
भीष्म उवाच
निरर्थाः सर्व एवैषामाशावन्धास्त्वदाश्रय़ाः ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
निरविद्यत धर्मात्मा जीवितेन परन्तपः ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
निरविद्यत धर्मात्मा जीवितेन वृकोदरः ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२८
भीष्म उवाच
निरविध्यत्प्रतोदेन नासिकाय़ां पुनः पुनः ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
निरश्वपुरुषा चासीद्रथकुञ्जरवर्जिता ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३७
अर्जुन उवाच
निरसिष्यन्ति वा राष्ट्राद्धतोत्साहं महावलाः ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
निरस्तजिह्वादशनान्त्रलोचनै; र्धरा वभौ घोरविरूपदर्शना ||
४५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
निरस्तजिह्वादशनेक्षणाः क्षितौ; क्षय़ं गताः प्रमथितवर्मभूषणाः ||
७४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
निरस्तजिह्वान्मातङ्गाञ्शय़ानान्पर्वतोपमान् ||
४४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
निरस्तजिह्वानय़नान्निष्कीर्णान्त्रय़कृद्घनान् |
३८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३४
सञ्जय़ उवाच
निरस्य भीमसेनं तु ततः प्राप्स्यसि फल्गुनम् ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
निरस्य विदुरं द्रोणं भीष्मं शारद्वतं कृपम् |
९४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
निरस्य शेषमेतेषां न प्रदेय़ं तु कस्यचित् ||
९१ ख
वन पर्व
अध्याय
८
शकुनिरु उवाच
निरस्य समय़ं भूय़ः पणोऽस्माकं भविष्यति ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
निरस्यन्निव देहेभ्यस्तनय़ानामसूंस्तव |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
हंस उवाच
निराकरोति मित्राणि यो वै सोऽधमपूरुषः ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
यय़ातिरु उवाच
निराकरोतु वेदांश्च यस्ते हरति पुष्करम् ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८८
भीष्म उवाच
निराकृतास्मि भीष्मेण भ्रंशिता पतिधर्मतः ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
अष्टावक्र उवाच
निराक्रामन्गृहात्तस्मात्सा वृद्धाथ व्यतिष्ठत ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६२
कपिल उवाच
निरागममनैतिह्यं प्रत्यक्षं लोकसाक्षिकम् ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
भीष्म उवाच
निराद्ये मर्त्यलोकेऽस्मिन्नात्मानं ते परीप्सवः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६२
कपिल उवाच
निरापद्धर्म आचारस्त्वप्रमादोऽपराभवः |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
निरामर्षेष्वचेष्टेषु प्रेक्षमाणेषु पाण्डुषु |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
निरामिषा न शोचन्ति त्यजेहामिषमात्मनः |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७
युधिष्ठिर उवाच
निरामिषा न शोचन्ति शोचसि त्वं किमामिषम् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७
युधिष्ठिर उवाच
निरामिषो विनिर्मुक्तः प्रशान्तः सुसुखी भव ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
निरामय़ः सुवेश्माढ्यो निवेशो मागधः शुभः ||
१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
निरामय़ा वीतशोका नित्यं मुदितमानसाः |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
निरारम्भा ह्यपि वय़ं पुण्यशीलेषु साधुषु |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७६
नारद उवाच
निरारम्भोऽप्ययमिह यथालव्धोपजीवनः |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय
१४१
वैशम्पाय़न उवाच
निरावाधास्त्वय़ि हते मय़ा राक्षसपांसन |
१२ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
निराशः सर्वकल्याणैः शोचन्पर्यपतन्महीम् ||
१० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
उत्तङ्क उवाच
निराशश्चाभवत्तात कुण्डलाहरणे पुनः ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
भीष्म उवाच
निराशा जीविते तस्य मार्गमारुह्य धिष्ठिताः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८९
धृतराष्ट्र उवाच
निराशा विजय़े सर्वे मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ||
३६ ख