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कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
विपताकं विय़न्तारं विवर्मध्वजजीवितम् |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६७
सञ्जय़ उवाच
विपताकध्वजच्छत्रैः पार्थिवाः शीर्णकूवरैः ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
विपताकाध्वजच्छत्रा व्यश्वसूताय़ुधा रणे |
५० क
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
विपताकाध्वजांश्चान्याञ्छिन्नेषाय़ुगवन्धुरान् ||
१११ ख
सभा पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
विपत्तिष्वव्यथो दक्षो नित्यमुत्थानवान्नरः |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
विपत्राय़ुधदेहासून्कृत्वा शत्रून्सहस्रशः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
विपद्यन्ते समारम्भाः सिध्यन्त्यपि च दैवतः |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८६
भीष्म उवाच
विपन्नकृत्या राजेन्द्र देवता ऋषय़स्तथा |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
विपन्नसर्वाय़ुधजीवितान्रणे; चकार वीरो यमराष्ट्रवर्धनान् ||
८९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
विपन्नसस्येव मही रुधिरेण समुक्षिता |
५५ क
द्रोण पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
विपन्नसस्येव मही वाक्चैवासंस्कृता यथा |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८९
भीष्म उवाच
विपन्ना धारणास्तात नय़न्ति नशुभां गतिम् |
५५ क
स्त्री पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
विपन्नास्तेऽद्य वसुधां विवृतामधिशेरते ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५६
भीष्म उवाच
विपन्ने च समारम्भे सन्तापं मा स्म वै कृथाः |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३१
कुन्त्यु उवाच
विपरिच्छिन्नमूलोऽपि न विषीदेत्कथञ्चन |
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०४
वृहस्पतिरु उवाच
विपरीतं तु वोद्धव्यमरिलक्षणमेव तत् ||
४९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
विपरीतं द्विषत्स्वेतत्षड्विधा वृद्धिरात्मनः ||
११ ग
आदि पर्व
अध्याय १८१
वैशम्पाय़न उवाच
विपरीतं मतं जातं व्यासस्यापि महात्मनः |
३९ क
आदि पर्व
अध्याय १४८
व्राह्मण उवाच
विपरीतं मय़ा चेदं त्रय़ं सर्वमुपार्जितम् |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२८
व्यास उवाच
विपरीतमतो यत्तु तदव्यक्तमुदाहृतम् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय २१०
गुरुरु उवाच
विपरीतमतो विद्यात्क्षेत्रज्ञस्य च लक्षणम् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९७
धृतराष्ट्र उवाच
विपरीतमहं मन्ये मन्दभाग्यान्सुतान्प्रति |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७२
धृतराष्ट्र उवाच
विपरीतमिदं सर्वं प्रतिभाति स्म सञ्जय़ |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
विपरीतमेतदुभय़ं क्षत्रिय़स्य; वाङ्नावनीती हृदय़ं तीक्ष्णधारम् ||
१३२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
विपरीतश्च मे शत्रुर्निरस्यश्च भवेन्नरः ||
४ ग
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
विपरीतश्च लोकोऽय़ं भविष्यत्यधरोत्तरः |
६४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७६
वैशम्पाय़न उवाच
विपरीतस्तदा राजंस्तस्मिन्नुत्पातलक्षणे ||
१८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ११
धृतराष्ट्र उवाच
विपरीतस्तु तेऽदेय़ः पुत्र कस्याञ्चिदापदि |
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
महेश्वर उवाच
विपरीतस्तु धर्मात्मा रूपवानभिजाय़ते ||
५० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
विपरीता त्विय़ं वृत्तिरसकृल्लक्ष्यते त्वय़ि |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय ८२
वैशम्पाय़न उवाच
विपरीता दिशः सर्वा न प्राज्ञाय़त किञ्चन ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
विपरीतांस्तु तान्वुद्ध्वा त्वय़ि वासमरोचय़म् ||
२६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ११
धृतराष्ट्र उवाच
विपरीतान्न गृह्णीय़ात्स्वय़ं सन्धिविशारदः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
विपरीतास्तदा नार्यो वञ्चय़ित्वा रहः पतीन् |
५५ क
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
विपरीते तदा लोके पूर्वरूपं क्षय़स्य तत् ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय १७८
सर्प उवाच
विपरीतैश्च राजेन्द्र कारणैर्मानुषो भवेत् |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
विपरीतो महावीर्यो गतसत्त्वोऽल्पजीवितः |
३९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
विपर्ययं न कुर्वीत वाससो वुद्धिमान्नरः |
७८ क
वन पर्व
अध्याय २००
मार्कण्डेय़ उवाच
विपर्ययकृतोऽधर्मः पश्य धर्मस्य सूक्ष्मताम् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
विपर्यये तस्य हि पार्थ देवा; न्गच्छन्ति साङ्ख्याः सततं सुखेन |
१०६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०
राजो उवाच
विपर्ययेण मे मन्युस्तेन सन्तप्यते मनः |
५३ क
वन पर्व
अध्याय १९२
वैशम्पाय़न उवाच
विपर्यस्तं यथा नाम कुवलाश्वस्य धीमतः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
विपर्यासं यथा मेरोर्वासवस्येव निर्जय़म् ||
७३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
नारद उवाच
विपश्चिद्गुणसम्पन्नः प्राप्नोत्येव महद्यशः ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय १९५
मार्कण्डेय़ उवाच
विपांसुलां महीं कुर्वन्ववर्ष च सुरेश्वरः ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
उमो उवाच
विपाकं कर्मणां देव वक्तुमर्हस्यनिन्दित ||
४२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
महेश्वर उवाच
विपाकज्ञाश्च ये देवि ते नराः स्वर्गगामिनः ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
विपाकमभिजानन्ति ते शिष्टाः शिष्टसंमताः ||
८१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
विपाकान्ते दहत्येनं किम्पाकमिव भक्षितम् ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
विपाटिता विचित्राश्च रूपचित्राः कुथास्तथा |
४६ क