chevron_left  व्यथय़ेय़ुर्हिarrow_drop_down
उद्योग पर्व
अध्याय १५०
जनमेजय़ उवाच
व्यथय़ेय़ुर्हि देवानां सेनामपि समागमे |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
व्यदहत्पाण्डवीं सेनां नराश्वगजसङ्कुलाम् ||
३२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
व्यदारय़त सङ्ग्रामे मघवानिव दानवम् ||
६१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
व्यदारय़न्महाप्राज्ञः शरैः संनतपर्वभिः ||
६२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८०
सञ्जय़ उवाच
व्यदीपय़ंस्ते पृतनां युगान्तादित्यसंनिभाः ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८४
गङ्गो उवाच
व्यदीपय़त्तेजसा च त्रैलोक्यं सचराचरम् ||
७१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
व्यदीर्यत दिशः सर्वा वातनुन्ना घना इव ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय ६९
वृहदश्व उवाच
व्यदीर्यत मनो दुःखात्प्रदध्यौ च महामनाः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
व्यदीर्यत महाराज नौरिवासाद्य पर्वतम् ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय ५८
वृहदश्व उवाच
व्यदीर्यतेव हृदय़ं न चैनं किञ्चिदव्रवीत् ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
व्यदृश्यत तदा शल्यो युधिष्ठिरसमीपतः |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
व्यदृश्यत महच्चापं समरे युध्यतः परैः ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
व्यदृश्यत महावाहुर्मैनाक इव पर्वतः |
५९ क
शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
व्यदृश्यत मही कीर्णा शतशोऽथ सहस्रशः ||
५२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५६
वासुदेव उवाच
व्यदृश्यतापतन्ती सा शक्रमुक्ता यथाशनिः ||
९ ख
मौसल पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
व्यदृश्यतासकृत्पुम्भिः कवन्धैः परिवारितः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
व्यदृश्यन्त भय़त्रस्ता जीविताकाङ्क्षिणः सदा ||
३२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५३
सञ्जय़ उवाच
व्यदृश्यन्त महामात्रा ग्रहा इव नभस्तले ||
३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४४
सञ्जय़ उवाच
व्यदृश्यन्त महाराज परस्परजिघांसवः ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
व्यदृश्यन्त महाराज सम्भग्ना रथकूवराः ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
व्यदृश्यन्ताद्रय़ः काले गैरिकाम्वुस्रवा इव ||
३६ ख
शल्य पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
व्यदृश्येतां तदा राजन्कङ्कपत्रिभिराहवे |
५६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
व्यद्रवत्तावकं सैन्यं लोड्यमानं समन्ततः |
७० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४५
वासुदेव उवाच
व्यद्रवन्गिरय़श्चापि द्यौः पफाल च सर्वशः ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
व्यद्रवन्त दिशः सर्वा भय़ोद्विग्नाः समन्ततः |
५९ ख
शल्य पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
व्यद्रवन्त दिशो राजन्हाहाकारस्तदाभवत् ||
४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
व्यद्रवन्त भय़ाद्भीता येन दौर्योधनं वलम् ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय २२१
मार्कण्डेय़ उवाच
व्यद्रवन्त रणे भीता विशीर्णाय़ुधकेतनाः ||
५६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १००
सञ्जय़ उवाच
व्यद्रवन्त रणे राजन्भय़े जाते महारथाः ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
व्यद्रवन्त रणे वीरा द्राव्यमाणा मदोत्कटैः ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४९
सञ्जय़ उवाच
व्यद्रावय़च्छरव्रातैः पाण्डवानामनीकिनीम् ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
व्यद्रावय़त्तव चमूं वज्रहस्त इवासुरीम् ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३५
सञ्जय़ उवाच
व्यद्रावय़दमेय़ात्मा शतशोऽथ सहस्रशः ||
४७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३४
सञ्जय़ उवाच
व्यद्रावय़द्भीमसेनो यथेन्द्रो दानवीं चमूम् ||
४२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
व्यद्रावय़द्रणे द्रोणस्तत्र तत्र पराक्रमी ||
५७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९६
सञ्जय़ उवाच
व्यद्रावय़द्रणे रक्षो दर्शय़द्वै पराक्रमम् ||
३२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०५
सञ्जय़ उवाच
व्यद्रावय़ेतां सहसा सैन्यं मम महावलौ ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८२
भीष्म उवाच
व्यधमं तुमुले युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा सुदुस्त्यजान् ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय १६७
अर्जुन उवाच
व्यधमं साय़कैराशु शतशोऽथ सहस्रशः ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
व्यधमच्च शरैर्माय़ां घटोत्कचविनिर्मिताम् ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
व्यधमच्च शरैर्माय़ां घटोत्कचविनिर्मिताम् ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७०
सञ्जय़ उवाच
व्यधमच्चापि तान्यस्य धृष्टद्युम्नो महारथः ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३४
सञ्जय़ उवाच
व्यधमच्छरवर्षेण स्मय़न्निव धनञ्जय़ः ||
४५ ख
आदि पर्व
अध्याय २१९
वैशम्पाय़न उवाच
व्यधमच्छरसम्पातैः प्राणिनः खाण्डवालय़ान् ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १११
सञ्जय़ उवाच
व्यधमत्कवचं क्रुद्धः सूतपुत्रस्य पाण्डवः ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
व्यधमत्कालमेघं तं कर्णो वैकर्तनो वृषा ||
७१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४६
सञ्जय़ उवाच
व्यधमत्कौरवीं सेनां शतशोऽथ सहस्रशः ||
४५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११०
सञ्जय़ उवाच
व्यधमत्तस्य तत्सैन्यं महाभ्राणि यथानिलः ||
३६ ख
विराट पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
व्यधमत्तां पुनस्तस्य भीष्मः शरशतैः शितैः ||
१६ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १३६
सञ्जय़ उवाच
व्यधमत्तान्यथा वाय़ुर्मेघानिव दुरत्ययः ||
१० ख