chevron_left  कुन्तिभोजसुताarrow_drop_down
आदि पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
कुन्तिभोजसुता मोहं विज्ञातार्था जगाम ह ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय १३८
वैशम्पाय़न उवाच
कुन्तिभोजसुतां कुन्तीं सर्वलक्षणपूजिताम् ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
कुन्तिभोजसुतांश्चाजौ दशभिर्दश जघ्निवान् ||
१२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४३
सञ्जय़ उवाच
कुन्तिभोजस्ततस्तूर्णं शरव्रातैरवाकिरत् ||
७१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४३
कुन्त्यु उवाच
कुन्तिभोजस्य भवने पार्थस्त्वमसि पुत्रक ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
कुन्तिभोजात्मजापुत्रं को वुभूषेत नार्जुनम् ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
कुन्तिभोजो महातेजाः सुह्मश्च सुमहावलः ||
१२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
कुन्ती गान्धारीं वद्धनेत्रां व्रजन्तीं; स्कन्धासक्तं हस्तमथोद्वहन्ती |
९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
कुन्ती च द्रौपदी चैव सात्वती चैव भामिनी |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
कुन्ती च परमप्रीता वभूव जनमेजय़ ||
२१ ख
सभा पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
कुन्ती च भृशसन्तप्ता द्रौपदीं प्रेक्ष्य गच्छतीम् |
३ क
आदि पर्व
अध्याय १८६
वैशम्पाय़न उवाच
कुन्ती तु कृष्णां परिगृह्य साध्वी; मन्तःपुरं द्रुपदस्याविवेष |
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६९
वैशम्पाय़न उवाच
कुन्ती द्रुपदपुत्री च सुभद्रा चोत्तरा तथा |
६ क
आदि पर्व
अध्याय १८४
वैशम्पाय़न उवाच
कुन्ती पुरस्तात्तु वभूव तेषां; कृष्णा तिरश्चैव वभूव पत्तः ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
कुन्ती माद्री च जज्ञाते मतिस्तु सुवलात्मजा ||
९८ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
कुन्ती राजसुता यत्र वसत्यसुखिनी वने ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय ११४
वैशम्पाय़न उवाच
कुन्ती व्याघ्रभय़ोद्विग्ना सहसोत्पतिता किल |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६
वैशम्पाय़न उवाच
कुन्ती शोकपरीताङ्गी दुःखोपहतचेतना |
३ क
आदि पर्व
अध्याय ११६
वैशम्पाय़न उवाच
कुन्ती शोकपरीताङ्गी विललाप सुदुःखिता ||
१७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
कुन्तीं च राजशार्दूल तदा भरतसत्तमाः ||
६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
कुन्तीं ददर्श धर्मात्मा सततं धर्मचारिणीम् ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
कुन्तीं पितृष्वसारं च सम्प्रहृष्टो जनार्दन ||
८२ ग
आदि पर्व
अध्याय १८२
वैशम्पाय़न उवाच
कुन्तीं समाश्वास्य कुरुप्रवीरो; धनञ्जय़ं वाक्यमिदं वभाषे ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
कुन्तीपुत्रं प्रतिय़ोत्स्यामि युद्धे; ज्याकर्षिणामुत्तममद्य लोके ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११५
सञ्जय़ उवाच
कुन्तीपुत्रं युधां श्रेष्ठं सुहृदां प्रीतिवर्धनम् ||
४४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
कुन्तीपुत्रमिदं वाक्यमासीनः स्थितमव्रवीत् ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
कुन्तीपुत्रस्तु तं मन्त्रं स्मरन्नेव धनञ्जय़ः |
१ क
आदि पर्व
अध्याय १९३
दुर्योधन उवाच
कुन्तीपुत्रान्भेदय़ामो माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय ११५
वैशम्पाय़न उवाच
कुन्तीपुत्रेषु जातेषु धृतराष्ट्रात्मजेषु च |
१ क
आदि पर्व
अध्याय ११५
वैशम्पाय़न उवाच
कुन्तीमथ पुनः पाण्डुर्माद्र्यर्थे समचोदय़त् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय १७७
वैशम्पाय़न उवाच
कुन्तीमातः कथमिमामापदं त्वमवाप्तवान् |
२ क
आदि पर्व
अध्याय २१४
वासुदेव उवाच
कुन्तीमातर्ममाप्येतद्रोचते यद्वय़ं जले |
१६ क
वन पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
कुन्तीमातर्महावाहो त्वमीशानः पुरातनः |
३६ क
सभा पर्व
अध्याय २३
भगदत्त उवाच
कुन्तीमातर्यथा मे त्वं तथा राजा युधिष्ठिरः |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
कुन्तीमाश्वासय़ामास प्रोक्ष्याद्भिश्चन्दनोक्षितैः ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय १९१
वैशम्पाय़न उवाच
कुन्तीमासाद्य ता नार्यो द्रुपदस्य महात्मनः |
२ क
विराट पर्व
अध्याय ४
युधिष्ठिर उवाच
कुन्तीमृते मातरं नो विदुरं च महामतिम् ||
४५ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
कुन्तीसमीपे पुरुषोत्तमौ तु; यमाविमौ विष्णुमहेन्द्रकल्पौ |
८ क
वन पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
कुन्तीसुतमिह प्राप्तं पश्यन्तु त्रिदशालय़ाः ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय २१०
वैशम्पाय़न उवाच
कुन्तीसुतस्य पूजार्थमपि निष्कुटकेष्वपि ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय १७८
वैशम्पाय़न उवाच
कुन्तीसुतो जिष्णुरिय़ेष कर्तुं; सज्यं धनुस्तत्सशरं स वीरः ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३९
कर्ण उवाच
कुन्त्या त्वहमपाकीर्णो यथा न कुशलं तथा ||
४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
कुन्त्या द्रुपदपुत्र्याश्च सुभद्राय़ास्तथैव च |
२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २५
वैशम्पाय़न उवाच
कुन्त्या सह महाराज समानव्रतचारिणी ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १
युधिष्ठिर उवाच
कुन्त्या हि सदृशौ पादौ कर्णस्येति मतिर्मम ||
४१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
कुन्त्या हीनाः सुदुःखार्ता वत्सा इव विनाकृताः ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३९
कर्ण उवाच
कुन्त्याः प्रथमजं पुत्रं न स राज्यं ग्रहीष्यति ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय १२५
वैशम्पाय़न उवाच
कुन्त्याः प्रस्नवसंमिश्रैरस्रैः क्लिन्नमुरोऽभवत् ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४२
सञ्जय़ उवाच
कुन्त्याः स्मृत्वा वचो राजन्सत्यसन्धो महारथः ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
कुन्त्याश्च प्रत्यभिज्ञाय़ दिव्यलक्षणसूचितम् |
२२ क