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अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
वर्णाश्रमा यथा सर्वे स्वधर्मज्ञानवर्जिताः |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६२
भीष्म उवाच
वर्णास्ताननुवर्तन्ते त्रय़ो भरतसत्तम ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
वर्णे तृतीय़े जातस्तु वैश्याय़ां व्राह्मणादपि |
१४ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
वर्णे वर्णे समाधत्त एकैकं गुणवत्तरम् ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८०
पराशर उवाच
वर्णेभ्योऽपि परिभ्रष्टः स वै संमानमर्हति |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
वर्णैश्चोच्चावचैर्दिव्यैः सदश्वानां प्रभद्रकाः ||
६१ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २८५
जनक उवाच
वर्णो विशेषवर्णानां महर्षे केन जाय़ते |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८०
पराशर उवाच
वर्णोत्कर्षमवाप्नोति नरः पुण्येन कर्मणा |
५ क
विराट पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
वर्णोपपन्नास्ता नार्यो रूपवत्यः स्वलङ्कृताः |
३० क
वन पर्व
अध्याय ५३
नल उवाच
वर्ण्यमानेषु च मय़ा भवत्सु रुचिरानना |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४९
भीष्म उवाच
वर्णय़ोश्च द्वय़ोः स्यातां यौ राजन्यस्य भारत ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
वर्तता क्षत्रधर्मेण ह्येवं धर्मविदो विदुः ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३४
वैशम्पाय़न उवाच
वर्ततां ते महाय़ज्ञो यथा सङ्कल्पितस्त्वय़ा |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय २१२
भीष्म उवाच
वर्तते किमधिष्ठाना प्रसक्ता दुःखसन्ततिः ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३९
व्रह्मो उवाच
वर्तते तद्यथान्यूनं व्यतिरिक्तं च सर्वशः ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय ५१
ऋत्विज ऊचुः
वर्तते तव राजेन्द्र कर्मैतद्विधिवत्प्रभो |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२७
व्यास उवाच
वर्तते तेषु गृहवानक्रुध्यन्ननसूय़कः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१२
भीष्म उवाच
वर्तते पृथगन्योन्यमप्यपाश्रित्य कर्मसु ||
६ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७
व्यास उवाच
वर्तते याजने चैव तेन कर्माणि कारय़ ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
वर्तते सर्वभूतेषु सौक्ष्म्यात्तु न विभाव्यते ||
१२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१२
भीष्म उवाच
वर्तते सात्त्विको भाव इत्यपेक्षेत तत्तथा ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८७
भीष्म उवाच
वर्तते सात्त्विको भाव इत्यवेक्षेत तत्तदा ||
३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५३
सञ्जय़ उवाच
वर्तते स्म तदा युद्धं तत्र तत्र विशां पते ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय १८८
युधिष्ठिर उवाच
वर्तते हि मनो मेऽत्र नैषोऽधर्मः कथञ्चन ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
गृध्र उवाच
वर्तध्वं च यथाकालं दैवतेषु द्विजेषु च ||
३५ ख
वन पर्व
अध्याय ३१
द्रौपद्यु उवाच
वर्तन्ते पाकय़ज्ञाश्च यज्ञकर्म च नित्यदा ||
१४ ख
विराट पर्व
अध्याय १८
द्रौपद्यु उवाच
वर्तन्ते मय़ि कौन्तेय़ वक्ष्यामि शृणु तान्यपि ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १११
भीष्म उवाच
वर्तन्ते संय़तात्मानो दुर्गाण्यतितरन्ति ते ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय २०२
व्याध उवाच
वर्तन्ते सर्वभूतेषु येषु लोकाः प्रतिष्ठिताः |
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
वर्तन्ते सर्वलोकेषु येषु लोकाः प्रतिष्ठिताः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय ७८
वैशम्पाय़न उवाच
वर्तमानं तपस्युग्रे वाय़ुभक्षं मनीषिणम् ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
वर्तमानं हि धर्मे स्वे सर्वधर्मविदां वरम् |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४७
वासुदेव उवाच
वर्तमानः पितुः शास्त्रे व्राह्मणानां तथैव च ||
१९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
वर्तमानः पितुः शास्त्रे सौभद्रेण निपातितः ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय ११७
वैशम्पाय़न उवाच
वर्तमानः सतां वृत्ते पुत्रलाभमवाप्य च |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय १०९
मृग उवाच
वर्तमानः सुखे दुःखं यथाहं प्रापितस्त्वय़ा |
३० क
वन पर्व
अध्याय १७८
सर्प उवाच
वर्तमानः सुखे सर्वो नावैतीति मतिर्मम ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०६
मुनिरु उवाच
वर्तमानः स्वशास्त्रे वै संय़तात्मा जितेन्द्रिय़ः |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४६
व्रह्मो उवाच
वर्तमानमुपेक्षेत कालाकाङ्क्षी समाहितः ||
४० ख
सभा पर्व
अध्याय ५
नारद उवाच
वर्तमानस्तथा कर्तुं तस्मिन्कर्मणि वर्तसे ||
८७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३७
शुक उवाच
वर्तमानस्तथैवात्र वानप्रस्थाश्रमे यथा |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १८
व्राह्मण उवाच
वर्तमानस्य धर्मेण पुरुषस्य यथा तथा |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
वर्तमानस्य महतः समासाद्य परस्परम् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय १९८
व्याध उवाच
वर्तमानस्य मे धर्मे स्वे मन्युं मा कृथा द्विज ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय २००
जनमेजय़ उवाच
वर्तमाना महाभागा नाभिद्यन्त परस्परम् ||
३ ख
विराट पर्व
अध्याय ४५
अश्वत्थामो उवाच
वर्तमाना यथाशास्त्रं प्राप्य चापि महीमिमाम् |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
वर्तमानानि दृश्यन्ते तान्येव सुसुखान्यपि ||
७८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
वर्तमाने तथा घोरे तस्मिन्युद्धे सुदारुणे |
७० क
कर्ण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
वर्तमाने तथा घोरे सङ्कुले सर्वतोदिशम् |
२७ क
शल्य पर्व
अध्याय ३५
वैशम्पाय़न उवाच
वर्तमाने तथा यज्ञे त्रितस्य सुमहात्मनः |
३६ क