अनुशासन पर्व
अध्याय
९३
भीष्म उवाच
अवेदोक्तव्रताश्चैव भुञ्जानाः कार्यकारिणः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१४
भीष्म उवाच
अवेदोक्तव्रतोपेता भुञ्जानाः कार्यकारिणः |
२ क
आदि पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
अवेष्क्य चोद्धृतां वीटां वीटावेद्धारमव्रुवन् ||
१८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
अवैक्षत कटाक्षेण निर्दहन्निव भारत ||
७९ ख
विराट पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
अवैक्षत च धर्मात्मा द्रौपदीं पार्श्वतः स्थिताम् |
४६ क
वन पर्व
अध्याय
१६४
अर्जुन उवाच
अवैक्षत च मे वक्त्रं स्थितस्याथ स सारथिः |
३६ क
सभा पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
अवैक्षत प्रातिकामीं सभाय़ा; मुवाच चैनं परमार्यमध्ये ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
अवैक्षत महातेजा भीष्मः परपुरञ्जय़ः ||
१० ख
विराट पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
अवैक्षत विवृत्ताभ्यां नेत्राभ्यां कुरुपुङ्गवः ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४१
भीष्म उवाच
अवैक्षत सहस्राक्षस्तदा दिव्येन चक्षुषा ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
अवैक्षदथ सावज्ञं लोचनैर्मधुपिङ्गलैः ||
७३ ग
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
अवैक्षन्त महाशैलं मेरुं शिखरिणां वरम् ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
अवैक्षन्ताचलैर्नेत्रैः परिवार्य रथर्षभौ ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
२८२
ऋषय़ ऊचुः
अवैधव्यकरैर्युक्ता तथा जीवति सत्यवान् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
२८०
मार्कण्डेय़ उवाच
अवैधव्याशिषस्ते तु सावित्र्यर्थं हिताः शुभाः |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११
शल्य उवाच
अवैधव्येन संय़ुक्तामेकपत्नीं पतिव्रताम् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
५८
दमय़न्त्यु उवाच
अवैमि चाहं नृपते न त्वं मां त्यक्तुमर्हसि |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
अवैमि त्वस्य लोकस्य धर्मं शक्र सनातनम् ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
२६६
मार्कण्डेय़ उवाच
अवैमि त्वां हनूमन्तमविन्ध्यवचनादहम् ||
६४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१३
भीष्म उवाच
अवैरकृत्सूपचारः समो निन्दाप्रशंसय़ोः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४३
अतिथिरु उवाच
अवैरकृद्भूतहिते निय़ुक्तो; गङ्गाह्रदाम्भोऽभिजनोपपन्नः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
अवैरा ये त्वनाय़ासा मैत्रचित्तपराः सदा |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
अवोचं चैतदस्त्रं वै ह्यमोघं भवतु क्षमे |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७०
भीष्म उवाच
अवोचं पार्थिवान्सर्वानहं तत्र समागतान् |
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
अवोचं यत्षण्ढतिलानहं वस्तथ्यमेव तत् |
३१ क
विराट पर्व
अध्याय
५५
अर्जुन उवाच
अवोचः परुषा वाचो धर्ममुत्सृज्य केवलम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय
६
विदुर उवाच
अवोचन्मां धृतराष्ट्रोऽनुगुप्त; मजातशत्रो परिगृह्याभिपूज्य |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
अवोचन्मां योत्स्यमानः किरीटी; मध्ये व्रूय़ा धार्तराष्ट्रं कुरूणाम् ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
अवोचस्त्वं पाण्डवार्थेऽप्रिय़ाणि; प्रधर्षय़न्मां मूढवत्पापकर्मन् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
२२५
वैशम्पाय़न उवाच
अवोधय़त्कर्णमुपेत्य सर्वं; स चाप्यहृष्टोऽभवदल्पचेताः ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७४
भीष्म उवाच
अव्जानां पित्तभेदश्च सर्वेषामिति नः श्रुतम् |
५३ क
आदि पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
अव्भक्षः शरदस्त्रिंशदासीन्निय़तवाङ्मनाः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
अव्भक्षणं त्वय़ा राजन्नय़ुक्तं कृतमद्य वै ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
१५६
वैशम्पाय़न उवाच
अव्भक्षा वाय़ुभक्षाश्च प्लवमाना विहाय़सा |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
१७९
वैशम्पाय़न उवाच
अव्भक्षा वाय़ुभक्षाश्च फलाहारा दृढव्रताः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३२
नारद उवाच
अव्भक्षा वाय़ुभक्षाश्च सुधाभक्षाश्च ये सदा |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७
युधिष्ठिर उवाच
अव्भक्षैर्वाय़ुभक्षैश्च तैरय़ं नरको जितः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
अव्भक्षैर्वाय़ुभक्षैश्च पत्राहारैस्तथैव च |
५९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
अव्भक्षैर्वाय़ुभक्षैश्च शैवालोत्तरभोजनैः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३५१
सूर्य उवाच
अव्भक्षो वाय़ुभक्षश्च आसीद्विप्रः समाहितः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७५
भीष्म उवाच
अव्यक्त इति विख्यातः शाश्वतोऽथाक्षरोऽव्ययः |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
अव्यक्तं कारणं सूक्ष्मं यत्तत्सदसदात्मकम् ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
वसिष्ठ उवाच
अव्यक्तं क्षेत्रमित्युक्तं तथा सत्त्वं तथेश्वरम् |
४० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४३
व्रह्मो उवाच
अव्यक्तं क्षेत्रमुद्दिष्टं गुणानां प्रभवाप्ययम् |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९८
याज्ञवल्क्य उवाच
अव्यक्तं च महांश्चैव तथाहङ्कार एव च |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६४
भीष्म उवाच
अव्यक्तं ते शरीरोत्थं व्यक्तं ते मनसि स्थितम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
वसिष्ठ उवाच
अव्यक्तं न तु तद्व्रह्म वुध्यते तात केवलम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
अव्यक्तं पुरुषे व्रह्मन्निष्क्रिय़े सम्प्रलीय़ते |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
अव्यक्तं प्रकृतिं त्वासां कलानां कश्चिदिच्छति |
११३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
अव्यक्तं प्रकृतिं प्राहुः पुरुषेति च निर्गुणम् |
३८ क