उद्योग पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
सञ्जय़ोऽय़ं महाराज मूर्च्छितः पतितो भुवि |
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
सटङ्कशिखरा घोराः समरे मूर्ध्नि ते मय़ा ||
७८ ख
सभा पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
सततं कम्पय़ामास यवनानेक एव यः |
२० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१७
सिद्ध उवाच
सततं कर्मलोभाद्वा प्राप्तं वेगविधारणम् ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३१
श्रीभगवानु उवाच
सततं कीर्तय़न्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
काक उवाच
सततं च तदश्रौषीर्वचनं द्रोणभीष्मय़ोः |
६२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
सततं च परिक्लेशान्सपुत्रेण त्वय़ा कृतान् ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
वासुदेव उवाच
सततं चानुरक्तो वो हितैषी च घटोत्कचः |
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२७
कर्ण उवाच
सततं चेष्टमानानां निकृत्या विक्रमेण च ||
१५ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
७
भीष्म उवाच
सततं चैकशाय़ी यः स लभेतेप्सितां गतिम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
सततं धर्मशीलैश्च नैपुण्येनोपलक्षितः ||
५२ ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
सततं धावमानश्च चिन्तय़ानो विशां पते |
१११ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
सततं नाम राजेन्द्र यत्र संनिहितो हरिः ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
सततं निग्रहे युक्त इन्द्रिय़ाणां भवेन्नृपः |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय
१२९
वैशम्पाय़न उवाच
सततं निरय़ं प्राप्ताः परपिण्डोपजीविनः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
वसिष्ठ उवाच
सततं पञ्चविंशं च चतुर्विंशं च वुध्यते |
८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
सततं पाण्डवद्वेषी धार्तराष्ट्रहिते रतः ||
६१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५७
अश्व उवाच
सततं पूजितो विप्र शुचिना भृगुनन्दन |
४३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३४
पृथिव्यु उवाच
सततं पूजय़ेथास्त्वं ततः श्रेय़ोऽभिपत्स्यसे ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय
१२७
लोमश उवाच
सततं पृष्ठतः कृत्वा कामभोगान्विशां पते ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
सततं प्रिय़कामाश्च कर्णस्यैते वशे स्थिताः |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५७
वासुदेव उवाच
सततं मन्त्रय़न्ति स्म दुर्योधनपुरोगमाः ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय
१४२
युधिष्ठिर उवाच
सततं यः क्षमाशीलः क्षिप्यमाणोऽप्यणीय़सा |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
सततं यश्च कामार्थी नेतरावनुतिष्ठति |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३२
नारद उवाच
सततं ये नमस्यन्ति तान्नमस्याम्यहं विभो ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९४
वामदेव उवाच
सततं वर्तमानोऽत्र राजा भुङ्क्ते महीमिमाम् ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
८४
वैशम्पाय़न उवाच
सततं शरधाराभिः प्रदीप्तं कर्णपावकम् |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
सततं संमतश्चैव सद्वृत्तमनुपालय़ ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
सततं स्मान्वतप्यन्त तमेव भरतर्षभम् |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२१
व्राह्मण उवाच
सततं स्यन्दते ह्येषा शाश्वतं व्रह्मवादिनी ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
सतलत्रैः सकेय़ूरैर्भाति भारत मेदिनी ||
३९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
सतलत्रैः सकेय़ूरैर्वाहुभिश्चन्दनोक्षितैः |
५९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९७
भीष्म उवाच
सता तु धर्मकामेन सुकरं कर्म दुष्करम् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
सतां च वेदा अन्नं च लोकेऽस्मिन्प्रकृतिर्ध्रुवा |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
सतां तमाश्रमं श्रेष्ठं वदन्ति परमर्षय़ः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
सतां धर्मानुगस्त्यागी स राजा राज्यमर्हति ||
३८ ख
आदि पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
सतां धर्मेण धर्मज्ञः कृत्वा कर्मातिमानुषम् |
४६ क
वन पर्व
अध्याय
२००
व्याध उवाच
सतां धर्मेण वर्तेत क्रिय़ां शिष्टवदाचरेत् |
४२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११३
वृहस्पतिरु उवाच
सतां पन्थानमाश्रित्य सर्वपापात्प्रमुच्यते ||
२० ख
सभा पर्व
अध्याय
५७
विदुर उवाच
सतां पेय़ं यन्न पिवन्त्यसन्तो; मन्युं महाराज पिव प्रशाम्य ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
सतां पेय़ं यन्न पिवन्त्यसन्तो; मन्युं महाराज पिव प्रशाम्य ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
विदुर उवाच
सतां पेय़ं यन्न पिवन्त्यसन्तो; मन्युं महाराज पिव प्रशाम्य ||
६६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
सतां मतमतिक्रम्य योऽसतां वर्तते मते |
२४ क
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
सतां मध्ये महाराज सत्करोषि च पूजय़न् ||
१०८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५५
तुलाधार उवाच
सतां वर्त्मानुवर्तन्ते यथावलमहिंसय़ा ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८५
पराशर उवाच
सतां वृत्तमनुष्ठाय़ निहीना उज्जिहीर्षवः |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४४
सनत्सुजात उवाच
सतां वृत्तिं वहुगुणामेवमेति; गुरोः पुत्रे भवति च वृत्तिरेषा ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५७
भीष्म उवाच
सतां वृत्ते स्थितमतिः सन्तो ह्याचारदर्शिनः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२७
व्यास उवाच
सतां वृत्तेन वर्तेत क्रिय़ाः शिष्टवदाचरेत् |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय
८७
यय़ातिरु उवाच
सतां सकाशे तु वृतः प्रपात; स्ते सङ्गता गुणवन्तश्च सर्वे |
७ क