कर्ण पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
विमानेभ्यो यथा क्षीणे पुण्ये स्वर्गसदस्तथा ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८०
व्यास उवाच
विमानेषु विचित्रेषु रमणीय़ेषु भारत |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
विमानैः काञ्चनैर्दिव्यैः पृष्ठतश्चानुगम्यते ||
८६ ख
वन पर्व
अध्याय
१६२
वैशम्पाय़न उवाच
विमानैः सूर्यसङ्काशैर्देवराजमरिन्दमम् ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
विमानैरप्सरःसङ्घैर्गीतवादित्रनिस्वनैः ||
५५ ख
सभा पर्व
अध्याय
७
नारद उवाच
विमानैर्विविधैर्दिव्यैर्भ्राजमानैरिवाग्निभिः ||
२३ ख
विराट पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
विमानैर्विविधैश्चित्रैरुपानीतैः सुरोत्तमैः ||
१७ ग
सभा पर्व
अध्याय
७
नारद उवाच
विमानैश्चन्द्रसङ्काशैः सोमवत्प्रिय़दर्शनाः |
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
१६४
अर्जुन उवाच
विमानय़ाय़िनश्चात्र दृश्यन्ते वहवोऽमराः ||
४८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
विमिश्रां केशमज्जाभिः प्रदिग्धां रुधिरेण च |
५८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६९
व्राह्मण उवाच
विमुक्तं नरकात्पश्य नृगं साधुसमागमात् ||
३२ ख
मौसल पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
विमुक्तं वासुदेवं च श्रुत्वा रामं च पाण्डवः |
८ क
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
विमुक्तं सर्वपापेभ्यः सर्वरत्नसमन्वितम् |
८९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२३७
व्यास उवाच
विमुक्तं सर्वसङ्गेभ्यो मुनिमाकाशवत्स्थितम् |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
७०
वृहदश्व उवाच
विमुक्तः कलिना राजन्रूपमात्रविय़ोजितः ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
विमुक्तः कुण्डलाभ्यां च सहजेन च वर्मणा |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
विमुक्तः पुण्यपापेभ्यः प्रविष्टस्तमनामय़म् |
९२ क
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
विमुक्तः सर्वदोषैर्यः स तीर्थफलमश्नुते ||
३२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
विमुक्तः सर्वपापेभ्य इति चैव निवोधत ||
२६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४५
व्रह्मो उवाच
विमुक्तः सर्वपापेभ्यः प्राप्नोति परमां गतिम् ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
व्रह्मो उवाच
विमुक्तः सर्वपापेभ्यः सर्वं त्यजति निष्कलः |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
९०
लोमश उवाच
विमुक्तः सर्वपापेभ्यो भूय़ एव भविष्यसि ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४२
व्यास उवाच
विमुक्तः सर्वपापेभ्यो मुक्तत्वच इवोरगः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२२
भीष्म उवाच
विमुक्तः सर्वपापेभ्यो योऽवमन्ता स वध्यते ||
२१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१९
व्राह्मण उवाच
विमुक्तः सर्वसंस्कारैस्ततो व्रह्म सनातनम् |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४५
व्रह्मो उवाच
विमुक्तः सर्वसङ्क्लेशैः सर्वद्वन्द्वातिगो मुनिः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
वसिष्ठ उवाच
विमुक्तः सर्वसङ्गेभ्यो लघ्वाहारो जितेन्द्रिय़ः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९
युधिष्ठिर उवाच
विमुक्तः सर्वसङ्गेभ्यो व्यतीतः सर्ववागुराः |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
महेश्वर उवाच
विमुक्तः सर्वसङ्गेषु स्नेहवन्धेषु च द्विजः |
२५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
विमुक्तकवचाः सर्वे भीष्ममीय़ुर्नराधिपाः ||
२७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
विमुक्तकेशाश्चाप्यन्ये नाभ्यजानन्परस्परम् |
८४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३९
व्रह्मो उवाच
विमुक्तदेहः प्रविभागतत्त्ववि; त्स मुच्यते सर्वगुणैर्निरामय़ः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
विमुक्तदोषः समलोष्टकाञ्चनः; स मुच्यते दुःखसुखार्थसिद्धेः ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
वसिष्ठ उवाच
विमुक्तधर्मा मुक्तेन समेत्य पुरुषर्षभ ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
विमुक्तनादाः सम्पेतुः स्थलजा जलजैः सह ||
१० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
५
कृप उवाच
विमुक्तमूर्धजा ये च ये चापि हतवाहनाः ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
विमुक्तमेनं निरय़ाच्च विद्धि; सर्वेषु चान्येषु च सम्भवेषु ||
४२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
विमुक्तरथसंनाहाः सर्वे निक्षिप्तकार्मुकाः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७४
भीष्म उवाच
विमुक्तरोगः स सुखी मुदा युतो; लभेत कामान्स यथामनीषितान् ||
६० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
विमुक्तशस्त्रकवचा भीष्मस्य सदनं प्रति ||
५३ ग
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
विमुक्तशापः पुनराप्य तेजः; सर्वं जगद्भासय़ते नरेन्द्र |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२३
भीष्म उवाच
विमुक्तस्तमसा सर्वान्धर्मादीन्कामनैष्ठिकान् ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
विमुक्ता अव्यवच्छिन्ना नेमे वाणाः शिखण्डिनः ||
५५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
विमुक्ता च सरिच्छ्रेष्ठा विवभौ सा यथा पुरा ||
१३ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३०
महेश्वर उवाच
विमुक्ता दारसंय़ोगैर्विमुक्ताः सर्वसङ्करैः |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
विमुक्ता धुतपाप्मानो निर्द्वन्द्वा निष्परिग्रहाः |
१३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
विमुक्ता मानुषैर्देहैस्ततस्ता भर्तृभिः सह |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
भीष्म उवाच
विमुक्ता व्रह्मघोषेण न भ्राजन्ते यथा पुरा ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
विमुक्तां वहुभिः शूरैः शस्त्रवृष्टिं दुरासदाम् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७०
युधिष्ठिर उवाच
विमुक्ताः सप्तदशभिर्हेतुभूतैश्च पञ्चभिः |
४ क